सारांश: सुश्रुत संहिता छह स्थानों (खंडों) और कुल 186 अध्यायों में बँटी है। इसका दूसरा खंड, निदान स्थान, 16 अध्यायों में वात व्याधि से लेकर कुष्ठ, प्रमेह और मुख रोग तक प्रमुख रोगों की पहचान का पारंपरिक ढाँचा देता है।
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Read this article in English: Nidana Sthana of Sushruta Samhita: 16-Chapter Ancient Indian Disease Classification (Vata Vyadhi to Mukha Roga)
- सुश्रुत संहिता में कितने अध्याय हैं? छह स्थानों की बनावट
- निदान स्थान क्या है: अर्थ, निदान पंचक और 16 अध्यायों का क्रम
- पहला अध्याय: वात व्याधि और पाँच वायु
- दूसरे से पाँचवें अध्याय तक: अर्श, अश्मरी, भगंदर और कुष्ठ
- छठे से नौवें अध्याय तक: प्रमेह, उदर, मूढ़गर्भ और विद्रधि
- दसवें से पंद्रहवें अध्याय तक: विसर्प, अर्बुद, क्षुद्र रोग और अस्थि-भंग
- 16वाँ अध्याय: मुख रोग का वर्गीकरण
- आज के आयुर्वेद में निदान स्थान क्यों मायने रखता है
- अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

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निदान स्थान वात व्याधि से शुरू होता है और परंपरा में वात के लिए तिल के तेल से अभ्यंग किया जाता है; यह तिल के तेल पर आधारित सिर की मालिश का तेल है, किसी रोग के उपचार के लिए नहीं।
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सुश्रुत संहिता भारत का प्राचीन शल्य और चिकित्सा ग्रंथ है, जिसे आचार्य सुश्रुत से जोड़ा जाता है। पूरा ग्रंथ छह खंडों में बँटा है, जिन्हें "स्थान" कहा जाता है, और हर स्थान का विषय व अध्यायों की संख्या अलग है।
- सूत्र स्थान (46 अध्याय) — मूल सिद्धांत, द्रव्य, शल्य के उपकरण (यंत्र और शस्त्र), ऑपरेशन से पहले की तैयारी, आठ शल्य-कर्म (छेद्य, लेख्य, वेध्य, एष्य, आहार्य, विस्राव्य, सीव्य और क्षार) और शल्य-कक्ष। सुश्रुत की शल्य-परंपरा मुख्य रूप से इसी खंड से पहचानी जाती है।
- निदान स्थान (16 अध्याय) — हर प्रमुख रोग की व्यवस्थित पहचान; यही इस लेख का विषय है।
- शारीर स्थान (10 अध्याय) — शरीर-रचना, गर्भ का विकास, सात धातुएँ, तीन दोष, गर्भावस्था, और वे 107 मर्म (संवेदनशील बिंदु) जिनसे हर शल्य-चिकित्सक को बचना होता है।
- चिकित्सा स्थान (40 अध्याय) — रोग-दर-रोग चिकित्सा, लगभग निदान स्थान के ही क्रम में।
- कल्प स्थान (8 अध्याय) — विष-विज्ञान: ज़हर, साँप और कीड़ों के काटने का प्रबंधन।
- उत्तर तंत्र (66 अध्याय) — बाद में जोड़ा गया पूरक भाग, जिसमें आँखों के 76 रोग (शालाक्य तंत्र), कान-नाक-गला, बच्चों के रोग और ग्रहजन्य (मानसिक-आध्यात्मिक) विकार शामिल हैं।
पहले पाँच स्थानों के अध्याय जोड़ें (46 + 16 + 10 + 40 + 8) तो 120 होते हैं, और उत्तर तंत्र के 66 अध्याय मिलाने पर कुल 186। यानी सुश्रुत संहिता में छह स्थान और कुल 186 अध्याय हैं।
निदान स्थान दूसरे नंबर पर है, सूत्र स्थान के बाद और शारीर स्थान से पहले। माना जाता है कि यह क्रम सोच-समझकर रखा गया है, क्योंकि ऑपरेशन से पहले रोग की पहचान ज़रूरी है और पहचान के लिए रोग का नाम और उसकी प्रक्रिया जानना आवश्यक है। यहाँ बताए गए हर रोग की चिकित्सा चिकित्सा स्थान के संबंधित अध्याय में मिलती है।
निदान स्थान क्या है: अर्थ, निदान पंचक और 16 अध्यायों का क्रम

