सार: लौंग (लवंग) को आयुर्वेद में दाँत और मसूड़ों की देखभाल का प्रमुख द्रव्य माना गया है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में इसका ज़िक्र मुख रोग यानी मुँह से जुड़ी परेशानियों के प्रकरण में मिलता है। लौंग के तेल का मुख्य तत्व यूजेनॉल है, जिसे परंपरा में दाँत की तकलीफ़ को शांत करने और मुँह की रोज़ाना ताज़गी से जोड़ा जाता है।
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Read this article in English: Clove for Teeth and Gums: Ayurvedic Oral Care Benefits
- दाँत में लौंग रखने के फायदे और आयुर्वेद में लवंग का स्थान
- यूजेनॉल: लौंग का वह तत्व जो इसे ख़ास बनाता है
- दाँत और मसूड़ों के लिए लौंग के 7 मुख्य फायदे
- लौंग को दाँत में कैसे लगाएँ: इस्तेमाल के 4 तरीके
- घर पर बनने वाले 3 आसान नुस्ख़े
- लौंग और दंतमंजन: कई जड़ी-बूटियों का साथ क्यों बेहतर माना जाता है
- लौंग कब काफ़ी नहीं: दंत चिकित्सक को कब दिखाएँ
- अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

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आयुर्वेदिक दंतमंजन में लौंग नीम, बबूल, कपूर और सेंधा नमक के साथ आती है, इसलिए यह लौंग को रोज़ाना की दिनचर्या में शामिल करने का सीधा तरीका है।
प्रोडक्ट देखें →दाँत में लौंग रखने के फायदे और आयुर्वेद में लवंग का स्थान
अगर कभी रात के दो बजे दाँत में तेज़ तकलीफ़ हुई हो, तो घर में किसी न किसी ने एक लौंग दाँत के पास दबाने की सलाह ज़रूर दी होगी। यह सलाह घरेलू अनुभव के साथ-साथ एक लंबी परंपरा से भी जुड़ी है। लौंग, जिसे संस्कृत में लवंग कहा जाता है, आयुर्वेद की मुख-देखभाल में तीन हज़ार साल से शामिल रही है।
चरक संहिता और सुश्रुत संहिता — आयुर्वेद के दो आधार ग्रंथ — लवंग को मुख रोग (मुँह से जुड़ी परेशानियों) के प्रकरण में प्रमुख द्रव्यों में गिनते हैं। दाँत और मसूड़ों की लगभग हर पारंपरिक विधि में इसका नाम आता है: दंतधावन (दाँत साफ़ करने की तैयारी), कवल ग्रह (तेल मुँह में रखने की क्रिया) और गंडूष (मुँह भरकर कुल्ला करने की क्रिया)।
वनस्पति की दृष्टि से लौंग (Syzygium aromaticum) एक सदाबहार पेड़ की सूखी हुई फूल-कली है। यह पेड़ मूल रूप से इंडोनेशिया के मालुकु द्वीपों का है। पुराने व्यापार मार्गों से लौंग भारत आती रही और यहाँ मुँह की देखभाल में इस्तेमाल होती रही। आज केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में इसकी अच्छी-ख़ासी पैदावार होती है।

लवंग का आयुर्वेदिक परिचय
- रस (स्वाद): कटु यानी तीखा, तिक्त यानी कड़वा
- गुण: लघु यानी हल्का, तीक्ष्ण यानी भीतर तक पहुँचने वाला
- वीर्य (तासीर): शीत यानी ठंडी
- विपाक (पचने के बाद का प्रभाव): कटु
