सारांश: अष्टांग हृदय के सूत्रस्थान 26 का दूसरा भाग धारदार शस्त्रों के बाद उन साधनों पर आता है जिनमें धार नहीं होती: जोंक, सींग, सूखी लौकी और मिट्टी का घड़ा। यह लेख आर॰ विद्यानाथ के चौखंबा संस्करण (पृष्ठ 371–377) के आधार पर बताता है कि ग्रंथ में क्या लिखा है। यह पाठ-अध्ययन है, कोई विधि या चिकित्सा-सलाह नहीं।
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Read this article in English: Jalaukavacharana in Ashtanga Hridaya Sutrasthana 26: Vagbhata's Twelve Leeches and the Gourd That Makes Its Own Vacuum
- जलौकावचारण क्या है और रक्तमोक्षण की छह विधियाँ
- सविष और निर्विष जोंक की पहचान
- जोंक के बारह नाम और आकार का नियम
- जोंक को जीवित कैसे रखा जाता था
- हंस-न्याय और तैरने से जोंक की परख
- शृंग (सींग), अलाबु (तुम्बी), घटी यंत्र और प्रच्छान
- प्रक्रिया के बाद की देखभाल और प्रस्थ की मात्रा
- अध्याय का अंत और इस लेख की सीमाएँ
- अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

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इस अध्याय के ठंडक देने वाले पदार्थ चंदन, खस और मुलेठी इस चेहरे के तेल में भी हैं; यह केवल त्वचा पर बाहरी उपयोग का सौंदर्य-तेल है। इस लेख में बताई किसी प्रक्रिया से इसका कोई संबंध नहीं है।
प्रोडक्ट देखें →जलौकावचारण क्या है: अष्टांग हृदय, सूत्रस्थान 26 और रक्तमोक्षण की छह विधियाँ
पहले यह पढ़ें: यह लेख लगभग चौदह सौ साल पुराने एक संस्कृत चिकित्सा-ग्रंथ के पाठ का वर्णन है, कोई निर्देश या चिकित्सा-सलाह नहीं। रक्तमोक्षण और जलौकावचारण आज जहाँ भी अपनाए जाते हैं, वहाँ योग्य, पंजीकृत चिकित्सक ही क्लिनिक में कीटाणुरहित, एक बार इस्तेमाल होने वाली सामग्री से करते हैं। यहाँ लिखी किसी बात को आज़माने की कोशिश न करें, और किसी चल रही स्वास्थ्य समस्या, गर्भावस्था, बच्चों या दवाओं के मामले में डॉक्टर या वैद्य से सलाह लें।
अष्टांग हृदय के सूत्रस्थान का छब्बीसवाँ अध्याय शस्त्र विधि है। इसके शुरुआती तीस से कुछ अधिक श्लोक छब्बीस धारदार शस्त्रों पर हैं: उनका लोहा, उनके काम, उन्हें अयोग्य बनाने वाले दोष और ऊन की परत वाला उनका डिब्बा। फिर श्लोक 34 के आसपास शीर्षक वही रहता है, पर विषय बदल जाता है, और वाग्भट उसी बारीकी से एक कीड़े, एक सींग, एक सब्ज़ी और एक घड़े का वर्णन करने लगते हैं।
यह हिस्सा रक्तमोक्षण (शरीर से रक्त निकालने की शास्त्रीय विधियाँ) का है, और इसका लंबा केंद्रीय अंश जलौकावचारण, यानी जोंक (जलौका) के प्रयोग पर है। यह किसी रोग का नहीं, एक जीव और तीन उपकरणों का तकनीकी विवरण है। जोंक को उसी अनु-शस्त्र श्रेणी में रखा गया है जो वाग्भट पहले भाग में पत्ते, नाखून, स्फटिक, क्षार और अग्नि जैसी चीज़ों के लिए बना चुके हैं, और अंत में संपादक जोंक, शृंग और अलाबु को सहायक उपकरण कहते हैं।
ग्रंथ रक्तमोक्षण की छह विधियाँ इस क्रम में गिनाता है:
- प्रच्छान: त्वचा पर छोटे-छोटे चीरे
- सिराव्यध: नस खोलना
- जलौका प्रयोग: जोंक लगाना
- शृंगावचारण: सींग से खिंचाव
- अलाबु: सूखी लौकी से खिंचाव
