सारांश: आयुर्वेदिक साबुन वह माना जाता है जिसकी सफ़ाई का आधार पारंपरिक उबटन हो, यानी मुल्तानी मिट्टी, आटे, कोल्ड-प्रेस्ड तेल और जड़ी-बूटियाँ, और जिसमें SLS या सिंथेटिक खुशबू न हो। यहाँ जानिए हमारे मुल्तानी मिट्टी साबुन की 16 सामग्रियाँ, इसकी सीमाएँ और इस्तेमाल का सही तरीका।
दिव्य स्नान मुल्तानी मिट्टी साबुन देखें →पढ़ने का समय: 14 मिनट
Read this article in English: Ayurvedic Sabun: Why I Built One (and What Switching From Regular Soap Actually Feels Like)
- आयुर्वेदिक साबुन कौन सा है, और 'साबुन' शब्द ही क्यों
- आम साबुन के बाद त्वचा में खिंचाव क्यों होता है
- इस साबुन में क्या-क्या है: सभी 16 सामग्रियाँ
- मुल्तानी मिट्टी सफ़ाई कैसे करती है
- किन लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए और इस साबुन की सीमाएँ
- पहले हफ़्ते से तीसरे महीने तक क्या बदल सकता है
- चार साबुन ₹539 के क्यों, जबकि आम साबुन ₹35 का आता है
- चेहरे और शरीर पर इस्तेमाल का सही तरीका
- अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

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इस लेख में इसी मुल्तानी मिट्टी उबटन साबुन की बात हो रही है, जिसे चार आटों, चार कोल्ड-प्रेस्ड तेलों और जड़ी-बूटियों से हाथ से बनाया जाता है।
प्रोडक्ट देखें →आयुर्वेदिक साबुन कौन सा है, और 'साबुन' शब्द ही क्यों
भारत में घर पर हम 'साबुन' ही कहते हैं; 'सोप' वह शब्द है जो रैपर पर अंग्रेज़ी में छपा रहता है। गूगल पर 'sabun' हर महीने 12,000 से ज़्यादा बार खोजा जाता है, और यह शब्द खोजने वाले लोग अक्सर किसी बड़े विदेशी ब्रांड की तलाश में नहीं होते।
उन्हें ऐसा साबुन चाहिए होता है जो देसी लगे, जिसकी सामग्री दादी-नानी भी पहचान लें और जिससे नहाने के बाद त्वचा में खिंचाव न रहे। इसी वजह से कई लोग फिर से मुल्तानी मिट्टी, नीम, हल्दी, गुलाब जल और उबटन जैसे पुराने नुस्खों की ओर लौट रहे हैं, बस आज के हिसाब से नए रूप में।

दिव्य स्नान ऐसा ही एक मुल्तानी मिट्टी वाला उबटन साबुन है, जिसे हम छोटे-छोटे बैच में हाथ से बनाते हैं। यह नाम संस्कृत से लिया गया है (दिव्य यानी दैवी, स्नान यानी नहाना) और उस रोज़ के स्नान की याद दिलाता है जो 1950 के दशक में रासायनिक साबुन आने से पहले प्राकृतिक सामग्री से किया जाता था। आयुर्वेद में सुबह के स्नान को दिनचर्या के अंतर्गत शुद्धि का हिस्सा माना गया है, और उसमें इस्तेमाल होने वाले आटों व जड़ी-बूटियों के मिश्रण को 'उबटन' कहा जाता था।
आम साबुन के बाद त्वचा में खिंचाव क्यों होता है
नहाने के बाद त्वचा के सूखे, खिंचे-खिंचे एहसास के पीछे आम तौर पर तीन वजहें बताई जाती हैं।