- दोष पर असर: कफ और पित्त को संतुलित करने वाला; ज़्यादा मात्रा में वात को थोड़ा बढ़ा सकता है
- प्रभाव (विशेष क्रिया): कृमिघ्न यानी मुँह की सफ़ाई बनाए रखने वाला, और वेदनास्थापन यानी तकलीफ़ को शांत करने वाला
लौंग को मुँह की देखभाल के लिए ख़ास बनाने वाली बात इसके दो गुणों का मेल है: तीक्ष्ण गुण और शीत वीर्य। तीक्ष्ण गुण की वजह से इसे मसूड़ों और दाँतों की गहराई तक पहुँचने वाला माना जाता है, और शीत वीर्य की वजह से यह मुँह के भीतरी ऊतकों पर ठंडक जैसा असर देती है। परंपरा में यही जोड़ी लौंग को मुख-देखभाल का प्रमुख द्रव्य बनाती है।
आयुर्वेद लौंग को कृमिघ्न वर्ग में भी रखता है, यानी ऐसा द्रव्य जो मुँह के भीतर साफ़-सुथरा वातावरण बनाए रखने में सहारा देता है।
यूजेनॉल: लौंग का वह तत्व जो इसे ख़ास बनाता है
लौंग की सारी चर्चा घूम-फिरकर एक ही तत्व पर आती है — यूजेनॉल, जो इसके तेल का मुख्य हिस्सा है। यह दाँतों से जुड़े सबसे अधिक अध्ययन किए गए प्राकृतिक तत्वों में गिना जाता है। मुँह की देखभाल में इसकी भूमिका कई तरह की मानी जाती है।
दाँत की तकलीफ़ में पारंपरिक सहारा — जब लौंग का तेल तकलीफ़ वाली जगह पर लगाया जाता है, तो यूजेनॉल सीधे उसी हिस्से तक पहुँचता है। आधुनिक दंत सामग्री बनने से बहुत पहले से घरों में यही तरीका अपनाया जाता रहा है, और आयुर्वेद में इसे वेदनास्थापन गुण से जोड़ा जाता है।
मसूड़ों को आराम देने वाला गुण — यूजेनॉल का शांत करने वाला गुण लौंग की पारंपरिक भूमिका का केंद्र है। ऊपर से लगाने पर इसका असर मुँह के उसी हिस्से तक सीमित रहता है, इसीलिए इसे रोज़ाना की मुख-देखभाल की तैयारियों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
कृमिघ्न यानी सफ़ाई में सहयोग — शास्त्र रोज़ाना की मुख-शुद्धि में लौंग की भूमिका इसी गुण से जोड़ते हैं, और सदियों से आयुर्वेदिक मुख-देखभाल की नींव यही रही है।
एंटीऑक्सीडेंट गुण — यूजेनॉल की रचना इसे एंटीऑक्सीडेंट गुण वाले तत्वों में रखती है। मुँह के भीतर इसे ऊतकों की सुरक्षा में सहारा देने वाला माना जाता है, ख़ासकर उस नुक़सान के सामने जो धूम्रपान या असंतुलित खान-पान से जुड़ा होता है।
दंत चिकित्सा में यूजेनॉल: ज़िंक ऑक्साइड-यूजेनॉल (ZOE) का इस्तेमाल दंत चिकित्सा के कुछ सीमेंट में, अस्थायी भराई और दाँत निकलवाने के बाद की देखभाल में किया जाता है। यानी रसोई में रखी लौंग और दंत चिकित्सा की कुछ सामग्री में यही तत्व साझा है।
दाँत और मसूड़ों के लिए लौंग के 7 मुख्य फायदे
लौंग के फायदे आयुर्वेदिक परंपरा और सदियों के रोज़मर्रा इस्तेमाल पर टिके हैं। नीचे दाँत और मसूड़ों की देखभाल से जुड़े सात मुख्य पहलू दिए गए हैं।