- घटी यंत्र: यही काम मिट्टी के घड़े से
इस सूची से जुड़ा सिद्धांत अध्याय के अंत में श्लोक 53 और 54 में दोहराया गया है: ये विधियाँ एक-दूसरे का विकल्प नहीं हैं, हर विधि रक्त की एक ख़ास गहराई से जुड़ी है।
विधि और गहराई (श्लोक 53–54)
प्रच्छान: एक जगह इकट्ठा होकर जमे रक्त के लिए (एकदेशस्थ, ग्रथित)। जलौका: गहराई में स्थित रक्त के लिए (अवगाढ)। सींग, अलाबु और घटी यंत्र: त्वचा की परतों में ठहरे रक्त के लिए (त्वक्स्थ)। सिराव्यध: पूरे शरीर में फैले रक्त के लिए (व्यापक)।
दोष के आधार पर दूसरा मेल भी है। सींग — वात के लिए: वह गर्म और चिकना (उष्ण और स्निग्ध) है। जोंक — पित्त के लिए: वह स्वभाव से ठंडी (शीतल) है। अलाबु — कफ के लिए: वह क्रिया में तेज़ और गर्म (तीक्ष्ण और उष्ण) है।
यानी यह वर्गीकरण रोगी से ज़्यादा उपकरण के तापमान, बनावट और पहुँच पर आधारित है। सुश्रुत शरीर स्थान 8 में इस विषय को नस और चिकित्सक की दृष्टि से देखते हैं, चरक सूत्रस्थान 24 में रक्त की दृष्टि से, और वाग्भट उपकरणों की दृष्टि से।
सविष और निर्विष जोंक: ग्रंथ में पहचान के निशान
जोंक का प्रसंग एक शब्द-खेल से शुरू होता है: जलम् आसाम् आयुः इति जलायुकाः, यानी पानी ही इनकी आयु (जीवन) है, इसलिए ये जलायुका कहलाती हैं। अनुवाद के अनुसार ये पानी में जन्मती हैं और पोषण भी पानी से पाती हैं। “आयु” वही शब्द है जो आयुर्वेद के नाम में है, और आगे के लगभग सभी व्यावहारिक निर्देश पानी से ही जुड़े हैं: जोंक किस पानी से आई, पानी कितनी बार बदला जाए, और बाद में वह पानी में ठीक से चलती-फिरती है या नहीं।

वाग्भट जोंकों को दो वर्गों में बाँटते हैं: विष वाली (सविष) और बिना विष वाली (निर्विष)। यह बँटवारा ज़्यादातर इस पर आधारित है कि जोंक कहाँ मिली और उसका रंग कैसा है। सूक्ष्मदर्शी के बिना, वाग्भट के लिए स्रोत ही सुरक्षा का व्यावहारिक संकेत था।
सविष जोंक (श्लोक 35–36): एक लंबा संस्कृत समास बताता है कि ये गंदे पानी और कीचड़ से, और मेंढक (भेक), साँप (अहि) व शव की सड़न और उनके मल से पैदा होती हैं। देखने में ये लाल, सफ़ेद, बहुत काली या शैवाल जैसे रंग की, मोटी और चिपचिपी, पीठ पर लंबाई में इंद्रधनुषी धारियों वाली या रोएँदार होती हैं। निर्णय स्पष्ट है: सविष वर्जयेत्, यानी विष वाली जोंकें छोड़ दी जाएँ।
ग्रंथ आगे यह भी बताता है कि ऐसी जोंक के प्रयोग से क्या होता है और उसके उपाय क्या हैं। वह सूची यहाँ नहीं दी गई; इसका कारण आख़िरी हिस्से में है।
हर कसौटी (रंग, मोटाई, सतह, धारी, रोएँ) पकड़ते समय आँख से ही दिख जाती है; किसी जाँच या इंतज़ार की ज़रूरत नहीं पड़ती। स्रोत वाला नियम भी मनमाना नहीं है: मेंढक, साँप और शव सड़न के वही स्रोत हैं जो बरसात में किसी भारतीय तालाब पर मिलते हैं। आज के गुणवत्ता-मानकों की तरह यहाँ भी हर नमूना जाँचने के बजाय पूरे समूह को स्रोत के आधार पर बाहर कर दिया जाता है।
