सारांश: अष्टांग हृदय आचार्य वाग्भट का लिखा वह संस्कृत ग्रंथ है, जिसमें आयुर्वेद की आठों शाखाएँ 120 अध्यायों और 7,120 श्लोकों में समेटी गई हैं। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता के साथ इसे बृहत्त्रयी का तीसरा स्तंभ माना जाता है। आज भी यह BAMS के पहले वर्ष के पाठ्यक्रम का हिस्सा है, क्योंकि इसकी रोज़मर्रा की समझ आधुनिक घर में भी उतनी ही काम आती है।
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Read this article in English: Ashtanga Hridaya: Vagbhata's Ayurveda Classical Text Explained
- वाग्भट अष्टांग हृदय क्या है
- अष्टांग हृदय किसने लिखा — आचार्य वाग्भट कौन थे
- वाग्भट ने अष्टांग हृदय क्यों लिखा
- अष्टांग हृदय के छह स्थान और 120 अध्याय
- सूत्रस्थान — हर विद्यार्थी की पहली सीढ़ी
- अष्टांग हृदय, चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में अंतर
- अनुवाद, टीकाएँ और आज का BAMS पाठ्यक्रम
- आज की दिनचर्या में अष्टांग हृदय
- अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

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च्यवनप्राश रसायन वर्ग का पारंपरिक अवलेह है और वाग्भट ने अपने रसायन अध्यायों में इसी परंपरा के योग का उल्लेख किया है, इसलिए यह इस विषय से स्वाभाविक रूप से जुड़ता है।
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अष्टांग हृदय संस्कृत का वह ग्रंथ है जिसका नाम ही उसका परिचय दे देता है — “आयुर्वेद की आठों शाखाओं का हृदय”। इसे आचार्य वाग्भट ने लिखा, जो प्राचीन भारत के सिंधु क्षेत्र में लगभग चौथी से पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में हुए एक बौद्ध विद्वान और वैद्य थे।
इस ग्रंथ में कुल 120 अध्याय हैं, जो छह स्थानों यानी खंडों में बँटे हैं, और मानक संस्करण में श्लोकों की संख्या 7,120 है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता के साथ इसे बृहत्त्रयी — आयुर्वेद के तीन आधार-ग्रंथों — का तीसरा स्तंभ माना जाता है।
ये दोनों पुराने ग्रंथ हज़ारों पन्नों में फैले हैं और मुख्य रूप से विशेषज्ञ विद्वानों को ध्यान में रखकर लिखे गए थे। अष्टांग हृदय जानबूझकर अलग तरह से लिखा गया — इस तरह कि एक साधारण विद्यार्थी पूरी चिकित्सा-विद्या ताड़पत्रों की एक ही गठरी में अपने साथ ले जा सके।
नाम का अर्थ
अष्ट = आठ · अंग = शाखा · हृदय = सार, मर्म। तीनों मिलकर: “चिकित्सा की आठ शाखाओं का हृदय-सार”।
आयुर्वेद जिन आठ शाखाओं को मानता है, वे हैं — कायचिकित्सा (आंतरिक चिकित्सा), शल्य (शल्य-क्रिया), शालाक्य (कान, नाक, गला और नेत्र), कौमारभृत्य (बाल-चिकित्सा), भूत विद्या (मानसिक चिकित्सा), अगद तंत्र (विष-विज्ञान), रसायन (वृद्धावस्था और पुनर्नवीकरण) और वाजीकरण (प्रजनन से जुड़ी चिकित्सा)। अष्टांग हृदय इन सभी को समेटता है — पुराने ग्रंथों को दोहराकर नहीं, बल्कि उनकी सबसे उपयोगी और भरोसेमंद शिक्षाओं को चुनकर एक पढ़ने योग्य रूप में ढालकर।

