चरक संहिता में काम के नियम: काम न टालें, गुस्से में फ़ैसला न लें

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चरक संहिता में काम के नियम: काम न टालें, गुस्से में फ़ैसला न लें

सारांश: चरक संहिता का सूत्रस्थान 8.27 सद्वृत्त (अच्छे आचरण की संहिता) का काम-काज से जुड़ा श्लोक है। इसकी तीन बातें सबसे अहम हैं: काम का समय निकलने न दें, गुस्से या बहुत ज़्यादा खुशी में फ़ैसला न लें, और किसी की कड़वी बात को बार-बार याद न करें। चरक इनके कारण नहीं बताते, पर आज की रिसर्च तीनों से मेल खाती है।

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पढ़ने का समय: 11 मिनट

Read this article in English: Rules for Work in Charaka Samhita (Sutrasthana 8.27): Don't Put Work Off (Dirghasutri), Don't Decide in Anger, Don't Replay an Insult

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चरक संहिता में काम के नियम: सद्वृत्त और सूत्रस्थान 8.27

एक चिकित्सा-ग्रंथ में काम के नियम अजीब लग सकते हैं, पर सूत्रस्थान का आठवाँ अध्याय, इन्द्रियोपक्रमणीय अध्याय, इन्द्रियों (ज्ञान और कर्म की इन्द्रियों) और उन्हें चलाने वाले मन की देखभाल का अध्याय है। पूरा अध्याय हमने चरक संहिता भाग 8 में, और इसके वाणी वाले नियम चरक संहिता में बोलने के नियम में समझाए हैं। यह लेख उसके एक श्लोक, 8.27, पर है।

श्लोक 8.17 कहता है कि जो भी अपना भला चाहता है, वह सद्वृत्त (अच्छे आचरण) का पालन पूरा, हमेशा और पूरे ध्यान के साथ करे (सर्वदा स्मृतिमास्थाय)। श्लोक 8.18 के अनुसार इसका पालन एक साथ दो चीज़ें देता है: आरोग्य (अच्छी सेहत) और इन्द्रिय-विजय (इन्द्रियों पर नियंत्रण)। आगे के श्लोक शरीर से बाहर की ओर बढ़ते हैं: साफ़-सफ़ाई और कपड़ों से बोलचाल और व्यवहार तक, और फिर भोजन, पढ़ाई और मन की आदतों तक।

8.27 इसी आख़िरी समूह में है, और इसका विषय है काम करता हुआ मन: वह किसी काम, लालच, नाकामी, सफलता या अपमान को कैसे संभालता है। चरक के ढाँचे में काम टालना और काम पर गुस्सा सिर्फ़ स्वभाव की बात नहीं, बल्कि उसी इन्द्रिय-विजय की चूक है जिसका वादा 8.18 करता है।

यह श्लोक मना करने वाली बातों का एक लंबा वाक्य है, जिसके अंत के पास दो सकारात्मक पंक्तियाँ आती हैं। इसका संस्कृत पाठ चरक संहिता रिसर्च, ट्रेनिंग एंड स्किल डेवलपमेंट सेंटर के 2020 के संस्करण से लिया गया है।

सादी मेज़ पर रखी कपड़े में लिपटी पोथी; चरक संहिता जैसे ग्रंथ सदियों तक इसी रूप में सहेजे गए

चरक संहिता, सूत्रस्थान 8.27

न कार्यकालमतिपातयेत्, नापरीक्षितमभिनिविशेत्, नेन्द्रियवशगः स्यात्, न चञ्चलं मनोऽनुभ्रामयेत्, न बुद्धीन्द्रियाणामतिभारमादध्यात्, न चातिदीर्घसूत्री स्यात्, न क्रोधहर्षावनुविदध्यात्, न शोकमनुवसेत्, न सिद्धावुत्सेकं यच्छेन्नासिद्धौ दैन्यं, प्रकृतिमभीक्ष्णं स्मरेत्, हेतुप्रभावनिश्चितः स्याद्धेत्वारम्भनित्यश्च, न कृतमित्याश्वसेत्, न वीर्यं जह्यात्, नापवादमनुस्मरेत्॥