"निदान" शब्द संस्कृत के "नि-दा" से बना है, जिसका अर्थ है पता लगाना या कारण की ओर इशारा करना। आयुर्वेद में निदान का उद्देश्य रोग के कारण, शुरुआती संकेतों, प्रकट रूप और परिणाम को एक कड़ी में जोड़कर समझना है। "स्थान" का अर्थ है खंड, इसलिए निदान स्थान का अर्थ है "रोगों और उनके कारणों का खंड"।
निदान पंचक — रोग पहचानने के पाँच आधार: निदान (कारण), पूर्वरूप (शुरुआती संकेत), रूप (मुख्य लक्षण), उपशय (किस चीज़ से राहत मिलती है, जो ख़ुद पहचान का हिस्सा है) और संप्राप्ति (कारण से रोग बनने तक की प्रक्रिया)। निदान स्थान का हर अध्याय इसी ढाँचे का पालन करता है और अंत में दोष के अनुसार भेद (वातज, पित्तज, कफज, सान्निपातिक) व साध्यता बताता है। साध्यता की तीन श्रेणियाँ हैं: साध्य (जिसे सँभाला जा सकता है), कष्टसाध्य (जिसे सँभालना कठिन है) और असाध्य (जिसे उस समय के साधनों से सँभाला नहीं जा सकता था)।
सुश्रुत इस खंड में 16 बड़े रोग-वर्ग बताते हैं और हर वर्ग को अलग अध्याय देते हैं। आज की भाषा में इनमें तंत्रिका-तंत्र, मूत्र-मार्ग, त्वचा, पेट, प्रसव, हड्डियों और मुँह-गले तक के रोग आते हैं, इसलिए इस खंड को आंतरिक चिकित्सा और शल्य की एक शुरुआती पाठ्यपुस्तक जैसा माना जाता है। निदान स्थान के 16 अध्याय इस प्रकार हैं:
- वात व्याधि — तंत्रिका-तंत्र से जुड़े रोग
- अर्श — बवासीर
- अश्मरी — गुर्दे और मूत्राशय की पथरी
- भगंदर — गुदा का फ़िस्टुला
- कुष्ठ — त्वचा के अठारह तरह के रोग
- प्रमेह — मूत्र-मार्ग के बीस विकार, जिनमें मधुमेह भी है
- उदर — पेट का फूलना और जलोदर
- मूढ़गर्भ — गर्भ की गलत स्थिति, कठिन प्रसव और सिज़ेरियन
- विद्रधि — बाहरी और भीतरी फोड़े
- विसर्प, नाड़ी-व्रण, स्तन-रोग — फैलने वाली त्वचा-सूजन, नासूर और स्तन के रोग
- ग्रंथि, अपची, अर्बुद, गलगंड — गाँठें, ट्यूमर और घेंघा
- वृद्धि, उपदंश, श्लीपद — हर्निया व अंडकोष की सूजन, जननांग के रोग और हाथीपाँव
- क्षुद्र रोग — चालीस से अधिक छोटे रोग
- शूक दोष — दवाओं और प्रक्रियाओं से होने वाली जटिलताएँ
- संधि-मुक्त और कांड-भग्न — जोड़ का खिसकना और हड्डी का टूटना
- मुख रोग — होंठ, दाँत, जीभ, तालु और गले के रोग
अध्यायों के क्रम के पीछे भी एक तर्क है। शुरुआत वात से होती है, क्योंकि तीनों दोषों में वात को सबसे चलायमान और सबसे जल्दी असंतुलित होने वाला माना जाता है, और उसका असर शरीर में कहीं भी दिख सकता है। अंत में मुख रोग रखे गए हैं; मुँह को पाचन-मार्ग का द्वार माना जाता है और जाँच के समय इसे आसानी से देखा जा सकता है।
पहला अध्याय: वात व्याधि और पाँच वायु

निदान स्थान का पहला अध्याय किसी रोग से नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर में वात की सामान्य अवस्था से शुरू होता है। सुश्रुत पहले पाँच वायुओं (वात के उप-प्रकार) और उनकी जगह समझाते हैं, और फिर बताते हैं कि किसी एक के बिगड़ने पर क्या होता है।
- प्राण वायु — सिर और हृदय में; साँस, निगलना और इंद्रियों का काम। बिगड़ने पर हिचकी (हिक्का), साँस फूलना (श्वास), खाँसी (कास) और इंद्रियों के विकार।
- उदान वायु — छाती और गले में; बोलना, प्रयास और आवाज़। बिगड़ने पर आवाज़ बैठना (स्वरभेद), गले के रोग और प्रयास में कमज़ोरी।
- समान वायु — पाचन-अग्नि के पास; पाचन की क्रिया। बिगड़ने पर गुल्म (पेट में गाँठ जैसा उभार), मल की अनियमितता और कमज़ोर पाचन।
- व्यान वायु — पूरे शरीर में; पलक झपकने से चलने तक हर गति। बिगड़ने पर वात-रक्त (जोड़ों की शिकायतें), लकवे की ज़्यादातर स्थितियाँ और कई ज्वर।