निर्विष जोंक (श्लोक 37–38): ये साफ़ पानी में जन्मी होती हैं। इनके निशान हैं: तालाब के शैवाल जैसा गहरा हरा रंग (शैवाल-श्याव), गोल शरीर (वृत्त), पीठ पर ऊपर जाती गहरी नीली रेखाएँ, नारंगी-भूरी, यानी गेरुए रंग की पीठ और किनारे (काषाय-पृष्ठ), और हल्का पीला पेट। जीवों की पहचान के लिए ऐसे ही निशान आज भी लिखे जाते हैं।
सविष जोंकों का लंबा, अस्वीकार पर केंद्रित विवरण पहले भाग जैसा है, जहाँ आठ शस्त्र-दोषों को गुणों से ज़्यादा जगह मिली थी: अस्वीकार्य रूप ठीक-ठीक गिनाए जाते हैं, और जो इनसे बच जाए, उसे स्वीकार्य माना जाता है।
जोंक के बारह नाम और आकार का नियम
अष्टांग हृदय जोंकों के अलग-अलग नाम नहीं देता। अक्सर उद्धृत बारह नाम संस्करण में संपादक की टिप्पणियों में छपे हैं, और उनका स्रोत अष्टांग संग्रह, सूत्रस्थान 35 बताया गया है, जो वाग्भट की ही लंबी और पुरानी गद्य रचना है। यानी एक ही लेखक ने यह विषय दो स्तरों पर लिखा है: संक्षिप्त पद्य-रूप हृदय में केवल पहचान के निशान हैं, जबकि संग्रह में निशान और नाम दोनों मिलते हैं।
सविष (विष वाली): अष्टांग संग्रह, सूत्रस्थान 35
कृष्णा: काजल जैसी काली, चौड़े सिर वाली। कर्बुरा: बाम मछली (ईल) जितनी लंबी, पेट पर उभरी धारियों वाली। अलगर्दा: मानो रोएँ से ढकी हुई, बड़े किनारों और काले मुँह वाली।
इंद्रायुधा: पीठ पर लंबाई में इंद्रधनुषी धारियों वाली। सामुद्रिका: गहरी पीली, फूल जैसे रंग-बिरंगे धब्बों वाली। गोचंदना: बैल के अंडकोष की तरह दो हिस्सों में बँटी पूँछ और छोटे मुँह वाली।
निर्विष (बिना विष वाली): अष्टांग संग्रह, सूत्रस्थान 35
कपिला: दोनों किनारे हरताल के रंग के, पीठ चिकनी और मटर जैसी हरी। पिंगला: लाल-भूरी, गोल शरीर वाली, तेज़ चलने वाली। शंखमुखी: कलेजी के रंग की, लंबे नुकीले मुँह वाली, जल्दी पकड़ बनाने वाली।
मूषिका: आकार और रंग में चूहे की पूँछ जैसी, दुर्गंध वाली। पुंडरीका: मटर जैसी हरी, कमल जैसे मुँह वाली। सावरिका: चिपचिपी, कमल के पत्ते जैसी हरी, आठ इंच लंबी; टिप्पणी के अनुसार पशुओं के लिए रखी गई।
हर नाम किसी जानी-पहचानी चीज़ से समानता पर रखा गया है: हरताल जैसा खनिज रंग, मटर, पालतू पशु का अंग, पुंडरीक (सफ़ेद कमल), शंख और चूहा। पहले भाग में शस्त्रों के नाम भी इसी तर्क से थे, जिसे संपादक नामानुगत रूप कहते हैं: नाम में ही रूप का संकेत है, इसलिए जिसने शंखमुखी कभी नहीं देखी, वह भी उसे पहचान सकता है।
आकार का नियम: सावरिका निर्विष होकर भी पशुओं के लिए रखी गई है, और इसका कारण केवल उसका आकार है; यह निर्णय सुरक्षा का नहीं, मात्रा का है। संस्करण के अनुसार जोंक की अधिकतम लंबाई अठारह इंच है, लगभग चार से छह इंच वाली जोंकें मनुष्यों के लिए हैं, और बड़ी जोंकें हाथी, घोड़े जैसे पशुओं के लिए।
संस्कृत में इकाई अंगुल (उँगली की चौड़ाई) है, इंच अनुवादक का रूपांतरण है, और अंगुल स्वयं सापेक्ष इकाई है, इसलिए इस नियम को अनुपात की तरह पढ़ना बेहतर है। पशु-चिकित्सा (अश्व-आयुर्वेद, गज-आयुर्वेद) शास्त्रीय साहित्य की अलग शाखा थी; यहाँ वह एक पंक्ति में दिखती है, क्योंकि बड़ी जोंकें छोड़ी नहीं गईं, उनका काम बदला गया।
जोंक को जीवित कैसे रखा जाता था: शरद ऋतु, पानी और भोजन