अष्टांग हृदय किसने लिखा — आचार्य वाग्भट कौन थे
आचार्य वाग्भट को आयुर्वेद के तीन आधार-लेखकों में गिना जाता है — चरक और सुश्रुत के साथ। ग्रंथ की अपनी प्रस्तावना के अनुसार वे सिंहगुप्त के पुत्र थे, और उनके दादा भी वाग्भट नाम के विद्वान-वैद्य थे। उनका परिवार उत्तर-पश्चिम भारत के सिंधु नदी क्षेत्र से था, जो ईस्वी सन् की शुरुआती सदियों में चिकित्सा और दर्शन की परंपराओं का बड़ा संगम-स्थल माना जाता था।
वाग्भट अपने समय के महायान बौद्ध प्रमुख भिक्षु अवलोकित के शिष्य थे। उनकी यह बौद्ध पृष्ठभूमि महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इसी से समझ आता है कि उन्होंने साधारण रोगी और साधारण विद्यार्थी की इतनी चिंता क्यों की, और विद्वत्ता के प्रदर्शन की जगह स्पष्टता क्यों चुनी। महायान परंपरा में ज्ञान तभी सार्थक माना जाता है जब वह बहुतों का कष्ट कम करे, कुछ ही लोगों का नहीं।
ग्रंथ के भीतर के संदर्भों और तिब्बती तथा चीनी स्रोतों से मिलती पुष्टि के आधार पर विद्वान उनका समय चौथी से पाँचवीं शताब्दी ईस्वी के बीच मानते हैं। तब तक चरक संहिता (लगभग पहली शताब्दी ईस्वी) और सुश्रुत संहिता (लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व की शिक्षाएँ, बाद में संपादित) विशाल संदर्भ-ग्रंथ बन चुकी थीं। वाग्भट की देन यह मानी जाती है कि उन्होंने उपलब्ध सारी संहिताएँ पढ़ीं और एक नए ढंग का ग्रंथ तैयार किया — ऐसा ग्रंथ जिसे पढ़ाया भी जा सके, साथ ले जाया भी जा सके, और जिसमें एक ही खंड में पूरा आयुर्वेद समाया हो।
दो वाग्भट, दो ग्रंथ
आचार्य वाग्भट ने पहले अष्टांग संग्रह लिखा, जिसमें पुरानी संहिताओं का विस्तृत गद्य और उनकी चर्चाएँ सुरक्षित रहीं। बाद में उन्होंने उसी को छाँटकर छोटा, केवल पद्य वाला अष्टांग हृदय तैयार किया। दोनों ग्रंथ प्रामाणिक हैं और दोनों पढ़े जाते हैं — पर पूरे भारत और उसके बाहर विद्यार्थियों की रोज़ की पाठ्यपुस्तक अष्टांग हृदय ही बना।

वाग्भट ने अष्टांग हृदय क्यों लिखा
इसका कारण लेखक ने खुद बताया है। प्रस्तावना में उनके अपने शब्द हैं: “चिकित्सा-शास्त्र के महासागर का मंथन करने पर अष्टांग संग्रह नाम का अमृत-कोष प्राप्त हुआ। उसी अमृत-कोष से साधारण विद्यार्थियों के हित के लिए अष्टांग हृदय नाम का संक्षिप्त ग्रंथ लिखा गया।”
यहाँ “साधारण विद्यार्थी” किसी कमी की ओर संकेत नहीं करता; पारंपरिक संस्कृत में इसका अर्थ बस मध्यम या सामान्य होता है। वाग्भट कह रहे हैं कि मूल आयुर्वेदिक साहित्य इतना विशाल और तकनीकी था कि उसे केवल सबसे प्रतिभाशाली विद्वान ही पूरा कर पाते थे।
अधिकांश विद्यार्थी — गाँव के भावी वैद्य, गृहस्थी सँभालते चिकित्सक, कम समय वाले युवा शिक्षार्थी — कभी अंत तक पहुँच ही नहीं पाते थे। वे शुरुआती अध्याय कंठस्थ करते और फिर अभ्यास छोड़ देते। यह विद्या इसलिए लुप्त नहीं हो रही थी कि वह ग़लत थी, बल्कि इसलिए कि वह आम विद्यार्थी की पहुँच से बाहर थी।