1. दाँत की तकलीफ़ में पारंपरिक आराम — लौंग की सबसे जानी-पहचानी पारंपरिक भूमिका यही है। तकलीफ़ वाली जगह के पास एक साबुत लौंग रखकर हल्के से दबाएँ, या रुई पर लौंग के तेल की एक बूँद लगाकर कुछ मिनट उसी जगह रखें।
2. मसूड़ों की रोज़ाना देखभाल — जिन लोगों को ब्रश करते समय मसूड़ों में हल्की तकलीफ़ या सूजन महसूस होती है, उनके लिए परंपरा में लगातार और सौम्य देखभाल पर ज़ोर दिया जाता है। यहाँ सिर्फ़ लौंग चबाने के बजाय नारियल तेल में पतला किया हुआ लौंग का तेल ज़्यादा उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि तेल मसूड़े की पूरी रेखा तक पहुँचता है।
3. मुँह की ताज़गी — साँस की दुर्गंध का बड़ा कारण जीभ के पिछले हिस्से और दाँतों के बीच जमी परत को माना जाता है। लौंग यहाँ दो तरह से काम करती है: इसकी तेज़ ख़ुशबू मुँह को तुरंत ताज़ा महसूस कराती है, और इसका कृमिघ्न गुण रोज़ाना की सफ़ाई में सहारा देता है।

4. दाँतों की रोज़ाना सफ़ाई और सुरक्षा — दाँतों की ऊपरी परत का घिसना अम्ल बनने की प्रक्रिया से जोड़ा जाता है। यहाँ लौंग का शास्त्रीय कृमिघ्न गुण काम आता है। रोज़ाना लौंग-युक्त मंजन या कुल्ला इसी सफ़ाई की आदत को बनाए रखने में सहारा देता है।
5. दाँतों की अपनी चमक — लौंग रासायनिक ब्लीच की तरह दाँतों का रंग नहीं बदलती। इसका रास्ता धीमा और सौम्य है: प्लाक यानी दाँतों पर जमने वाली चिपचिपी परत कम रहने से दाँतों का अपना रंग बेहतर दिखता है। कषाय यानी कसैला गुण मसूड़ों को हल्का कसाव भी देता है।
6. मुँह के भीतर संतुलन — मुँह में 700 से ज़्यादा तरह के जीवाणु रहते हैं, जिनमें से ज़्यादातर नुक़सानदेह नहीं होते, और कुछ उपयोगी भी माने जाते हैं। लौंग का कृमिघ्न गुण मुँह के इस माइक्रोबायोम के साथ तालमेल बनाए रखने वाला माना जाता है। कोई शिकायत लंबे समय तक बनी रहे, तो दंत चिकित्सक या डॉक्टर को दिखाना ज़रूरी है।
7. मुँह के भीतरी हिस्सों को आराम — लौंग का शांत करने वाला गुण मसूड़ों तक सीमित नहीं माना जाता — गाल के भीतरी हिस्से, तालु, जीभ और गले तक इसका पारंपरिक उपयोग रहा है। छाले, ब्रेसेस या नक़ली दाँत से होने वाली रगड़ और दंत प्रक्रिया के बाद की असहजता में लौंग के पानी से कुल्ला परंपरा में आराम देने वाला माना जाता है। इसी वजह से ग्रंथ लवंग को दिनचर्या यानी रोज़ की देखभाल का हिस्सा बताते हैं।
लौंग को दाँत में कैसे लगाएँ: इस्तेमाल के 4 तरीके
लौंग को मुँह की देखभाल में शामिल करने के कई रास्ते हैं। हर तरीके की अपनी जगह है — कुछ तुरंत आराम के लिए ज़्यादा काम आते हैं और कुछ रोज़ की देखभाल के लिए।