यही हिस्सा जोंक को अध्याय के बाकी उपकरणों से अलग करता है। शस्त्र ऊन की परत वाले डिब्बे में रखा जाता है, पर जोंक को जीवित रखना होता है, इसलिए यहाँ का पाठ शल्य-क्रिया से ज़्यादा पशुपालन जैसा लगता है।
जोंकें शरद ऋतु में इकट्ठी की जाती हैं। शास्त्रीय आयुर्वेद इस ऋतु को रक्त से जोड़ता है, और चरक सूत्रस्थान 24 में रक्त की देखभाल के लिए यही ऋतु बताते हैं। इकट्ठा करने वाला हाथ ढककर रखता है, जोंकें मिट्टी के बर्तन या चौड़े मुँह वाले पात्र में पानी के साथ रखी जाती हैं, और पानी हर दो-तीन दिन में बदला जाता है।

भोजन भी तय है: कमल के कंद और डंठल, तालाब का शैवाल और सूखा मांस। सात दिन बाद जोंकें नए पात्र में रखी जाती हैं। श्लोक 45 पात्र बार-बार बदलने का कारण बताता है: रखी हुई जोंकें अपनी ही लार, मूत्र और मल में पड़े रहने से स्वयं सविष हो सकती हैं, इसलिए हर तीन या पाँच दिन में पात्र ताज़े पानी और मिट्टी के साथ नया किया जाता है।
इन सभी नियमों के पीछे एक ही कारण है: रखा हुआ पानी समय के साथ गंदा हो जाता है, और गंदे पानी में रखी जोंक अध्याय की अपनी परिभाषा से वही बन जाती है जिसे छोड़ना है। श्लोक 35 का वर्गीकरण स्रोत पर आधारित था; श्लोक 45 बताता है कि रखने का ढंग भी जोंक को अस्वीकार्य बना सकता है।
श्लोक 39 तीन अयोग्यताओं के साथ यह प्रसंग समाप्त करता है। जोंक का प्रयोग तब नहीं होता जब उसने लिया हुआ पूरा न उगला हो, जब उसे बहुत बार लगाया जा चुका हो, या जब वह पानी में सुस्त हो।
हंस-न्याय और पानी में तैरने से जोंक की परख
जोंक के पकड़ बना लेने के बाद ग्रंथ अपनी एकमात्र स्पष्ट साहित्यिक उपमा देता है: जोंक केवल दूषित रक्त खींचती है, जैसे हंस दूध और पानी के मिश्रण में से केवल दूध लेता है। संस्कृत साहित्य में हंस क्षीर-नीर-विवेक का प्रतीक है, यानी उस समझ का जो सार ले लेती है और बाकी छोड़ देती है।
यह ग्रंथ का कथन है; हम इसे केवल बता रहे हैं, इसका समर्थन नहीं करते: जोंक वही खींचती है जो उसके मुँह के सामने है, और दूषित रक्त चुनने की बात शास्त्रीय व्याख्या है, कोई सिद्ध प्रक्रिया नहीं। बाकी विधियों में गहराई, जगह और मात्रा चिकित्सक तय करता है, जबकि यहाँ निर्णय उपकरण पर छोड़ा गया है; इसीलिए अगले ही श्लोक में बाहर से जाँच जोड़ी गई है।
पहली जाँच, जोंक लगी जगह पर: जब वहाँ चुभन और खुजली महसूस हो, तो माना जाता है कि जोंक दूषित रक्त से आगे बढ़कर स्वस्थ रक्त लेने लगी है, और उसे हटा दिया जाता है।
दूसरी जाँच, हटाने के बाद: जोंक के मुँह पर नमक और तेल लगाकर, उसके शरीर पर महीन चावल का आटा छिड़ककर और उसे नीचे की ओर सहलाकर, उससे लिया हुआ रक्त उगलवाया जाता है। फिर उसे पानी में लौटाकर देखा जाता है।
उगलवाने के बाद की जाँच (वमन परीक्षा): तीन परिणाम (श्लोक 44)
पूरा: जोंक पानी में खुलकर चलती है और उसकी भूख लौट आती है; यही अपेक्षित परिणाम है। ज़रूरत से ज़्यादा: जोंक बहुत कमज़ोर हो जाती है और मर भी सकती है। अधूरा: वह हिलती नहीं या सुस्ती से हिलती है, और उगलवाने की क्रिया दोहराई जाती है।