1. pH का बिगड़ना — स्वस्थ त्वचा हल्की अम्लीय होती है और उसका pH लगभग 4.5 से 5.5 के बीच रहता है। इस अम्लीय परत (एसिड मेंटल) को त्वचा की पहली सुरक्षा परत माना जाता है, जो नमी को भीतर बनाए रखती है।
भारत में बिकने वाले ज़्यादातर आम साबुनों का pH 9 से 10 के बीच, यानी क्षारीय होता है। रोज़ ऐसे साबुन से नहाने पर यह परत कमज़ोर पड़ सकती है, और खिंचाव को इसी का संकेत माना जाता है। हमारा साबुन pH-संतुलित है और इसका pH न्यूट्रल के ज़्यादा करीब रखा गया है, ताकि इस परत पर कम से कम असर पड़े।
2. SLS से तेल का ज़रूरत से ज़्यादा निकल जाना — सोडियम लॉरिल सल्फेट (SLS) ज़्यादातर आम साबुनों और शैम्पू में झाग बनाने वाला रसायन है। यह त्वचा का तेल बड़ी मात्रा में निकाल सकता है, जिसमें वह प्राकृतिक तेल (सीबम) भी शामिल है जिसे त्वचा अपनी सुरक्षा के लिए बनाती है।
माना जाता है कि इसके बाद त्वचा इस कमी को पूरा करने के लिए और ज़्यादा तेल बनाने लगती है। ऐसे में दिन में तीन बार चेहरा धोने के बाद भी तैलीय त्वचा की शिकायत कम होने के बजाय बढ़ सकती है। हमारे साबुन में कोई सिंथेटिक झाग बनाने वाला तत्व नहीं है, इसलिए झाग कम बनता है, और इसे जानबूझकर ऐसा ही रखा गया है।
3. सिंथेटिक खुशबू — रैपर पर लिखी 'रोज़' या 'ओशन ब्रीज़' जैसी खुशबू कानूनी तौर पर 50 से 100 ऐसे रसायनों का मिश्रण हो सकती है जिनके नाम अलग से नहीं बताए जाते। इन सबके लिए लेबल पर बस 'fragrance' या 'parfum' लिख दिया जाता है, और ऐसी खुशबू को त्वचा में जलन और एलर्जी जैसी प्रतिक्रियाओं की एक बड़ी वजह माना जाता है।
कुछ ग्राहकों ने हमें बताया कि ऐसे साबुन छोड़ने के कुछ हफ़्तों बाद उनकी त्वचा पहले से शांत लगी। हमारे साबुन की खुशबू असली गुलाब की पंखुड़ियों, गुलाब जल, पुदीना सत और प्राकृतिक कपूर से आती है।
झाग और सफ़ाई: चार दशकों से विज्ञापनों ने यह धारणा बनाई है कि ज़्यादा झाग, तेज़ खुशबू और गोरापन ही अच्छे साबुन की पहचान हैं। असल में ज़्यादा झाग का मतलब अक्सर ज़्यादा SLS होता है, और साफ़ त्वचा का मतलब यह नहीं कि उसका सारा तेल निकल जाए।
इस साबुन में क्या-क्या है: सभी 16 सामग्रियाँ
पूरी सूची काम के हिसाब से समूहों में दी गई है, और जहाँ ग्रंथों में उल्लेख मिलता है, वहाँ ग्रंथ का नाम भी दिया गया है।
मिट्टी का आधार — मुल्तानी मिट्टी (मुक्तिका मृद्) इस साबुन में सफ़ाई का मुख्य घटक है। शारंगधर संहिता में मिट्टी (मृद्) को त्वचा (त्वक्) की शुद्धि करने वाली (शोधन) बताया गया है।
उबटन के चार आटे — मसूर दाल प्रोटीन से भरपूर प्राकृतिक स्क्रब है, जिसे मृत कोशिकाएँ हटाने और रंगत एक-सी दिखाने से जोड़ा जाता है। चावल का आटा हल्का स्क्रब है, जो त्वचा की ऊपरी सतह का तेल सोखता है और त्वचा को निखरा दिखा सकता है। जौ का आटा (यव चूर्ण) सफ़ाई में सहायक और त्वचा को आराम देने वाला माना जाता है, जबकि गुलाब की पंखुड़ियों के चूर्ण को टोनर जैसा माना जाता है, जो प्राकृतिक खुशबू भी देता है।