तरीका 1: साबुत लौंग (सबसे आसान) — एक साबुत लौंग मसूड़े और गाल के बीच, तकलीफ़ वाली जगह के पास रखें। हल्के से दबाएँ ताकि उसका तेल निकलने लगे, और 15 से 30 मिनट तक रहने दें। इसमें कोई तैयारी नहीं करनी पड़ती। भोजन के बाद सौंफ़ के साथ एक लौंग चबा लेना भारतीय घरों की पुरानी आदत रही है।
तरीका 2: लौंग का तेल — लौंग का तेल यूजेनॉल को सबसे सघन रूप में उसी जगह पहुँचाता है, इसलिए इसे हमेशा पतला करके लगाएँ: 2 से 3 बूँद लौंग का तेल एक चम्मच नारियल या तिल के तेल में मिलाएँ। साफ़ रुई या उँगली से तकलीफ़ वाली जगह पर लगाएँ, और मसूड़ों के लिए इसी मिश्रण से 2 से 3 मिनट हल्के हाथ से मालिश करें। तेल निगलें नहीं, 15 से 20 मिनट बाद गुनगुने पानी से कुल्ला कर लें।

तरीका 3: मंजन में लौंग का चूर्ण (रोज़ाना के लिए सबसे उपयुक्त) — पिसी हुई लौंग को दूसरी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के साथ मिलाकर बना चूर्ण रोज़ाना के मंजन का काम करता है। शास्त्रीय अनुपात इस तरह बताया जाता है: 1 भाग लौंग का चूर्ण, 2 भाग नीम की छाल का चूर्ण, 1 भाग सेंधा नमक और आधा भाग कपूर। गीले ब्रश को इस चूर्ण में डुबोकर 2 से 3 मिनट हल्के हाथ से ब्रश करें। पारंपरिक दंतमंजन असल में इसी योग का परिष्कृत रूप है।
तरीका 4: लौंग का पानी और कुल्ला (मसूड़ों की देखभाल के लिए) — एक कप पानी में 5 से 6 साबुत लौंग डालकर 10 मिनट उबालें और गुनगुना होने दें। इसे मुँह में 30 से 60 सेकंड घुमाकर थूक दें, चाहें तो चुटकी भर सेंधा नमक मिला लें। मसूड़ों की देखभाल में परंपरा में यही कुल्ला आम तौर पर अपनाया जाता है। हर 2 से 3 दिन में ताज़ा बनाएँ और फ़्रिज में रखें।
परंपरा में ज़रूरत के हिसाब से लौंग का इस्तेमाल
- दाँत में तकलीफ़: रुई पर लौंग का तेल — ज़रूरत के अनुसार दिन में 3 से 4 बार
- मसूड़ों की देखभाल: पतला किया हुआ लौंग का तेल, हल्की मालिश — ब्रश के बाद दिन में दो बार
- मुँह की ताज़गी: भोजन के बाद एक साबुत लौंग चबाएँ
- रोज़ाना की देखभाल: लौंग वाला मंजन — सुबह और रात
- मुँह की असहजता: लौंग के पानी से कुल्ला — ज़रूरत के अनुसार
- सामान्य मुख-शुद्धि: लौंग का कुल्ला — ब्रश करने के बाद दिन में एक बार
घर पर बनने वाले 3 आसान नुस्ख़े
ये तीनों तैयारियाँ हर भारतीय रसोई में मिलने वाली चीज़ों से बन जाती हैं। हर नुस्ख़ा अलग ज़रूरत के लिए है, इसलिए जो स्थिति आपसे मेल खाती हो, वही चुनें।
नुस्ख़ा 1: लौंग का लेप — सामग्री: 3 से 4 साबुत लौंग, आधा चम्मच तिल का तेल और चुटकी भर सेंधा नमक। लौंग को खरल में दरदरा कूट लें, फिर तिल के तेल और सेंधा नमक के साथ मिलाकर गाढ़ा लेप बना लें। इसे तकलीफ़ वाले दाँत और आसपास के मसूड़े पर लगाएँ, 20 से 30 मिनट रहने दें और गुनगुने पानी से धो लें। तिल का तेल इसलिए चुना जाता है, क्योंकि आयुर्वेद इसे वात को शांत करने वाली जड़ी-बूटियों के लिए उपयुक्त माध्यम मानता है, और दाँत की तकलीफ़ को अक्सर वात के असंतुलन से जोड़ा जाता है।