पानी में जोंक का व्यवहार उस भीतरी अवस्था का संकेत माना गया है जिसे सीधे देखा नहीं जा सकता। यही कसौटी दो बार काम आती है: श्लोक 39 में यह तय करने के लिए कि जोंक इस्तेमाल हो सकती है या नहीं, और श्लोक 44 में यह देखने के लिए कि वह ठीक से ख़ाली हुई या नहीं।
रक्त-मद और सात दिन का विश्राम: आख़िरी दो नियम रोगी के नहीं, जोंक के हित के हैं। इस्तेमाल हुई जोंक सात दिन तक दोबारा नहीं लगाई जाती, और संस्करण रक्त के नशे (रक्त-मद) से बचाव की बात करता है, यानी ऐसी अवस्था से जिसमें जोंक ने क्षमता से ज़्यादा ले लिया हो और ठीक से ख़ाली न हुई हो। शस्त्र-कोश जहाँ धातु को नमी से बचाता है, वहीं ये नियम जोंक की भूख और सेहत बनाए रखने के लिए हैं।
शृंग (सींग), अलाबु (तुम्बी), घटी यंत्र और प्रच्छान
जोंक के बाद अध्याय खिंचाव की तीन विधियों पर आता है। इनका कार्य-विवरण भी संपादक की टिप्पणियों में है, जो अष्टांग संग्रह, सूत्रस्थान 35 का हवाला देती हैं।
शृंग (सींग): गाय या भैंस का लगभग सात इंच लंबा सींग लिया जाता है, जिसका घेरा आधार पर अंगूठे जितना और सिरे पर उड़द के दाने जितना हो। आधार पर साफ़ कपड़ा लपेटकर संकरे सिरे से मुँह द्वारा खींचा जाता है।
अष्टांग हृदय का अपना योगदान श्लोक 50 की एक रोक है: कफ से दूषित रक्त सींग से नहीं खींचा जाता, क्योंकि वह गाढ़ा होता है, जबकि वात और पित्त में अनुमति है। यानी सामग्री के गुण को काम की ज़रूरत से मिलाया गया है, जैसे पहले भाग में अच्छी तरह गलाए गए लोहे पर ज़ोर था।
अलाबु (तुम्बी): टिप्पणी के अनुसार आम बोली में इसे तुम्बी कहते हैं, यानी सूखकर कड़ी हो चुकी मध्यम आकार की साधारण लौकी, जिसका डंठल वाला सिरा काटकर गूदा निकाल दिया जाता है। भीतर दीया या जलती रुई रखकर उसका मुँह सतह पर इतनी मज़बूती से लगाया जाता है कि बाहर की हवा भीतर न जाए; लौ बुझती है, निर्वात बनता है और वही खिंचाव पैदा करता है। दस से पंद्रह मिनट बाद इसे हटा लिया जाता है।
यह आग की मदद से की जाने वाली कपिंग है, और आज की कपिंग में भी यही भौतिक सिद्धांत काम करता है। संस्करण कहता है कि लौ भीतर की ऑक्सीजन ख़त्म कर देती है, पर यह बीसवीं सदी की रसायन-भाषा में दी गई विद्यानाथ की व्याख्या है। ग्रंथ केवल दीया रखने और खिंचाव होने की बात करता है। वाग्भट के सामने वह परिणाम था जो बार-बार देखा जा सकता था, और उनका बताया क्रम वही खिंचाव पैदा करता है।
घटी यंत्र: इसे एक ही वाक्य मिलता है: यही विधि अलाबु की जगह मिट्टी के घड़े से की जाती है। दोनों बर्तन घर में ही मिल जाते हैं और इन्हें लोहार से बनवाने की ज़रूरत नहीं होती, इसीलिए ये छब्बीस शस्त्रों में नहीं, सहायक श्रेणी में हैं।
पित्त में अलाबु क्यों नहीं (श्लोक 49): यहाँ रोक का कारण स्पष्ट शब्दों में दिया गया है (श्लोक 50 में भी 'गाढ़ा होना' कारण के रूप में आता है)। पित्त से दूषित रक्त में अलाबु और घटी यंत्र नहीं अपनाए जाते, तासाम् अनल-संयोगात्, यानी अग्नि से जुड़े होने के कारण; ये कफ और वायु (वात) के लिए हैं।
ये विधियाँ आग के सहारे काम करती हैं, और शास्त्रीय शरीर-विज्ञान में पित्त गर्मी और रूपांतरण का तत्व है; यानी रोक रोगी से नहीं, उपकरण के काम करने के ढंग से निकाली गई है। श्लोक 50 के साथ देखें तो खिंचाव की दोनों रोकें उपकरण के किसी भौतिक गुण पर आधारित हैं: अलाबु के भीतर की आग, और सींग का संकरा सिरा।