- अपान वायु — पेड़ू में; मूत्र, मल, मासिक धर्म, वीर्य और प्रसव। बिगड़ने पर पथरी, प्रमेह, कब्ज़ और कठिन प्रसव।
अध्याय में गिनाई गई स्थितियों में मिर्गी (अपस्मार), ऐंठन (आक्षेपक), दौरे (अपतंत्रक), आधे शरीर का लकवा (पक्षाघात), चेहरे का लकवा (अर्दित), गर्दन अकड़ना (मन्यास्तंभ), साइटिका (गृध्रसी), बाँह की नसों से जुड़ा लकवा (विश्वाची), घुटने की सूजन (जानु-वात), लँगड़ापन (खंजता), एड़ी में चुभता दर्द (वात-कंटक), पैरों में जलन (पाद-दाह), पैरों का सुन्न होना (पाद-हर्ष), कंधे का जकड़ जाना यानी फ्रोज़न शोल्डर (अंस-शोष), कान का दर्द (कर्ण-शूल) और बहरापन (बाधिर्य) शामिल हैं। हर स्थिति के कारण, शुरुआती संकेत, लक्षण और साध्यता अलग से दिए गए हैं।
वात और अभ्यंग: आयुर्वेद में वात को संतुलित रखने के लिए गुनगुने तिल के तेल से रोज़ अभ्यंग (तेल मालिश) की परंपरा है, और तिल के तेल को वात को शांत करने वाला माना जाता है। सिर की मालिश को दिनचर्या में जोड़ना चाहें, तो हमारा केश संवर्धन तेल कोल्ड-प्रेस्ड तिल के तेल में 16 पारंपरिक जड़ी-बूटियाँ मिलाकर बनाया गया है। यह किसी वात व्याधि का उपचार नहीं है; ऐसी किसी भी समस्या में वैद्य या डॉक्टर से सलाह लें।
दूसरे से पाँचवें अध्याय तक: अर्श, अश्मरी, भगंदर और कुष्ठ
दूसरा अध्याय: अर्श (बवासीर) के छह प्रकार
इस अध्याय की ख़ास बात शरीर-रचना की बारीकी है। सुश्रुत गुदा-नलिका के तीन घेरों (प्रवाहिनी, विसर्जनी और संवरणी) का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि किस अर्श में कौन-सा घेरा प्रभावित होता है। दोष के आधार पर छह प्रकार हैं: वातज (सूखे, सख़्त, नीले-काले, दर्द वाले मस्से, साथ में कब्ज़), पित्तज (नरम, लाल या पीले, ख़ून और जलन के साथ), कफज (बड़े, फीके, चिकने और लसलसे, साथ में पुरानी अपच), रक्तज (पित्तज जैसे, पर ख़ून अधिक आने वाले; आयुर्वेद में इन्हें रक्त-दुष्टि से जोड़ा जाता है), सान्निपातिक (तीनों दोषों वाले, सबसे गंभीर) और सहज (जन्म से, वंशानुगत, जिन्हें सँभालना सबसे कठिन माना गया)।
जननांगों के आसपास होने वाली मस्से जैसी बढ़त (चर्मकील) को सुश्रुत अर्श से अलग रोग मानते हैं। अर्श के लिए चिकित्सा स्थान में गंभीरता के बढ़ते क्रम में तीन शल्य-उपाय बताए गए हैं: क्षार-कर्म (क्षार से दागना), अग्नि-कर्म (ताप से दागना) और शस्त्र-कर्म (काटकर निकालना)।
तीसरा अध्याय: अश्मरी (पथरी) के चार प्रकार
अश्मरी का अर्थ है "पत्थर", यानी गुर्दे और मूत्राशय की पथरी। चार प्रकार हैं: श्लेष्मज (कफ से, बड़ी, चिकनी, धीरे बनने वाली), पित्तज (पीली-लाल, नुकीली, जलन के साथ), वातज (सख़्त, काली-भूरी, सबसे तेज़ दर्द वाली) और शुक्राश्मरी (शुक्र से बनी)।
सुश्रुत के अनुसार रुके हुए मूत्र में खनिज जमा होने से पथरी बनती है। उनके बताए लक्षण आज भी पहचाने जाते हैं: कमर से जाँघ के जोड़ तक तेज़ दर्द, मूत्र में ख़ून, पेशाब की जल्दी, और हिलने पर पथरी खड़कने का अहसास। साध्यता वाले हिस्से में बताया गया है कि कौन-सी पथरी शल्य से निकाली जाए और किसे औषधि से सँभाला जाए।
चौथा अध्याय: भगंदर के आठ प्रकार
भगंदर शब्द "भग" (गुदा के आसपास का हिस्सा) और "दर" (दरार) से बना है। आठ प्रकार हैं: शतपोनक (सौ छेदों वाला), उष्ट्रग्रीव (ऊँट की गर्दन जैसी नली), परिस्रावी (लगातार मवाद बहने वाला), शंबूकावर्त (शंख जैसी घुमावदार नली), उन्मार्गी (असामान्य जगह खुलने वाला), और वातज, पित्तज व कफज।