कब इस्तेमाल करें: अचानक होने वाली तकलीफ़ में, ख़ासकर तब जब दंत चिकित्सक तुरंत उपलब्ध न हों। ज़रूरत हो तो हर 3 से 4 घंटे में दोबारा लगाया जा सकता है।

नुस्ख़ा 2: लौंग और नीम का कुल्ला — सामग्री: 5 साबुत लौंग, 4 से 5 ताज़े नीम के पत्ते (या आधा चम्मच नीम चूर्ण), एक कप पानी और चुटकी भर हल्दी। लौंग और नीम को धीमी आँच पर 10 मिनट उबालें। आँच से उतारकर हल्दी मिलाएँ और गुनगुना होने दें, फिर बारीक कपड़े से छान लें। 60 सेकंड मुँह में घुमाकर थूक दें, निगलें नहीं।
कब इस्तेमाल करें: मसूड़ों में हल्की तकलीफ़ या संवेदनशीलता महसूस होने पर, ब्रश करने के बाद दिन में दो बार। लौंग यहाँ अपना शांत करने वाला गुण देती है और नीम अपना कृमिघ्न गुण — यही जोड़ी ग्रंथों में बताई गई पारंपरिक मुख-देखभाल का आधार रही है।
नुस्ख़ा 3: ताज़गी वाला लौंग का कुल्ला — सामग्री: 4 लौंग, 2 से 3 इलायची, एक छोटी दालचीनी, 4 से 5 ताज़े पुदीने के पत्ते और दो कप पानी। सारे मसाले 8 से 10 मिनट उबालें, पूरी तरह ठंडा होने दें और छानकर साफ़ काँच की बोतल में भर लें। फ़्रिज में 5 दिन तक रखा जा सकता है। भोजन के बाद 2 से 3 बड़े चम्मच मुँह में लेकर 30 से 60 सेकंड घुमाएँ।
कब इस्तेमाल करें: रोज़ भोजन के बाद। लौंग अपना कृमिघ्न गुण देती है, इलायची ख़ुशबू, दालचीनी हल्की गर्माहट और पुदीना ठंडक। बाज़ार के अल्कोहल वाले माउथवॉश की जगह इसे सादा घरेलू विकल्प माना जा सकता है।
ध्यान रखें: ये घरेलू तैयारियाँ रोज़ाना की देखभाल में सहारा भर हैं। कैविटी, जड़ तक पहुँची समस्या या मसूड़ों की बढ़ी हुई शिकायत में ये पेशेवर दंत चिकित्सा की जगह नहीं ले सकतीं, और तकलीफ़ 3 दिन से ज़्यादा बनी रहे तो दंत चिकित्सक को दिखाएँ। लंबे समय से चली आ रही किसी शिकायत, गर्भावस्था, बच्चों या पहले से चल रही दवाओं की स्थिति में कोई भी घरेलू उपाय अपनाने से पहले डॉक्टर या वैद्य से सलाह ज़रूर लें।
लौंग और दंतमंजन: कई जड़ी-बूटियों का साथ क्यों बेहतर माना जाता है
अकेली लौंग भी मुँह की देखभाल में काम आती है, लेकिन आयुर्वेदिक योग किसी एक द्रव्य पर नहीं टिकते। योग का सिद्धांत यही है — कई जड़ी-बूटियों को इस तरह मिलाना कि उनका साझा प्रभाव अलग-अलग असर के जोड़ से ज़्यादा हो। दंतमंजन इसी सोच पर बना पारंपरिक चूर्ण है, जिसमें लौंग के साथ दूसरी जड़ी-बूटियाँ इस तरह जुड़ती हैं:
- लौंग (लवंग) — दाँत की तकलीफ़ में पारंपरिक आराम, कृमिघ्न गुण और मुँह की ताज़गी। यही मुख-देखभाल का प्रमुख द्रव्य है।
- नीम (निंब) — मसूड़ों की देखभाल और अपना कृमिघ्न गुण, जो लौंग के असर का पूरक माना जाता है।