चार कोल्ड-प्रेस्ड तेल — चरक संहिता में नारियल (नारिकेल) को चिकनाई देने वाला (स्निग्ध) और त्वचा के लिए पोषक बताया गया है। सुश्रुत संहिता में नीम (निम्ब) का उल्लेख त्वचा के लिए उपयोगी द्रव्यों में मिलता है, और नीम का तेल तैलीय व बंद रोमछिद्रों वाली त्वचा के लिए खास तौर पर पसंद किया जाता है। अरंडी का तेल गहरी नमी देकर मिट्टी से होने वाले रूखेपन को संतुलित करने में मदद करता है, और गेहूँ के ज्वारे (व्हीटग्रास) का तेल विटामिन E से भरपूर माना जाता है।
निखार देने वाली जड़ी-बूटियाँ — अष्टांग हृदय में हल्दी (हरिद्रा) को त्वचा की आभा के लिए हितकर (वर्ण्य) कहा गया है और इसे भी त्वचा के लिए उपयोगी द्रव्यों में गिना गया है। मुलेठी त्वचा को निखरा दिखाने, आराम देने और दाग-धब्बों को हल्का दिखाने से जुड़ी मानी जाती है।
नमी के लिए — शिया बटर को गहरी नमी देने और त्वचा की सुरक्षा परत को सहारा देने से जोड़ा जाता है। गुलाब जल को नमी देने और pH का संतुलन बनाए रखने में सहायक माना जाता है।
ठंडक और ताज़गी के लिए — अजवाइन सत गर्म और तीखे स्वभाव का है, जिसे परंपरा में ताज़गी देने वाला माना जाता है। पुदीना सत और कपूर (कर्पूर) को ठंडक और ताज़गी से जोड़ा जाता है।
लेबल ज़रूर पढ़ें: कुछ 'आयुर्वेदिक' साबुनों में SLS दूसरे नामों से होता है, जैसे सोडियम कोको सल्फेट (sodium coco sulphate) या सोडियम कोसेथ सल्फेट (sodium coceth sulfate)। हमारे साबुन में ये नहीं हैं, और न ही SLES, पैराबेन, PEG, सिंथेटिक खुशबू, पाम ऑयल, जानवरों की चर्बी या सिंथेटिक रंग।
मुल्तानी मिट्टी सफ़ाई कैसे करती है
अंग्रेज़ी के दो शब्द, एब्ज़ॉर्प्शन और एडसॉर्प्शन, अक्सर एक जैसे समझ लिए जाते हैं। मुल्तानी मिट्टी का काम समझने के लिए इनका अंतर जानना उपयोगी है।
सोखना (एब्ज़ॉर्प्शन) — इसमें कोई चीज़ दूसरी चीज़ के अंदर समा जाती है, जैसे स्पंज पानी सोख लेता है।
सतह पर चिपकना (एडसॉर्प्शन) — इसमें कोई चीज़ दूसरी चीज़ की सतह से चिपक जाती है, जैसे पानी के फ़िल्टर में लगा चारकोल अशुद्धियों को अपनी सतह पर पकड़ लेता है।
मुल्तानी मिट्टी इसी दूसरे तरीके से, यानी सतह पर चिपकाकर (एडसॉर्प्शन), काम करती है। इसके कणों का सतही क्षेत्रफल उनके आकार के मुकाबले बहुत ज़्यादा होता है, और उन पर ऋणात्मक आवेश (नेगेटिव चार्ज) रहता है। जब झाग त्वचा पर रहता है, तो अतिरिक्त तेल, धूल, मृत कोशिकाएँ और प्रदूषण के कण मिट्टी की सतह से चिपक जाते हैं और पानी डालने पर मिट्टी के साथ ही धुल जाते हैं।