सुश्रुत इसका शुरुआती संकेत भी बताते हैं: गुदा के पास खुजली वाली, दर्द भरी सख़्त सूजन। नली बनने से पहले दिखने वाला यह संकेत समय रहते ध्यान देने का अवसर देता है। क्षार-सूत्र (औषधियुक्त धागा) की विधि इसी परंपरा से जुड़ी है और आज भी भगंदर की प्रमुख आयुर्वेदिक शल्य-विधि मानी जाती है। शतपोनक और उन्मार्गी को शल्य से असाध्य, और दोषज प्रकारों व उष्ट्रग्रीव को साध्य माना गया है।
5वाँ अध्याय: कुष्ठ — त्वचा के 18 प्रकार

आज के आयुर्वेदिक व्यवहार में यह अध्याय विशेष रूप से उपयोगी माना जाता है। "कुष्ठ" त्वचा-रोगों का व्यापक नाम है; यह केवल कोढ़ नहीं है, जैसा औपनिवेशिक अंग्रेज़ी अनुवादों में अक्सर समझा गया। सुश्रुत अठारह प्रकार बताते हैं, जो सात महाकुष्ठ और ग्यारह क्षुद्रकुष्ठ में बँटे हैं। इस अध्याय में आने वाले प्रमुख नामों को लक्षणों के हिसाब से यूँ देख सकते हैं:
- रंग से पहचाने जाने वाले — अरुण (लाल, तेज़ खुजली), औदुंबर (गूलर जैसा ताँबई-लाल), ऋष्यजिह्व (हिरण की जीभ जैसा), काकणक (गुंजा के बीज जैसे गहरे धब्बे) और पुंडरीक (कमल जैसे सफ़ेद धब्बे)।
- रूखे और पपड़ीदार — कपाल, स्थूलारुष्क, एककुष्ठ (मछली के छिलकों जैसी त्वचा), चर्मदल (त्वचा का मोटा होना) और सिध्म (सोरायसिस जैसी, चाँदी जैसी पपड़ी)।
- खुजली और रिसाव वाले — दद्रु (दाद), विचर्चिका (एक्ज़िमा), पामा (फुंसियों वाली खुजली) और कच्छु व काकस (सूखी लाली के साथ तेज़ खुजली)।
- फैलने वाले — विसर्प कुष्ठ और परिसर्प कुष्ठ।
- अन्य — विपादिका (एड़ियों-हथेलियों का फटना), किटिभ (केलॉइड जैसे उभरे निशान) और किलास, जिसे आज विटिलिगो कहा जाता है, हालाँकि सुश्रुत कहीं-कहीं इसे ल्यूकोडर्मा से अलग रखते हैं।
अध्याय यह भी दर्ज करता है कि कुष्ठ जन्मजात भी हो सकता है, यानी त्वचा-रोग परिवारों में चल सकते हैं, और इसके कुछ रूप संक्रामक होते हैं। साध्यता इस पर तय होती है कि रोग कितनी गहरी धातु तक पहुँचा है। रक्त ऊपरी, मांस बीच की और अस्थि-मज्जा सबसे गहरी धातु है।
जितनी गहरी धातु प्रभावित हो, कुष्ठ को सँभालना उतना ही कठिन माना गया है। सुश्रुत का बताया क्रम है पहले शोधन (शुद्धि), फिर लेप, फिर रसायन (त्वचा का पोषण); यह क्रम वैद्य आपकी स्थिति देखकर ही तय करते हैं।
छठे से नौवें अध्याय तक: प्रमेह, उदर, मूढ़गर्भ और विद्रधि
छठा अध्याय: प्रमेह के 20 प्रकार और मधुमेह

प्रमेह मूत्र-मार्ग के उन विकारों का नाम है जिनमें पेशाब ज़्यादा, असामान्य या बदले रूप में आता है। यह शब्द "प्र-मिह" से बना है, जिसका अर्थ है अधिक मात्रा में बाहर निकालना। सुश्रुत बीस प्रकार बताते हैं, और यह वर्गीकरण प्राचीन दुनिया के सबसे विस्तृत वर्गीकरणों में गिना जाता है:
- दस कफज — उदक (पानी जैसा साफ़), इक्षु (गन्ने के रस जैसा), सांद्र (गाढ़ा), सुरा (ख़मीर उठी शराब जैसी गंध), पिष्ट (आटे के घोल जैसा), शुक्र (वीर्य जैसा), सिकता (रेतीली तलछट), शीत (ठंडा), शनैर् (धीरे टपकने वाला) और लवण (नमकीन) मेह।
- छह पित्तज — क्षार (क्षारीय), काल या नील (गहरा नीला-काला), हारिद्र (हल्दी जैसा पीला), मांजिष्ठ (मजीठ जैसा लाल), रक्त (ख़ून मिला) और अम्ल (खट्टी गंध) मेह।
- चार वातज — वसा (चर्बी जैसा), मज्जा (अस्थि-मज्जा जैसा), हस्ति (हाथी की तरह अधिक और अनियमित) और मधुमेह, यानी "शहद जैसा मूत्र"।
सुश्रुत के अनुसार इन बीस में मधुमेह सबसे गंभीर है। वे इसके लक्षण गिनाते हैं: बार-बार और अधिक पेशाब, बहुत प्यास, अधिक भूख, वज़न का कम होना, कमज़ोरी, और ऐसा मीठा मूत्र जो मक्खियों और चींटियों को आकर्षित करे। अनियंत्रित प्रमेह की जटिलताएँ भी बताई गई हैं: पिडका (फुंसियाँ), विद्रधि (फोड़े), गैंग्रीन और अंत में प्राणघातक परिणाम।