- बबूल — कषाय यानी कसैला गुण, जो मसूड़ों को कसाव देने से जोड़ा जाता है।
- कपूर (कर्पूर) — ठंडक देने वाला, और परंपरा में दूसरे द्रव्यों के गुणों को ऊतकों तक पहुँचाने में सहायक माना जाता है।
- सेंधा नमक — हल्का घर्षण देकर सफ़ाई करता है और खनिजों से भरपूर होता है।

शास्त्र इसी को प्रतिसारणीय यानी दाँतों पर मलने वाले चूर्ण के रूप में बताते हैं, और एक जड़ी-बूटी वाली तैयारी के बजाय कई द्रव्यों के योग को प्राथमिकता देते हैं।
अगर आप रोज़ाना की दिनचर्या में यही पारंपरिक तरीका अपनाना चाहते हैं, तो हमारे आयुर्वेदिक दंतमंजन में लौंग इन्हीं जड़ी-बूटियों के साथ शामिल है, और इसके साथ बाँस का टूथब्रश भी आता है।
लौंग कब काफ़ी नहीं: दंत चिकित्सक को कब दिखाएँ
लौंग शुरुआती घरेलू सहारे और रोज़ाना की देखभाल के लिए है। इसकी सीमाएँ जानना उतना ही ज़रूरी है जितना इसके फायदे जानना। नीचे दी गई स्थितियों में पेशेवर दंत चिकित्सा ज़रूरी मानी जाती है।
इन स्थितियों में देर न करें, दंत चिकित्सक को दिखाएँ:
- लौंग इस्तेमाल करने के बाद भी तकलीफ़ 2 से 3 दिन से ज़्यादा बनी रहे
- चेहरे या जबड़े पर सूजन दिखाई दे
- मसूड़ों से मवाद या कोई स्राव आए
- दाँत टूटा या चटका हो — ऐसी क्षति की भरपाई दंत चिकित्सक ही कर सकते हैं
- तकलीफ़ तेज़ हो और कान, आँख या कनपटी तक जा रही हो
- कोई स्थायी दाँत हिल रहा हो
- मुँह की पूरी सफ़ाई के बावजूद साँस की दुर्गंध बनी रहे
लौंग को घर की प्राथमिक चिकित्सा पेटी जैसा समझें — जब तक दंत चिकित्सक तक पहुँचने का इंतज़ाम हो, तब तक यह असहजता सँभालने में सहारा देती है। टूटे दाँत या भीतर तक पहुँची समस्या में ढाँचे की मरम्मत ज़रूरी होती है, और वह काम दंत चिकित्सक का है।
बचाव पहले: हर 6 महीने पर दंत जाँच और रोज़ाना की आयुर्वेदिक देखभाल — दंतमंजन, लौंग का कुल्ला और कवल ग्रह — दोनों को साथ रखना संतुलित तरीका माना जाता है। दाँत के ढाँचे से जुड़ी जाँच दंत चिकित्सक के पास रहती है, और रोज़ की देखभाल घर पर की जा सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
दाँत में लौंग रखने के फायदे क्या हैं? (dant me long rakhne ke fayde)+
साबुत लौंग को मसूड़े और गाल के बीच, तकलीफ़ वाली जगह के पास रखने पर उसका तेल धीरे-धीरे निकलता है और यूजेनॉल उसी हिस्से तक पहुँचता है। परंपरा में इसे संवेदनशील दाँत के लिए आराम देने वाला और मुँह को ताज़ा रखने वाला माना जाता है। इसे 15 से 30 मिनट तक रखें, बीच-बीच में हल्का दबाएँ, और मुँह में लौंग रखकर सोएँ नहीं।
लौंग के पानी से कुल्ला करने के फायदे क्या हैं और लौंग का पानी कैसे बनाएँ? (laung ka pani kaise banaye)+