प्रच्छान (श्लोक 51–52): ये श्लोक लगभग पूरी तरह सावधानियों पर हैं। अंग को जगह के ऊपर रस्सी या पट्टे से कसकर और बराबर बाँधा जाता है, और एक ही समास में वे चार चीज़ें गिनाई गई हैं जिनसे बचना है: कंडराएँ, जोड़, हड्डियाँ और प्राण-बिंदु (स्नायु, संधि, अस्थि और मर्म)। ग्रंथ के अनुसार चीरे नीचे से ऊपर की ओर लगते हैं, और न बहुत गहरे होते हैं, न बहुत चौड़े, न आड़े।
मर्मों का विवरण सुश्रुत संहिता के शरीर स्थान और भावप्रकाश के जोड़ों वाले प्रसंग में मिलता है। शास्त्रीय शल्य-साहित्य में इनसे बचना लगभग पहला सिद्धांत माना गया है, और सुश्रुत का नस खोलने वाला अध्याय इस नियम के टूटने से जुड़े बीस नामित दोष गिनाता है। दिशा वाला नियम भी ऐसा है जिसका पालन बिना किसी चित्र के, केवल देखकर और महसूस करके किया जा सकता है।

प्रक्रिया के बाद की देखभाल और प्रस्थ की मात्रा
श्लोक 46 बाद की देखभाल बताता है। अगर लगाने की जगह पर रक्त बचा रहे, तो वहाँ हल्दी (हरिद्रा), शहद (मधु) और गुड़ मला जाता है, ठंडे पानी से धोया जाता है, और ऊपर कपड़े की गद्दी रखी जाती है। यह गद्दी या तो सौ बार धोए गए घी (शतधौत घृत) में भीगी होती है, या ठंडी तासीर वाले (शीत-वीर्य) पदार्थों के लेप में। ऐसे तीन पदार्थों के नाम हैं: मुलेठी (यष्टिमधु), चंदन और खस (उशीर)।

अध्याय का आख़िरी श्लोक, श्लोक 55, इसमें एक सुधार जोड़ता है। रक्त निकालने के बाद उस हिस्से पर ठंडे प्रयोग किए जाएँ तो वात बढ़ता है, और ग्रंथ इसका असर उसी जगह के लक्षणों में बताता है: चुभन, खुजली और सूजन। निर्देश है कि इसके बजाय उस हिस्से पर गुनगुना घी डाला जाए।
तापमान पर दो निर्देश, नौ श्लोकों के अंतर पर
श्लोक 46 ठंडे पानी और ठंडी तासीर वाले लेप की बात करता है, जबकि श्लोक 55 गुनगुने घी की। संस्करण इन दोनों निर्देशों में सामंजस्य नहीं बैठाता, और हम भी ऐसा नहीं करेंगे। सबसे उचित पढ़त यह लगती है कि दोनों अलग-अलग समय की बात करते हैं, यानी तुरंत की देखभाल और बाद में आसपास के हिस्से की अवस्था, पर छपा हुआ पाठ यह नहीं कहता।
मुलेठी, चंदन और खस भावप्रकाश और चक्रदत्त के सौंदर्य-नुस्ख़ों में भी बार-बार साथ आते हैं। किसी सतह को ठंडक देने की बात आने पर शास्त्रीय लेखक अक्सर इन्हीं तीनों का नाम लेते हैं।
प्रस्थ की मात्रा: संस्करण एक बार में निकाले जाने वाले रक्त के तीन स्तर बताता है, अधिकतम एक प्रस्थ, आधा प्रस्थ या चौथाई प्रस्थ, और इन्हें 768, 384 और 192 मिलीलीटर में बदलता है। ये आँकड़े आपस में संगत हैं, पर आधुनिक रूपांतरण हैं, और प्रस्थ का मान अलग-अलग संपादकों और क्षेत्रों में काफ़ी बदलता है; शास्त्रीय माप प्रस्थ है, मिलीलीटर विद्यानाथ के हैं। एक छोटा नियम और है: अगर रक्त अपनी जगह से हटकर घाव में गहरे रुक गया हो, तो ग्रंथ के अनुसार वह रात भर में खट्टा हो जाता है, और इसे दूसरी बार रक्त निकालने का संकेत माना गया है।