सुश्रुत का यह वर्णन आधुनिक चिकित्सा में मधुमेह कहे जाने वाले रोग का प्राचीन समकक्ष माना जाता है। यह वर्णन यूनानी चिकित्सक अरेटियस द्वारा इस रोग को उसका यूनानी नाम दिए जाने से बहुत पहले पांडुलिपियों में दर्ज हो चुका था।
ज़रूरी बात: सुश्रुत का प्रमेह-वर्गीकरण आधुनिक चिकित्सा का विकल्प नहीं है। अगर आपको मधुमेह है, तो इंसुलिन, दवा और नियमित जाँच के निर्णय अपने डॉक्टर के साथ ही लें। कोई जड़ी-बूटी लेने से पहले डॉक्टर को बताएँ, और चल रही दवा अपने आप बंद न करें।
सातवाँ अध्याय: उदर के आठ प्रकार
इस अध्याय में उदर रोग, यानी पेट का असामान्य रूप से बढ़ना और जलोदर, का वर्णन है। आठ प्रकार हैं: वातज (गैस, तेज़ दर्द, रूखी त्वचा), पित्तज (जलन, पीलापन, बुख़ार), कफज (धीरे शुरू होने वाला, ठंडा और भारी), त्रिदोषज (गंभीर), प्लीहोदर (तिल्ली का बढ़ना), यकृदुदर (जिगर का बढ़ना), बद्धगुदोदर (आँत में रुकावट) और परिस्रावी उदर (आँत में छेद से पेट में द्रव जमना)। अध्याय के अंत में जलोदर के सामान्य लक्षण बताए गए हैं, जैसे दबाने पर गड्ढा पड़ना और पेट में द्रव की लहर। सुश्रुत आठों प्रकारों को शुरुआती संकेतों, पेट थपथपाने की आवाज़ और द्रव के रंग व गाढ़ेपन से अलग करते हैं।
8वाँ अध्याय: मूढ़गर्भ — कठिन प्रसव और सिज़ेरियन
सुश्रुत निदान स्थान का 8वाँ अध्याय मूढ़गर्भ ("भटका हुआ गर्भ") पर है, यानी अटका हुआ प्रसव और गर्भ की गलत स्थिति। वे अटके प्रसव में गर्भ की आठ स्थितियाँ बताते हैं, कुछ के लिए हाथ से गर्भ घुमाने की विधियाँ देते हैं, और बाकी के लिए अंतिम उपाय के रूप में सिज़ेरियन (पाटनक) का वर्णन करते हैं। माना जाता है कि ऐसी बारीकी यूरोपीय प्रसूति-विज्ञान में उन्नीसवीं सदी के अंत तक नहीं दिखी। अध्याय गर्भस्राव और गर्भपात को गर्भ की अवधि और दोष के आधार पर अलग करता है, और बताता है कि कब सिज़ेरियन ज़रूरी है और कब बिना ऑपरेशन के देखभाल बेहतर मानी गई है।
नौवाँ अध्याय: विद्रधि (फोड़ा) के छह प्रकार
विद्रधि यानी फोड़ा, किसी ऊतक या गुहा में मवाद का जमा होना। छह प्रकार हैं: वातज (तेज़ दर्द, धीरे पकने वाला), पित्तज (जलन, पीला मवाद, जल्दी पकने वाला), कफज (धीमा, ठंडा, घना मवाद), सान्निपातिक, चोट के बाद बनने वाला, और रक्तज (ख़ून मिला मवाद)। भीतरी विद्रधि की सात जगहें बताई गई हैं: हृदय, तिल्ली, जिगर, गुर्दा, मूत्राशय, नाभि और गर्भाशय। अध्याय के अंत में गुल्म और विद्रधि का अंतर बताया गया है: गुल्म बिना मवाद वाली गाँठ है और उसमें औषधि दी जाती है, जबकि विद्रधि मवाद की थैली है और उसमें चीरा लगाया जाता है।
दसवें से पंद्रहवें अध्याय तक: विसर्प, अर्बुद, क्षुद्र रोग और अस्थि-भंग
10वाँ अध्याय: विसर्प, नाड़ी-व्रण और स्तन-रोग
सुश्रुत निदान स्थान का 10वाँ अध्याय तीन जुड़े विषयों को साथ रखता है। विसर्प ("चारों ओर रेंगना") फैलने वाली त्वचा-सूजन है, जिसके पाँच प्रकार हैं: वातज, पित्तज, कफज, सान्निपातिक और क्षतज (चोट से)। इसका वर्णन आज के इरिसिपेलस और सेल्युलाइटिस से मेल खाता है।
नाड़ी-व्रण ("नली जैसा घाव") पुराने नासूर हैं, और इनमें शल्यज प्रकार ख़ास है। इसमें शरीर में अटका काँटा, फाँस या हड्डी का टुकड़ा रिसता हुआ नासूर बनाए रखता है, और जब तक यह बाहरी वस्तु (शल्य) निकाली न जाए, स्राव बना रहता है।