पंद्रह पंक्तियाँ, सरल अर्थ के साथ (अर्थ हमारे अपने हैं, 2020 संस्करण के अंग्रेज़ी अनुवाद से मिलाए गए)

  1. न कार्यकालमतिपातयेत् — काम का समय हाथ से निकलने न दें।
  2. नापरीक्षितमभिनिविशेत् — बिना जाँचे-परखे किसी काम में हाथ न डालें।
  3. नेन्द्रियवशगः स्यात् — इन्द्रियों के वश में न रहें।
  4. न चञ्चलं मनोऽनुभ्रामयेत् — चंचल मन को जहाँ चाहे भटकने न दें।
  5. न बुद्धीन्द्रियाणामतिभारमादध्यात् — बुद्धि और इन्द्रियों पर ज़रूरत से ज़्यादा बोझ न डालें।
  6. न चातिदीर्घसूत्री स्यात् — काम को बेवजह लंबा न खींचें।
  7. न क्रोधहर्षावनुविदध्यात् — गुस्से में या बहुत ज़्यादा खुशी में आकर कुछ न करें।
  8. न शोकमनुवसेत् — दुख में ही डूबे न रहें।
  9. न सिद्धावुत्सेकं यच्छेत् — सफलता मिलने पर घमंड न करें।
  10. नासिद्धौ दैन्यं — और असफलता में हताश न हों।
  11. प्रकृतिमभीक्ष्णं स्मरेत् — अपनी प्रकृति (अपने स्वभाव) को बार-बार याद रखें।
  12. हेतुप्रभावनिश्चितः स्यात् — भरोसा रखें कि हर कारण का असर होता है।
  13. हेत्वारम्भनित्यश्च — और कारणों पर लगातार काम करते रहें।
  14. न कृतमित्याश्वसेत् — "काम हो गया" सोचकर आराम से न बैठ जाएँ (2020 संस्करण इस पंक्ति को "निराश न हों" के अर्थ में पढ़ता है)।
  15. न वीर्यं जह्यात्, नापवादमनुस्मरेत् — अपना प्रयास न छोड़ें, और किसी की निंदा को बार-बार याद न करें।

दो शब्द ध्यान देने लायक हैं। दीर्घसूत्री का शाब्दिक अर्थ है "लंबे धागे वाला", यानी काम को खींचते चले जाने वाला; टालमटोल करने वाले के लिए संस्कृत में यह शब्द अंग्रेज़ी से बहुत पहले से था। अपवाद यानी दोष, निंदा या आपसे या आपके बारे में कही गई कोई भी कड़वी बात, और अनुस्मरेत् यानी उसे बार-बार याद करना। चरक कारण नहीं बताते; आगे दिए गए कारण आज की रिसर्च से हैं, और उनका श्रेय शोधकर्ताओं को है, चरक को नहीं।

पहला नियम: काम का समय न टालें, दीर्घसूत्री न बनें

श्लोक एक ही कमी पर दो बार लौटता है: पहली पंक्ति में काम का समय न निकलने देने की बात है, और छठी में दीर्घसूत्री न बनने की। यह आदत लगभग सभी जानते हैं। काम मुश्किल नहीं, उसका समय भी आ चुका है, फिर भी वह कल की सूची में चला जाता है, जहाँ कल वाला काम पहले से इंतज़ार कर रहा होता है।

देर रात मेज़ पर बिखरे काग़ज़: टाले गए काम का तनाव, जो डेडलाइन आने पर इकट्ठा हो जाता है

इस आदत की कीमत पर एक जाना-माना अध्ययन 1997 में डायन टाइस और रॉय बॉमाइस्टर ने Psychological Science में प्रकाशित किया। उन्होंने यूनिवर्सिटी के छात्रों को पूरे एक सत्र तक देखा, नापा कि कौन कितना काम टालता है, और उनके तनाव, सेहत और अंकों का हिसाब रखा।