SLS वाला साबुन गंदगी के साथ त्वचा का ज़रूरी तेल भी घोल सकता है, जबकि मुल्तानी मिट्टी मुख्य रूप से ऊपर जमी गंदगी और अतिरिक्त तेल को पकड़ती है। इसीलिए इसकी सफ़ाई को अपेक्षाकृत सौम्य माना जाता है।
मुल्तानी मिट्टी में मैग्नीशियम, सिलिका, कैल्शियम और आयरन ऑक्साइड जैसे खनिज भी होते हैं। नहाने के बाद त्वचा का मुलायम और ताज़ा महसूस होना इन्हीं से जोड़ा जाता है।
किन लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए और इस साबुन की सीमाएँ
आयुर्वेद में दोषों के आधार पर देखें तो यह साबुन कफ प्रकृति (ज़्यादा तेल वाली, भारी और सुस्त दिखने वाली त्वचा) और पित्त प्रकृति (शरीर में ज़्यादा गर्मी, जल्दी लाल होने वाली त्वचा) के लिए ज़्यादा उपयुक्त माना जाता है। वात प्रकृति की बहुत रूखी त्वचा में मिट्टी से रूखापन बढ़ सकता है, इसलिए ऐसी त्वचा के लिए नीचे दी गई पहली सावधानी ध्यान में रखें।

इन स्थितियों में खास ध्यान रखें:
- सर्दियों में बहुत रूखी त्वचा — एक दिन छोड़कर इस्तेमाल करें और नहाने के बाद हल्की नम त्वचा पर नारियल तेल, कुमकुमादि तैलम या मॉइस्चराइज़र की पतली परत लगाएँ।
- एक साल से छोटे बच्चे — यह साबुन उनके लिए नहीं है, क्योंकि उनकी त्वचा की सुरक्षा परत अभी विकसित हो रही होती है।
- किसी सामग्री से एलर्जी — नीम, नारियल, अरंडी, हल्दी, मुलेठी, पुदीना, अजवाइन या शिया बटर से एलर्जी हो, तो यह साबुन इस्तेमाल न करें। किसी सामग्री को लेकर संदेह हो, तो पहले कान के पीछे 48 घंटे का पैच टेस्ट कर लें।
- रिसता हुआ एक्ज़िमा या खुले घावों वाला डर्मेटाइटिस — ऐसी सक्रिय तकलीफ़ में कोई भी साबुन उपयुक्त नहीं माना जाता; पहले डॉक्टर की देखरेख में त्वचा को शांत होने दें।
अगर आपकी कोई त्वचा समस्या चल रही है, आप गर्भवती हैं, बच्चे के लिए साबुन चुन रहे हैं या कोई दवा ले रहे हैं, तो इस्तेमाल से पहले डॉक्टर या वैद्य से सलाह ज़रूर लें।
कुछ दावे हम नहीं करते, क्योंकि वे सही नहीं हैं:
- यह गोरापन लाने वाला साबुन नहीं है। मुल्तानी मिट्टी त्वचा का प्राकृतिक रंग तय करने वाले मेलानिन को नहीं बदल सकती।
- यह मुँहासों के गहरे, गड्ढेदार निशान नहीं भर सकता। ऐसे निशानों के लिए माइक्रोनीडलिंग या लेज़र जैसे तरीके अपनाए जाते हैं।
- यह गहरे, गाँठ वाले मुँहासों (सिस्टिक एक्ने) का समाधान नहीं है। इसे रोज़ की देखभाल का हिस्सा भर मानें; ऐसे मुँहासों के लिए त्वचा विशेषज्ञ (डर्मेटोलॉजिस्ट) से सलाह लें।
- इसकी खुशबू परफ़्यूम जैसी नहीं है। महक हल्की और मिट्टी जैसी है, इसलिए दो हफ़्ते बाद आम खुशबूदार साबुन आपको तेज़ लग सकते हैं।
पहले हफ़्ते से तीसरे महीने तक क्या बदल सकता है
यह एक सामान्य अंदाज़ा है; त्वचा, मौसम और आदतों के अनुसार बदलाव की रफ़्तार हर व्यक्ति में अलग हो सकती है।
पहला हफ़्ता — त्वचा साफ़ महसूस हो सकती है, और आम साबुन के बाद होने वाला सूखा खिंचाव कम रह सकता है। ताज़गी का एहसास दिन में देर तक बना रह सकता है।