अध्याय का अंत, सूत्रस्थान 27 और इस लेख की सीमाएँ
आख़िरी पृष्ठ का समापन-वाक्य (पुष्पिका) साफ़ बताता है कि क्या पूरा हुआ: कृति है अष्टांग हृदय संहिता, रचयिता श्री वैद्यपति सिंहगुप्त के पुत्र आचार्य वाग्भट, खंड सूत्रस्थान, और अध्याय छब्बीसवाँ, जिसका नाम शस्त्र विधि है। इस छपाई के कई पन्नों के ऊपर अध्याय का अलग नाम और संख्या छपी है, पर पुष्पिका पाठ का हिस्सा है और उसमें लिखा है शस्त्रविधिर्नाम षड्विंशोऽध्यायः। इसलिए इस लेख की हर बात अध्याय 26 की है।

पुष्पिका के ठीक बाद सूत्रस्थान 27, सिराव्यध विधि (नस खोलने की विधि), शुरू होता है। इसकी पहली उपमा सिंचाई से है: जैसे खेत की मेड़ काटने पर पानी बह जाता है और पौधे मर जाते हैं, वैसे ही नस खोलने पर दूषित रक्त बाहर आता है। फिर शुद्ध रक्त के लक्षण केवल रंगों में दिए गए हैं: कमल (पद्म), इंद्रगोप (बरसात में दिखने वाला चटक लाल कीड़ा) और मजीठ की जड़ (मंजिष्ठा), जिसका रंग एक ख़ास लाल का मानक माना जाता था। वह पृष्ठ इस लेख में पढ़े गए हिस्से के ठीक बाद का है और केवल यह देखने के लिए पढ़ा गया कि अध्याय कहाँ समाप्त होता है; अध्याय 27 इस लेख के दायरे से बाहर है।
इस लेख में क्या नहीं है, और क्यों: दो सूचियाँ यहाँ नहीं दी गईं: हंस वाली उपमा के बाद की वह सूची, जिसमें ग्रंथ बताता है कि किन स्थितियों में जोंक लगाना उपयोगी माना गया, और सविष जोंक के प्रयोग के असरों की सूची। यह साइट आयुर्वेदिक उत्पाद भी बेचती है; हम ASCI में पंजीकृत हैं और आयुष उत्पादों के डिजिटल विज्ञापन के भारतीय नियमों के तहत काम करते हैं। ऐसे पेज पर किसी स्थिति को किसी प्रक्रिया से जोड़ने वाला वाक्य स्वास्थ्य-दावे जैसा पढ़ा जा सकता है। इससे भी अहम यह है कि रक्तमोक्षण त्वचा को भेदने वाली प्रक्रिया है, और हम ऐसा पेज नहीं छापेंगे जिससे किसी को लगे कि किसी शिकायत के लिए यह करना चाहिए।
हमने यह अध्याय कैसे पढ़ा: हमारा स्रोत आर॰ विद्यानाथ का अंग्रेज़ी अनुवाद (चौखंबा) है, जिसके छपे पृष्ठ 371–377 पढ़े गए। श्लोक-संख्याएँ पृष्ठों के चित्रों से पढ़ी गईं, क्योंकि PDF से निकला देवनागरी पाठ भरोसेमंद नहीं है। बारह नाम और तीनों खिंचाव-विधियों का कार्य-विवरण संपादक की टिप्पणियों से लिए गए हैं, अष्टांग हृदय के श्लोकों से नहीं; इंच, मिलीलीटर और ऑक्सीजन वाली व्याख्या अनुवादक की है। इन दो सूचियों के सिवा कुछ नहीं छोड़ा गया, और जहाँ दो श्लोक असहमत दिखते हैं, वहाँ असहमति वैसी ही रहने दी गई है।
चंदन, खस और मुलेठी आज: यही वनस्पतियाँ हमारे कुमकुमादि तैलम् में भी हैं, जो इसी नाम की शास्त्रीय परंपरा का चेहरे का तेल है। यह तिल के तेल और देसी गाय के दूध के आधार पर केसर के साथ बनता है, और इसकी पच्चीस से अधिक वनस्पतियों में श्वेत चंदन, खस, मुलेठी, मंजिष्ठा और कमल भी हैं। यह 15 मिली का तेल है, जिसकी कुछ बूँदें रात में लगाई जाती हैं।
ध्यान दें: यह त्वचा पर बाहरी उपयोग का सौंदर्य-तेल है, किसी चिकित्सकीय स्थिति के लिए नहीं, और इस लेख में बताई किसी प्रक्रिया से इसका कोई संबंध नहीं है। नया उत्पाद पहली बार लगाने से पहले त्वचा के छोटे हिस्से पर लगाकर देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