शुरुआत में काम टालने वाले छात्र बेहतर दिखे: उन्होंने कम तनाव और बीमारी के कम लक्षण बताए। पर सत्र के अंत तक तस्वीर पलट गई। डेडलाइन पास आते ही उनमें तनाव और बीमारी के लक्षण ज़्यादा थे, पूरे सत्र का जोड़ भी ज़्यादा निकला, और असाइनमेंट व परीक्षाओं में अंक भी कम रहे।

लेखकों का निष्कर्ष सीधा था: शुरुआत की राहत बाद की कीमत की भरपाई नहीं करती। चरक की पंक्ति के लिए कोई कारण देना हो, तो वह लगभग यही होगा। काम टालना आराम जैसा लगता है, पर असल में यह उधार है, जो डेडलाइन आने पर ब्याज समेत चुकाना पड़ता है।

काम टालने की आदत कैसे छोड़ें: दस मिनट वाला तरीका

चरक नियम बताते हैं, उसे निभाने का तरीका नहीं। पर इसे रोज़ के काम में उतारने का एक आसान तरीका है।

आज़माकर देखें: जो काम दस मिनट या उससे कम का है, उसे ध्यान में आते ही कर डालें: कोई जवाब, कोई फ़ॉर्म, कोई फ़ोन कॉल। बड़े काम का पहला दस मिनट का कदम तय करें और अभी सिर्फ़ वही करें। ज़्यादातर टालमटोल काम शुरू करने को लेकर होती है; काम शुरू हो जाए, तो बाकी अक्सर अपने-आप आगे बढ़ने लगता है।

सुबह-सुबह मेज़ पर एक छोटा काम निपटाती महिला, जिसने उसे बाद के लिए नहीं छोड़ा

इसका संतुलन भी इसी श्लोक में है। दूसरी पंक्ति, नापरीक्षितमभिनिविशेत्, कहती है कि बिना जाँचे-परखे किसी काम में हाथ न डालें। यानी चरक जल्दबाज़ी नहीं चाहते: काम पहले परखा जाए, फिर तय हो, और समय आने पर किया जाए, न हड़बड़ी में और न टालकर।

दूसरा नियम: गुस्से या ज़्यादा खुशी में फ़ैसला न लें

सातवीं पंक्ति कहती है: न क्रोधहर्षावनुविदध्यात्, यानी क्रोध (गुस्सा) या हर्ष (बहुत ज़्यादा खुशी और उत्साह) के कहने पर कुछ न करें। ज़्यादातर सलाह सिर्फ़ गुस्से से सावधान करती है, पर चरक दोनों को साथ रखते हैं। मानो दिक्कत ख़राब मूड की नहीं, बल्कि किसी भी ऐसी तेज़ भावना की हो जो फ़ैसले को धकेल दे।

गुस्से में फ़ोन पर संदेश भेजने ही वाला एक आदमी, वही पल जिसके लिए चरक का यह नियम है

आज की रिसर्च में भी यही जोड़ी दिखती है। 2001 में जेनिफ़र लर्नर और डैकर केल्टनर ने Journal of Personality and Social Psychology में "Fear, Anger, and Risk" (डर, गुस्सा और जोखिम) नाम का अध्ययन प्रकाशित किया, जिसमें देखा गया कि गुस्से, डर या खुशी की हालत में लोग जोखिम को कैसे आँकते हैं, सामान्य मूड में भी और प्रयोगशाला में जगाए गए मूड में भी।

गुस्से वाले लोगों ने जोखिम को कम आँका और ज़्यादा जोखिम वाले विकल्प चुने, जबकि डरे हुए लोगों ने उल्टा किया। इन आकलनों में गुस्सा डर से ज़्यादा खुशी जैसा निकला: दोनों ने ख़तरे को छोटा दिखाया।

यानी गुस्से से भरा मन ख़तरे को असल से कम देखता है, और बहुत उत्साहित मन भी। ऐसे ही समय लोग वह संदेश भेज देते हैं, सौदा कर लेते हैं, नौकरी छोड़ देते हैं या ऐसा वादा कर बैठते हैं, जो एक घंटे बाद नहीं करते। चरक की पंक्ति उसी एक घंटे का ठहराव माँगती है।