एक कप पानी में 5 साबुत लौंग — और चाहें तो 4 से 5 नीम के पत्ते — डालकर 10 मिनट उबालें, गुनगुना होने दें और छान लें। ब्रश करने के बाद 60 सेकंड मुँह में घुमाकर थूक दें। दिन में दो बार करने पर मुँह साफ़ और ताज़ा महसूस होता है। ऊपर नुस्ख़ा 2 में हल्दी के साथ पूरी विधि दी गई है। हर 2 से 3 दिन में ताज़ा बनाएँ और फ़्रिज में रखें।
लौंग पाउडर के फायदे दाँतों के लिए क्या हैं? (long powder ke fayde)+
पिसी हुई लौंग कई पारंपरिक मंजनों का आधार रही है — ऊपर तरीका 3 में नीम की छाल के साथ शास्त्रीय अनुपात दिया गया है। रोज़ नरम ब्रश या उँगली से हल्के हाथ से इस्तेमाल करने पर यह सौम्य सफ़ाई करती है और मुँह में ताज़गी बनी रहती है। मंजन में पिसी लौंग रोज़ के इस्तेमाल के लिए ठीक मानी जाती है, लेकिन बिना पतला किया हुआ लौंग का तेल रोज़ सीधे मसूड़ों पर न लगाएँ — सघन यूजेनॉल कोमल ऊतकों पर भारी पड़ सकता है।
लौंग का तेल मसूड़ों के लिए कैसे लगाएँ? (long ka tel masudo ke liye)+
2 से 3 बूँद लौंग का तेल एक चम्मच नारियल या तिल के तेल में मिलाएँ। उँगली से मसूड़ों पर 2 से 3 मिनट हल्के हाथ से मालिश करें, ब्रश करने के बाद दिन में दो बार। तेल निगलें नहीं और 15 से 20 मिनट बाद गुनगुने पानी से कुल्ला कर लें। लौंग का तेल हमेशा पतला करके ही लगाएँ।
क्या बच्चों के दाँत में लौंग का तेल लगा सकते हैं?+
6 साल से छोटे बच्चों में लौंग का तेल सावधानी से ही इस्तेमाल करना चाहिए। 6 से 12 साल के बच्चों के लिए इसे ख़ूब पतला करें — एक बड़े चम्मच नारियल तेल में सिर्फ़ 1 बूँद — और रुई से बहुत थोड़ी मात्रा लगाएँ। बच्चों को तेल निगलने न दें। छोटे बच्चों के लिए देखरेख में दाँत के पास रखी साबुत लौंग, बिना चबाए, ज़्यादा सुरक्षित मानी जाती है। तकलीफ़ बनी रहे तो घरेलू उपाय पर टिके रहने के बजाय बाल दंत चिकित्सक को दिखाएँ।
क्या लौंग से दाँत सफ़ेद होते हैं? (how to use cloves for teeth whitening)+
लौंग रासायनिक ब्लीच की तरह दाँतों का रंग नहीं बदलती। इसका रास्ता अलग है: प्लाक कम जमने से दाँतों का अपना रंग बेहतर दिखता है, और कषाय गुण मसूड़ों को हल्का कसाव देता है, जिससे दाँत साफ़ लगते हैं। चाहें तो पिसी लौंग में चुटकी भर हल्दी और थोड़ा नारियल तेल मिलाकर हफ़्ते में एक बार ब्रश कर सकते हैं। बदलाव धीरे-धीरे और हल्का होता है, पर तरीका सौम्य रहता है।
दंत चिकित्सक को कब दिखाना ज़रूरी है?+
लौंग शुरुआती घरेलू सहारा है, दंत चिकित्सा का विकल्प नहीं। तकलीफ़ 2 से 3 दिन से ज़्यादा बनी रहे, चेहरे या जबड़े पर सूजन दिखे, मसूड़ों से मवाद आए, दाँत टूटा या चटका हो, तकलीफ़ कान या सिर तक जा रही हो, या कोई स्थायी दाँत हिल रहा हो — तो देर न करें और दंत चिकित्सक को दिखाएँ।