जलौकावचारण (jalaukavacharana) का क्या अर्थ है? +
जलौकावचारण का अर्थ है जोंक का प्रयोग: जलौका यानी जोंक, और अवचारण यानी उसे काम में लाना। यह रक्तमोक्षण की छह शास्त्रीय विधियों में से एक है, और अष्टांग हृदय, सूत्रस्थान 26 में लगभग श्लोक 34 से 46 तक इसका वर्णन है। यह लेख केवल उस पाठ का ऐतिहासिक विवरण है।
अष्टांग हृदय के किस अध्याय में जोंक का वर्णन है? +
सूत्रस्थान 26 में, जिसका नाम शस्त्र विधि है। इसका पहला भाग छब्बीस धारदार शस्त्रों पर है, और लगभग श्लोक 34 से श्लोक 55 की पुष्पिका तक का हिस्सा रक्तमोक्षण और जोंक, सींग, अलाबु व मिट्टी के घड़े पर है। अध्याय-संख्या पुष्पिका (शस्त्रविधिर्नाम षड्विंशोऽध्यायः) से ली गई है।
आयुर्वेद में रक्तमोक्षण की छह विधियाँ कौन-सी हैं? +
प्रच्छान (छोटे चीरे), सिराव्यध (नस खोलना), जलौका (जोंक), शृंगावचारण (सींग), अलाबु (सूखी लौकी) और घटी यंत्र (मिट्टी का घड़ा)। श्लोक 53 और 54 के अनुसार प्रच्छान एक जगह जमे रक्त के लिए है, जोंक गहरे रक्त के लिए, सींग, अलाबु और घटी यंत्र त्वचा की परतों वाले रक्त के लिए, और सिराव्यध पूरे शरीर में फैले रक्त के लिए।
ग्रंथ विषैली और सुरक्षित जोंक में फ़र्क कैसे करता है? +
स्रोत और रूप से। श्लोक 35 और 36 के अनुसार सविष जोंकें गंदे पानी, कीचड़ और मेंढक, साँप व शव की सड़न से पैदा होती हैं, और लाल, सफ़ेद, बहुत काली या शैवाल जैसे रंग की, मोटी, चिपचिपी, इंद्रधनुषी धारियों वाली या रोएँदार होती हैं। श्लोक 37 और 38 के अनुसार निर्विष जोंकें साफ़ पानी की, गहरी हरी, गोल, पीठ पर गहरी नीली रेखाओं और हल्के पीले पेट वाली होती हैं।
आयुर्वेद में जोंक के बारह प्रकार कौन-से हैं? +
छह सविष: कृष्णा, कर्बुरा, अलगर्दा, इंद्रायुधा, सामुद्रिका और गोचंदना। छह निर्विष: कपिला, पिंगला, शंखमुखी, मूषिका, पुंडरीका और सावरिका। ये नाम अष्टांग हृदय के नहीं हैं; संस्करण इन्हें संपादक की टिप्पणियों में अष्टांग संग्रह, सूत्रस्थान 35 के हवाले से देता है।
अलाबु (तुम्बी) से खिंचाव कैसे होता है, और पित्त में इसे क्यों नहीं अपनाया जाता? +
सूखी लौकी के भीतर दीया या जलती रुई रखकर उसका मुँह सतह पर कसकर लगाया जाता है; लौ बुझने पर बना निर्वात खिंचाव पैदा करता है। लौ से भीतर की ऑक्सीजन ख़त्म होने वाली व्याख्या आधुनिक अनुवादक की है; ग्रंथ केवल दीये और खिंचाव की बात करता है। श्लोक 49 के अनुसार अलाबु और घटी यंत्र आग से जुड़े होने (अनल-संयोग) के कारण पित्त में नहीं अपनाए जाते, क्योंकि पित्त स्वयं गर्मी का तत्व माना गया है।
क्या पाठक को यह ख़ुद आज़माना चाहिए? +
नहीं। ये त्वचा को भेदने वाली प्रक्रियाएँ हैं, जिन्हें आज जहाँ भी अपनाया जाता है, वहाँ योग्य, पंजीकृत चिकित्सक क्लिनिक में कीटाणुरहित सामग्री से करते हैं। यह लेख एक पुराने ग्रंथ का पाठ-अध्ययन है, कोई सलाह नहीं, और हमारा कोई उत्पाद इन प्रक्रियाओं से जुड़ा नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए डॉक्टर या वैद्य से सलाह लें।