गुस्से में फ़ैसला लेने से पहले कैसे रुकें

इस नियम का अभ्यास भी छोटा और सीधा है। इसमें बस भावना और फ़ैसले के बीच थोड़ा समय रखना होता है।

आज़माकर देखें: गुस्से में हों और ज़रूरी लगे, तो संदेश लिख लें, पर भेजें नहीं। फ़ोन उल्टा रख दें और मन शांत होने तक रुकें, चाहे अगली सुबह तक ही क्यों न रुकना पड़े। उत्साह के किसी पल में लिए गए बड़े "हाँ" वाले फ़ैसलों के साथ भी यही करें: एक रात सोचकर तय करें।

फ़ोन नीचे रखा, आँखें बंद और एक धीमी साँस: गुस्से में लिखा संदेश भेजने से पहले रुकना

इसमें कहीं नहीं कहा गया कि गुस्सा या खुशी महसूस ही न करें। श्लोक की क्रिया अनुविदध्यात् है, यानी किसी के कहे अनुसार चलना। नियम भावना के होने के बारे में नहीं, भावना को फ़ैसला करने देने के बारे में है।

तीसरा नियम: किसी की कड़वी बात को बार-बार याद न करें

श्लोक की आख़िरी पंक्ति है नापवादमनुस्मरेत्। मान लीजिए किसी ने मीटिंग में आपके काम की आलोचना की, या कोई चुभने वाली बात कह दी। नियम यह नहीं पूछता कि वह सही था या नहीं; उसका ध्यान इस पर है कि बाद में उस बात को मन में दोहराते रहने से क्या होता है।

ब्रैड बुशमैन और उनके चार साथियों ने 2005 में Journal of Personality and Social Psychology में ठीक यही परखा; शोधपत्र का शीर्षक था "Chewing on It Can Chew You Up", यानी किसी बात को मन में चबाते रहना आख़िर में आपको ही चबा सकता है। पहले लोगों को उकसाया गया। फिर कुछ से उसी बात पर सोचते रहने को कहा गया, और कुछ को सोचने के लिए कोई और विषय दिया गया।

किसी की कही बात को मन में दोहराने की बजाय शाम की सैर पर निकला व्यक्ति

इसके बाद एक दूसरे व्यक्ति, एक अनाड़ी रिसर्च असिस्टेंट, ने उन्हें हल्की खीज दिलाई। जो लोग उकसावे पर सोचते रहे थे, वे इस बेकसूर व्यक्ति के साथ ध्यान बँटाए गए लोगों से ज़्यादा आक्रामक रहे। एक प्रयोग में यह अंतर तब भी बना रहा, जब सोचते रहने वाला हिस्सा आठ घंटे पहले हुआ था।

यह नतीजा व्यवहार में चरक की पंक्ति के काफ़ी क़रीब है। अपमान को दोहराने से बात सुलझती नहीं, गुस्सा बना रहता है, और देर-सबेर किसी ऐसे व्यक्ति पर निकलता है जिसका उससे कोई लेना-देना नहीं: रात के खाने पर परिवार का कोई सदस्य, या अगली सुबह कोई सहकर्मी।

आज़माकर देखें: जब वही बातें बार-बार लौटें, तो उठकर कोई दूसरा काम शुरू कर दें: थोड़ी सैर, किसी दोस्त को फ़ोन, बाहर का कोई काम, या हाथों से होने वाला कोई काम। रिसर्च में और सोचने से नहीं, ध्यान बँटाने से ही गुस्सा उतरा था।

पंद्रहवीं पंक्ति इसके साथ एक और बात रखती है: न वीर्यं जह्यात्, यानी प्रयास न छोड़ें। बार-बार दोहराई गई कड़वी बात का अंत अक्सर यही होता है कि इंसान कोशिश ही छोड़ दे। श्लोक दोनों का उल्टा माँगता है: बातों को जाने दें, और काम चलता रहने दें।

श्लोक की बाकी बातें: सफलता, असफलता, ज़्यादा बोझ और प्रयास

श्लोक की बाकी पंक्तियों पर रिसर्च उतनी सीधी बात नहीं करती। फिर भी उनमें से कई आज के दफ़्तर पर किसी मैनेजमेंट की किताब जितनी ही लागू होती हैं।