स्तन-रोग वाले हिस्से में माँ के दूध के गुण-दोष और स्तन-विद्रधि (आज की भाषा में मास्टाइटिस) का वर्णन है। साथ में यह भी बताया गया है कि दूध पिलाने से जुड़ी सूजन को उस गहरे फोड़े से कैसे अलग करें, जिसमें शल्य-क्रिया से मवाद निकालना पड़ता है।
11वाँ अध्याय: ग्रंथि, अपची, अर्बुद और गलगंड
इस अध्याय में गाँठों का व्यवस्थित वर्णन है। ग्रंथि छोटी, एक जगह की सूजन है (वातज, पित्तज, कफज, मेदज, रक्तज और सिराज, यानी नसों का फूलना)। अपची गले की सूजी लसीका-ग्रंथियों की माला है, जैसी तपेदिक से जुड़ी ग्रंथि-सूजन में दिखती है।
गलगंड यानी घेंघा, जो साँस और निगलने में रुकावट डाल सकता है। अर्बुद बड़ी, बिना मवाद वाली गाँठें हैं, जिनमें मांसार्बुद, अध्यर्बुद (पुराने अर्बुद पर बना दूसरा) और द्विरर्बुद (जोड़े में) भी गिने गए हैं। गहरे मांसार्बुद और अध्यर्बुद को उस समय के साधनों से असाध्य माना गया। इस तरह ग्रंथ अपने समय की सीमाओं को भी साफ़ तौर पर दर्ज करता है।
12वाँ अध्याय: वृद्धि, उपदंश और श्लीपद
वृद्धि (अंडकोष का बढ़ना) के सात प्रकार हैं, जिनमें आंत्रवृद्धि यानी हाइड्रोसील या हर्निया भी है। सुश्रुत हर्निया को हाथ से वापस बैठाने और हाइड्रोसील से द्रव निकालने की विधियाँ बताते हैं, जो हर्निया-शल्य के सबसे पुराने लिखित वर्णनों में गिनी जाती हैं।
उपदंश जननांग के घावों का वर्णन है, जिसे आज यौन संक्रमणों से जोड़ा जाता है। श्लीपद यानी हाथीपाँव में पैर की ऐसी सूजन होती है जिसमें दबाने पर गड्ढा नहीं पड़ता और त्वचा मोटी व खुरदरी हो जाती है। सुश्रुत ने दर्ज किया कि यह निचले, जलभराव वाले इलाक़ों में ज़्यादा होता है, और इस अवलोकन को आज फ़ाइलेरिया के कृमि के फैलाव से जोड़ा जाता है।
13वाँ अध्याय: क्षुद्र रोग — 40 से अधिक छोटे रोग
सुश्रुत निदान स्थान का 13वाँ अध्याय क्षुद्र रोग पर है, यानी ऐसे छोटे रोग जो परेशानी देते हैं पर आम तौर पर जानलेवा नहीं होते। सुश्रुत चालीस से अधिक उप-प्रकार गिनाते हैं, जिन्हें समूहों में समझना आसान है:
- गाँठ और मस्से जैसे त्वचा-घाव — अजगल्लिका, यवप्रख्या, अंधालजी, विवृता, कच्छपिका, वल्मीक।
- सिस्ट जैसी सूजन — इंद्रवृद्धा, पनसिका, पाषाणगर्दभ, जालगर्दभ, कक्षा।
- छाले, फोड़े और नाख़ून के रोग — विस्फोट, अग्निरोहिणी, चिप्प, कुनख, अनुशयी, विदारिका, शर्करार्बुद।
- एक्ज़िमा, गोखरू और फटी एड़ियाँ — पामा, विचर्चिका, रकसा, पाददारिका, कदर, अलस।
- बाल और सिर — इंद्रलुप्त (बाल झड़ना), दारुणक (रूसी), अरुंषिका (सिर की फुंसियाँ), पलित (बालों का समय से पहले सफ़ेद होना)।
- दाने, तिल और रंगत — मसूरिका (मसूर जितने दाने), और तिलकालक, न्यच्छ, चर्मकील, व्यंग (तिल, जन्म-चिह्न, झाइयाँ और रंगत के धब्बे)।
- जननांग और गुदा से जुड़े — परिवर्तिका, अवपाटिका, निरुद्धप्रकाश, निरुद्धगुद, अहिपूतना, वृषणकच्छु, गुदभ्रंश।
यह अध्याय त्वचा-रोगों और त्वचा की सुंदरता से जुड़ी समस्याओं का संक्षिप्त पारंपरिक विवरण है, जिसमें हर रोग का नाम, दोष, शुरुआती संकेत, लक्षण और साध्यता विस्तार से दी गई है। इस संदर्भ में जिन पारंपरिक सामग्रियों का नाम आता है, जैसे मुल्तानी मिट्टी, नीम, मंजिष्ठा, हरीतकी, कूठ और दारुहरिद्रा, उनका उपयोग आज भी आयुर्वेदिक त्वचा-देखभाल में आम तौर पर किया जाता है।
14वाँ और 15वाँ अध्याय: शूक दोष और अस्थि-भंग