पहला महीना — तैलीय हिस्सों की चिकनाई, खुरदुरापन और पसीने से उभरने वाले छोटे दाने पहले से कम दिख सकते हैं, और रंगत ज़्यादा एक-सी लग सकती है। दिन में दो बार चेहरा धोने वाले कुछ लोगों को एक बार धोना ही काफ़ी लग सकता है।
तीसरा महीना — त्वचा लगातार ज़्यादा साफ़ दिख सकती है, और कोहनी व घुटने ज़्यादा चिकने लग सकते हैं। शरीर की गंध भी कम महसूस हो सकती है, जिसे नीम के तेल से जोड़ा जाता है। कुछ लोगों को अलग फेस वॉश या टोनर की ज़रूरत भी कम लग सकती है।
मौसम के हिसाब से: बरसात (वर्षा ऋतु) में त्वचा को साफ़ और ताज़ा रखने के लिए, और गर्मी (ग्रीष्म ऋतु) में पसीने से होने वाली असुविधा के दिनों में यह साबुन खास तौर पर उपयोगी माना जाता है।
चार साबुन ₹539 के क्यों, जबकि आम साबुन ₹35 का आता है
कीमत का यह अंतर सामग्री और बनाने के तरीके से आता है।
मुल्तानी मिट्टी की मात्रा — ₹30–40 में बिकने वाले कई 'मुल्तानी मिट्टी साबुनों' में मिट्टी की मात्रा अक्सर नाम भर की होती है। बाकी ज़्यादातर हिस्सा औद्योगिक साबुन-दाने (सोप नूडल्स), SLS, पैराबेन, खुशबू और रंग का होता है। हमारे साबुन में मुल्तानी मिट्टी ही मुख्य आधार है, और उसके साथ 15 दूसरी सामग्रियाँ हैं जिनका अपना-अपना काम है।
कोल्ड-प्रोसेस में हाथ से बना — बड़े पैमाने पर बनने वाला साबुन आम तौर पर हॉट-प्रोसेस से, यानी बड़े बर्तनों में तेज़ आँच पर बनता है, और माना जाता है कि तेज़ गर्मी में कई उपयोगी तत्व कम हो जाते हैं। कोल्ड-प्रोसेस में तेल कमरे के तापमान पर साबुन में बदलता है, फिर साबुन को 4–6 हफ़्ते सूखने और पकने दिया जाता है, जिससे ये तत्व अधिक बचे रह सकते हैं।
भराव या झाग बढ़ाने वाले रसायन नहीं — इन्हें न मिलाने से साबुन का वज़न उसकी असल सामग्रियों से ही बनता है। चारों तेल भी कोल्ड-प्रेस्ड लिए जाते हैं। रिफ़ाइंड तेल सस्ता पड़ता है, पर माना जाता है कि उसमें एंटीऑक्सीडेंट जैसे कई उपयोगी तत्व बहुत कम रह जाते हैं।
₹539 में 400 ग्राम साबुन मिलता है, यानी 100 ग्राम के 4 साबुन।
चेहरे और शरीर पर इस्तेमाल का सही तरीका
मुल्तानी मिट्टी को गंदगी पकड़ने के लिए थोड़ा समय चाहिए, इसलिए झाग को तुरंत न धोएँ।

चेहरे के लिए
- चेहरा गुनगुने पानी से गीला करें; माना जाता है कि इससे रोमछिद्र खुलते हैं।
- साबुन सीधे चेहरे पर न रगड़ें; हथेलियों के बीच झाग बनाएँ।
- झाग को 45–60 सेकंड तक गोल-गोल हल्के हाथ से मलें।
- झाग को 1–2 मिनट चेहरे पर रहने दें।
- ठंडे पानी से धो लें; माना जाता है कि इससे रोमछिद्र बंद होते हैं।
- चाहें तो बाद में गुलाब जल को टोनर की तरह लगाएँ।
शरीर के लिए
- शरीर को गुनगुने पानी से गीला करें।