  • सफलता और असफलता (पंक्ति 9 और 10) — चरक घमंड और हताशा को एक ही भूल मानते हैं: नतीजे को मन चलाने देना। वे जिस व्यक्ति का वर्णन करते हैं, वह सफलता में फूलता नहीं, असफलता में टूटता नहीं, और दोनों हालत में काम पर लौट आता है।
  • ज़्यादा बोझ (पंक्ति 5) — आज यह पंक्ति खुले टैब, लगातार आते नोटिफ़िकेशन और एक साथ तीन काम वाले दिन की बात लगती है। इन्द्रियों की देखभाल वाला यह अध्याय यहाँ काम पर लागू होता है: एक साथ बहुत कुछ सौंपा गया मन हर काम थोड़ा कमज़ोर करता है।
  • चंचल मन और इन्द्रियाँ (पंक्ति 3 और 4) — आज इसका सबसे जाना-पहचाना रूप वह फ़ोन है, जो हर कुछ मिनट में नज़र को काम से खींच लेता है।
  • शोक (पंक्ति 8) — मतलब यह नहीं कि दुखी न हों, बल्कि यह कि दुख को घर न बना लें; यह कड़वी बात न दोहराने वाले नियम के क़रीब है।
  • अपना स्वभाव और कारण (पंक्ति 11 से 13) — यह आयुर्वेद की सोचने की आदत है, जो यहाँ काम पर लागू होती है: नतीजे आपके किए से आते हैं, इसलिए अपने किए पर ध्यान दें।
  • निश्चिंत होकर न बैठें (पंक्ति 14) — शाब्दिक अर्थ है "काम हो गया" सोचकर आराम से न बैठ जाना, यानी पहली बार काम पूरा होते ही रुक न जाना। 2020 संस्करण इसे निराश न होने की सलाह के रूप में पढ़ता है, इसलिए हम दोनों अर्थ दे रहे हैं।

इस हफ़्ते इन नियमों का अभ्यास कैसे करें

चरक अच्छे आचरण का पालन हमेशा करने को कहते हैं, इसलिए एक हफ़्ता बस शुरुआत है, पर इन आदतों को पहचानने के लिए काफ़ी है। एक बार में एक नियम पर चलना आसान रहता है।

  • दिन 1 और 2: न कार्यकालमतिपातयेत् — दस मिनट वाले काम तुरंत करें, और टले हुए एक बड़े काम के सिर्फ़ पहले दस मिनट।
  • दिन 3 और 4: न क्रोधहर्षावनुविदध्यात् — गुस्से में कुछ ज़रूरी न लिखें, बहुत उत्साह में कुछ ज़रूरी न भेजें।
  • दिन 5 और 6: नापवादमनुस्मरेत् — किसी की कही बात लौटे, तो उठकर काम बदलें, और देखें कि वह कितनी बार लौटती है और कितनी जल्दी हल्की पड़ती है।
  • दिन 7: सिद्धि और असिद्धि — हफ़्ते की एक अच्छी रही बात और एक न बनी बात चुनें, हर एक के कारण (चरक के शब्दों में हेतु) पर एक पंक्ति लिखें, और अगले हफ़्ते के लिए एक कदम तय करें।

एक पंक्ति में: काम अभी करें, फ़ैसला शांत होकर लें, कड़वी बातों को जाने दें। इन्हीं तीन नियमों पर बनी हमारी रील का सार यही है।

ये नियम क्या नहीं हैं: ये किसी समस्या की पहचान नहीं हैं। काम टालना, तेज़ गुस्सा और चुभी बातों को दोहराना आम इंसानी आदतें हैं; पर अगर इनके साथ लगातार उदासी, नींद न आना या बेकाबू गुस्सा हो, तो इसके लिए किसी श्लोक की बजाय डॉक्टर या काउंसलर से बात करें। कोई चल रही स्वास्थ्य समस्या, गर्भावस्था, बच्चों से जुड़ा सवाल या चल रही दवा हो, तो डॉक्टर या वैद्य की सलाह को ही प्राथमिकता दें।