शूक दोष छोटा पर अहम अध्याय है। इसमें उन जटिलताओं का वर्णन है जो कुछ आयुर्वेदिक दवाओं और प्रक्रियाओं से ही पैदा हो सकती हैं। मूल संदर्भ शुक्र से जुड़ी समस्याओं की दवाओं का है, पर सुश्रुत इसे हर उस स्थिति पर लागू करते हैं जहाँ उपचार से नई समस्या बनी, और हर जटिलता को सँभालने के उपाय भी बताते हैं। यहाँ ग्रंथ यह भी स्वीकार करता है कि वैद्य का हस्तक्षेप भी नुकसान कर सकता है।
पंद्रहवाँ अध्याय संधि-मुक्त (जोड़ का खिसकना) और कांड-भग्न (लंबी हड्डी का टूटना) पर है। सुश्रुत कारण (चोट, गिरना, भार और अस्थि-क्षय), खिसके जोड़ के लक्षण (टेढ़ापन, काम न कर पाना, सूजन, दर्द) और पहचान का तरीका बताते हैं, जिसमें प्रभावित जोड़ की तुलना दूसरी ओर के स्वस्थ जोड़ से की जाती है। टूट के प्रकार (कई टुकड़ों में, तिरछा, आड़ा, हरी टहनी जैसा) और साध्यता भी दी गई है, जिसमें जोड़ के भीतर की खुली टूट और रीढ़ की टूट को असाध्य माना गया।
16वाँ अध्याय: मुख रोग का वर्गीकरण

सुश्रुत निदान स्थान का अंतिम, 16वाँ अध्याय मुख रोग पर है, यानी होंठों से लेकर स्वरयंत्र तक पूरे मुँह के रोग। इसमें तीस से अधिक मुख रोगों का वर्णन है, और मुख रोग का वर्गीकरण शरीर-रचना के आधार पर सात समूहों में किया गया है:
- ओष्ठ-रोग — होंठों के रोग (वातज, पित्तज, कफज, रक्तज, मांसज और मेदज)।
- दंतमूलगत रोग — दाँतों की जड़ के रोग, जिनमें दंत-नाड़ी (दाँत की जड़ का नासूर) प्रसिद्ध है।
- दंतगत रोग — दाँत के रोग, जैसे दाँतों में सड़न, झनझनाहट और फ़्लोरोसिस जैसा बदरंगपन।
- जिह्वागत रोग — जीभ के रोग, जैसे जीभ की सूजन, छाले और नक्शे जैसी दिखने वाली जीभ।
- तालुगत रोग — तालु के रोग, जैसे कटा तालु और तालु के छाले।
- कंठगत रोग — गले के रोग, जैसे टॉन्सिल और गले की सूजन से मिलती-जुलती स्थितियाँ।
- सर्वमुखगत रोग — पूरे मुँह को प्रभावित करने वाले रोग, जैसे मुँह में सफ़ेद परत जमना या पूरे मुँह में गंभीर छाले।
आयुर्वेद की मुख-दिनचर्या इसी अध्याय से जुड़ी मानी जाती है। इसमें सुबह दातुन (नीम की टहनी से दाँत साफ़ करना), दंतमंजन (जड़ी-बूटियों वाला दाँतों का पाउडर), जिह्वा-निर्लेखन (जीभ साफ़ करना) और गंडूष (तेल से कुल्ला, जिसे ऑयल पुलिंग भी कहते हैं) शामिल हैं। परंपरा में माना गया है कि यह दिनचर्या मुँह को स्वस्थ रखने में सहारा दे सकती है।
रोज़ की मुख-दिनचर्या: सुश्रुत की परंपरा में दंतमंजन दिन में दो बार और गंडूष सुबह तिल या नारियल के तेल से करने का सुझाव दिया जाता है। दाँत या मसूड़ों की किसी चल रही समस्या में दंत-चिकित्सक से ज़रूर मिलें।
आज के आयुर्वेद में निदान स्थान क्यों मायने रखता है

निदान स्थान दो हज़ार साल पुराने ग्रंथ का हिस्सा है, फिर भी यह आज पढ़ाया और इस्तेमाल किया जाने वाला संदर्भ है। भारत में बीएएमएस की पढ़ाई में शास्त्रीय आयुर्वेदिक निदान का आधार यह वर्गीकरण माना जाता है, और कुष्ठ, प्रमेह व मुख रोग के अध्याय ख़ास तौर पर रोज़ के चिकित्सा-व्यवहार में काम आते हैं।
वर्गीकरण आज भी पहचाना जा सकता है। कुष्ठ के अठारह प्रकार एक्ज़िमा, सोरायसिस, विटिलिगो, दाद, इक्थियोसिस और केलॉइड जैसी आज की श्रेणियों से काफ़ी हद तक मेल खाते माने जाते हैं। प्रमेह के बीस प्रकारों को मेटाबॉलिज़्म यानी चयापचय से जुड़ी एक सतत शृंखला की तरह देखा जा सकता है, जिसमें अलग-अलग अवस्थाओं को एक-दूसरे से जुड़ा माना गया है।
हर रोग के भीतर दोष का भेद। एक ही नाम के रोग को दोष के अनुसार अलग देखा जाता है। विचर्चिका का वातज रूप रूखा और फटा, पित्तज रूप लाल और रिसने वाला, और कफज रूप चिकना और पपड़ीदार माना गया है, और तीनों के लिए अलग जड़ी-बूटियाँ सुझाई जाती हैं। व्यक्ति के अनुसार चिकित्सा चुनने की यह सोच इसी वर्गीकरण से जुड़ी मानी जाती है।