- हथेलियों में या किसी मुलायम कपड़े पर झाग बनाएँ।
- पूरे शरीर पर नीचे से ऊपर की ओर लंबे हाथ चलाते हुए लगाएँ।
- कोहनी, घुटने और एड़ी जैसे खुरदुरे हिस्सों पर थोड़ा ज़्यादा मलें।
- झाग को 1–2 मिनट रहने दें, फिर पानी से अच्छी तरह धो लें।
सुबह के स्नान को इसके लिए उपयुक्त समय माना जाता है। आम तौर पर इसे रोज़ इस्तेमाल किया जा सकता है; बहुत रूखी त्वचा के लिए ऊपर दी गई सावधानी देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
आयुर्वेदिक साबुन कौन सा है? (ayurvedic sabun kaun sa hai / आयुर्वेदिक साबण) +
आयुर्वेदिक साबुन उसे माना जाता है जिसकी सफ़ाई का आधार पारंपरिक उबटन हो — मुल्तानी मिट्टी, दाल-अनाज के आटे, कोल्ड-प्रेस्ड तेल और हल्दी-मुलेठी जैसी जड़ी-बूटियाँ। लेबल पर SLS (या दूसरे नामों से छिपा SLS), SLES, पैराबेन, PEG और सिंथेटिक खुशबू नहीं होनी चाहिए।
मुल्तानी मिट्टी साबुन के फायदे क्या हैं? (multani mitti sabun ke fayde) +
मुल्तानी मिट्टी अतिरिक्त तेल, धूल और मृत कोशिकाओं को अपनी सतह पर पकड़कर पानी के साथ बहा देती है, जबकि त्वचा का ज़रूरी तेल काफ़ी हद तक बना रहता है। इसलिए त्वचा साफ़ लगती है और खिंचाव कम महसूस हो सकता है, खासकर कफ प्रकृति की तैलीय त्वचा और पित्त प्रकृति की जल्दी गर्म या लाल होने वाली त्वचा में।
साबुन को इंग्लिश में क्या कहते हैं? (sabun ko english mein kya kahate hain) +
साबुन को अंग्रेज़ी में 'soap' कहते हैं। हम 'साबुन' इसलिए लिखते हैं क्योंकि भारत के ज़्यादातर घरों में यही शब्द बोला जाता है।
नहाने के बाद त्वचा के खिंचाव को इंग्लिश में क्या बोलते हैं? (khinchav ko english mein kya bolate hain) +
इसे अंग्रेज़ी में आम तौर पर 'tight, pulled feeling' कहा जाता है। ज़्यादातर आम साबुनों का pH 9 से 10 के बीच होता है, जबकि स्वस्थ त्वचा हल्की अम्लीय रहती है, और यही अंतर इस एहसास की एक वजह माना जाता है।
मुल्तानी मिट्टी साबुन और खुले मुल्तानी मिट्टी पाउडर में क्या अंतर है? +
मुख्य सामग्री एक ही है, बस रूप अलग है। साबुन रोज़ की आसान सफ़ाई के लिए है, जिसमें झाग बनाकर धो लिया जाता है। खुला पाउडर फेस पैक के लिए है, जिसे 15–20 मिनट लगाकर हफ़्ते में 2–3 बार इस्तेमाल किया जाता है।
क्या इस साबुन से त्वचा गोरी होती है? +
नहीं। यह धूप की टैनिंग, फीकापन और मृत कोशिकाएँ हटाकर त्वचा को साफ़ और निखरा दिखा सकता है, लेकिन त्वचा का असली रंग नहीं बदलता। साबुन से गोरेपन का दावा त्वचा के विज्ञान से मेल नहीं खाता।
क्या यह साबुन संवेदनशील त्वचा के लिए उपयुक्त है? +
इसमें SLS, पैराबेन या सिंथेटिक खुशबू नहीं है, और मिट्टी व नीम के तेल को सौम्य माना जाता है। फिर भी बहुत जल्दी प्रतिक्रिया करने वाली त्वचा हो तो पहले पैच टेस्ट कर लें।