ऊपर के तीनों अध्ययन चरक का प्रमाण भी नहीं हैं: ये ज़्यादातर अमेरिका के छात्रों और वयस्कों पर हुए, कई लोगों का औसत बताते हैं, और लगभग दो हज़ार साल पुराने ग्रंथ को परखने के लिए नहीं बने थे। वे बस इतना दिखाते हैं कि सेहत और इन्द्रियों पर नियंत्रण के लिए लिखे गए नियम, लोगों के काम करने और महसूस करने की आज की समझ से मेल खाते हैं।

हमारी ओर से: इन नियमों के लिए किसी प्रोडक्ट की ज़रूरत नहीं है। अगर फिर भी आप कुछ देखना चाहें, तो हमारा सबसे जाना-पहचाना प्रोडक्ट दिव्य स्नान मुल्तानी मिट्टी साबुन है: मुल्तानी मिट्टी पर आधारित, हाथ से छोटे बैच में बना नहाने का सादा साबुन, 100 ग्राम की चार टिकियों के पैक में।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

चरक संहिता में काम के बारे में क्या कहा गया है? +

सूत्रस्थान 8.27, जो सद्वृत्त (अच्छे आचरण की संहिता) का हिस्सा है, काम-काज के पंद्रह नियम देता है। इनमें प्रमुख हैं: काम का समय निकलने न दें, गुस्से या बहुत ज़्यादा खुशी में आकर कुछ न करें, किसी की निंदा को बार-बार याद न करें, सफलता में घमंड और असफलता में हताशा से बचें, और प्रयास न छोड़ें।

आयुर्वेद में दीर्घसूत्री (dirghasutri) किसे कहते हैं? +

दीर्घसूत्री का शाब्दिक अर्थ है "लंबे धागे वाला", यानी काम को खींचते चले जाने वाला, टालमटोल करने वाला। सूत्रस्थान 8.27 कहता है न चातिदीर्घसूत्री स्यात् (काम को लंबा न खींचें), और इसके साथ न कार्यकालमतिपातयेत् (काम का समय निकलने न दें)।

क्या आयुर्वेद गुस्से में फ़ैसला न लेने की सलाह देता है? +

हाँ। सूत्रस्थान 8.27 कहता है न क्रोधहर्षावनुविदध्यात्: गुस्से या बहुत ज़्यादा खुशी के कहने पर कुछ न करें। लर्नर और केल्टनर (2001) की रिसर्च में गुस्से और खुशी दोनों ने जोखिम को छोटा दिखाया, जबकि डर ने बड़ा।

नापवादमनुस्मरेत् (napavadam anusmaret) का क्या अर्थ है? +

यह सूत्रस्थान 8.27 की आख़िरी पंक्ति है: किसी की निंदा या कड़वी बात (अपवाद) को बार-बार याद न करें। बुशमैन और साथियों (2005) की रिसर्च में उकसावे पर सोचते रहने से गुस्सा बना रहा, और लोगों ने उसे किसी और पर निकाला।

एक चिकित्सा-ग्रंथ में काम के नियम क्यों हैं? +

सूत्रस्थान 8 इन्द्रियों और मन की देखभाल का अध्याय है, और 8.18 के अनुसार इसकी आचरण-संहिता, सद्वृत्त, से आरोग्य और इन्द्रिय-विजय एक साथ मिलते हैं। श्लोक 8.27 इसी इन्द्रिय-विजय को काम करते हुए मन पर लागू करता है।

यह चरक संहिता में कहाँ है, और कौन-सा अनुवाद इस्तेमाल हुआ है? +

चरक संहिता, सूत्रस्थान, अध्याय 8 (इन्द्रियोपक्रमणीय अध्याय), श्लोक 27। संस्कृत पाठ चरक संहिता रिसर्च, ट्रेनिंग एंड स्किल डेवलपमेंट सेंटर के 2020 के संस्करण से है; सरल अर्थ हमारे अपने हैं, उसी संस्करण से मिलाए गए।

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