साध्यता और रोज़ की दिनचर्या। साध्य, कष्टसाध्य और असाध्य का भेद वैद्य को बताता है कि कब मरीज़ को किसी विशेषज्ञ के पास भेजना है, कब केवल राहत पर ध्यान देना है और कब लंबी चिकित्सा शुरू करनी है। निदान स्थान बताता है कि क्या बिगड़ सकता है, और सूत्र स्थान की दिनचर्या व ऋतुचर्या (मौसम के अनुसार आदतें) बताती हैं कि रोज़ क्या करें: मुख के लिए दंतमंजन और गंडूष, त्वचा के लिए उबटन और लेप, और वात के लिए अभ्यंग।
मूल ग्रंथ पढ़ना चाहें, तो सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला पूरा अंग्रेज़ी अनुवाद कुंजलाल भिषग्रत्न का है, जो 1907 से 1916 के बीच तीन खंडों में छपा; इसके दूसरे खंड में पूरा निदान स्थान टीका के साथ है। बाद में पी. वी. शर्मा (1999) और के. आर. श्रीकंठ मूर्ति (2000–2001) के अनुवाद भी आए।
व्यावहारिक बात: किसी पुरानी समस्या में एक योग्य वैद्य उसे दोष और गहराई के आधार पर, यानी निदान स्थान के ढाँचे में, समझने की कोशिश कर सकते हैं। पर चल रही दवा अपने आप न बदलें और न बंद करें। कोई पुरानी स्थिति हो, गर्भावस्था हो, बच्चों के लिए कुछ सोच रहे हों या आप पहले से दवाएँ ले रहे हों, तो डॉक्टर या वैद्य से सलाह लेकर ही आगे बढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सुश्रुत संहिता में कितने अध्याय हैं? +
सुश्रुत संहिता छह स्थानों में बँटी है: सूत्र स्थान (46 अध्याय), निदान स्थान (16), शारीर स्थान (10), चिकित्सा स्थान (40), कल्प स्थान (8) और उत्तर तंत्र (66)। पहले पाँच स्थानों में कुल 120 अध्याय हैं, और उत्तर तंत्र जोड़ने पर कुल संख्या 186 हो जाती है।
सुश्रुत संहिता में कितने स्थान हैं (sushruta samhita me kitne sthan hai)? +
छह। सूत्र, निदान, शारीर, चिकित्सा और कल्प स्थान, और छठा भाग उत्तर तंत्र, जिसे बाद में जोड़ा गया पूरक खंड माना जाता है। निदान स्थान इनमें दूसरे नंबर पर है।
सुश्रुत निदान स्थान का पहला अध्याय किस बारे में है? +
पहला अध्याय वात व्याधि पर है, यानी तंत्रिका-तंत्र से जुड़े रोग। सुश्रुत पहले पाँच वायुओं (प्राण, उदान, समान, व्यान और अपान) का सामान्य काम समझाते हैं, और फिर बताते हैं कि किसी एक के बिगड़ने से लकवा, मिर्गी, साइटिका या चेहरे के लकवे जैसी कौन-सी स्थितियाँ बनती हैं।
सुश्रुत निदान स्थान का 8वाँ अध्याय क्या बताता है? +
8वाँ अध्याय मूढ़गर्भ पर है, यानी अटका हुआ प्रसव और गर्भ की गलत स्थितियाँ। इसमें गर्भ की आठ स्थितियाँ, हाथ से गर्भ घुमाने की विधियाँ, अंतिम उपाय के रूप में सिज़ेरियन का वर्णन, और गर्भस्राव व गर्भपात का अंतर दिया गया है।
सुश्रुत निदान स्थान के 13वें अध्याय में क्या है? +
13वाँ अध्याय क्षुद्र रोग पर है, यानी चालीस से अधिक छोटे रोग जो परेशानी देते हैं पर आम तौर पर जानलेवा नहीं होते। इनमें मस्से, गोखरू, फटी एड़ियाँ, इंद्रलुप्त (बाल झड़ना), दारुणक (रूसी), पलित (बालों का समय से पहले सफ़ेद होना), तिल और झाइयाँ शामिल हैं।
मुख रोग का वर्गीकरण कैसे किया गया है? +
निदान स्थान के 16वें अध्याय में मुख रोगों को सात समूहों में बाँटा गया है: होंठ (ओष्ठ), दाँतों की जड़ (दंतमूल), दाँत (दंत), जीभ (जिह्वा), तालु, गला (कंठ) और पूरा मुँह (सर्वमुख)। इस अध्याय में तीस से अधिक मुख रोगों का वर्णन है।