तो वाग्भट ने एक अलग तरह का काम उठाया। उन्होंने सब कुछ पढ़ा — चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, हारीत संहिता, भेल संहिता, काश्यप संहिता — और हर अनुच्छेद पर एक ही प्रश्न रखा: क्या रोगी को वास्तव में देखने के लिए विद्यार्थी को यह जानना ज़रूरी है? अगर हाँ, तो वह शिक्षा रखी गई, अक्सर एक सघन संस्कृत श्लोक में समेटकर। अगर वह कोई शास्त्रार्थ, दोहराया हुआ उदाहरण या विषय से हटा हुआ प्रसंग था, तो उसे छोड़ दिया गया।
नतीजा 120 अध्यायों की ऐसी पुस्तक थी, जिसे विद्यार्थी दो साल में कंठस्थ कर सके और जीवन भर काम में ले सके। यही वजह है कि तीनों बड़े आयुर्वेदिक ग्रंथों में अष्टांग हृदय सबसे अधिक अनूदित और सबसे अधिक टीका किया गया ग्रंथ माना जाता है। इस तरह पूरा शास्त्र विद्वानों की आपसी चर्चा के लिए नहीं, पढ़ने वाले विद्यार्थी के लिए तैयार हुआ।
अष्टांग हृदय के छह स्थान और 120 अध्याय
अष्टांग हृदय के 120 अध्याय छह स्थानों में बँटे हुए हैं। हर स्थान एक अलग व्यावहारिक प्रश्न का उत्तर देता है, जिस पर वैद्य को पकड़ बनानी होती है।
1. सूत्रस्थान — 30 अध्याय · आधार। पहला और सबसे महत्वपूर्ण खंड। इसमें आयुर्वेद के मूल सिद्धांत हैं: तीन दोष (वात, पित्त, कफ), सात धातु (शरीर के ऊतक), अग्नि (पाचन-अग्नि), दिनचर्या, ऋतुचर्या, रोके जा सकने और न रोके जा सकने वाले वेग, आहार-पान का विज्ञान, छह रस और औषधियों का वर्गीकरण। यदि आप ग्रंथ का केवल एक खंड पढ़ सकें, तो आमतौर पर यही सुझाया जाता है।
2. शारीरस्थान — 6 अध्याय · शरीर और मन। गर्भ-विज्ञान, रचना और शरीर-क्रिया वाला खंड। इसमें गर्भ कैसे बनता है, शरीर की रचना कैसी है, शरीर और मन की प्रकृति क्या है, और कौन से स्वप्न तथा शकुन शुभ या अशुभ संकेत माने गए हैं — यह सब आता है।
3. निदानस्थान — 16 अध्याय · निदान। रोग-विज्ञान वाला खंड। हर अध्याय एक बड़े रोग-समूह को लेता है — ज्वर, प्रमेह (मूत्र से जुड़े विकारों का शास्त्रीय वर्ग), त्वचा-विकार, उदर-रोग — और उसके कारण, लक्षण, रोग की प्रक्रिया और परिणाम तक पहुँचता है। यहीं वैद्य रोग को पहचानना सीखता है।
4. चिकित्सास्थान — 22 अध्याय · चिकित्सा-क्रम। निदानस्थान में बताए गए हर रोग के लिए यह खंड बताता है कि कौन-सी औषधियाँ, कौन-से योग, कैसा आहार-पान, कौन-सा व्यवहार और क्या पथ्य-अपथ्य रखा जाता है, ताकि रोगी संतुलन में लौट सके।
5. कल्प-सिद्धिस्थान — 6 अध्याय · भेषज-कल्पना और पंचकर्म। औषध-निर्माण वाला खंड। इसमें शोधन चिकित्सा यानी पंचकर्म, उससे जुड़ी जटिलताओं का प्रबंधन और औषध-योग बनाने के सिद्धांत आते हैं।
6. उत्तरतंत्र — 40 अध्याय · बाकी सात शाखाएँ। अध्यायों की गिनती में सबसे बड़ा खंड। पहले पाँच स्थान कायचिकित्सा को विस्तार से देखते हैं, जबकि इस अंतिम खंड में बाकी सात शाखाएँ आती हैं — बाल-चिकित्सा, मानसिक चिकित्सा, कान-नाक-गला और नेत्र, शल्य, विष-विज्ञान, रसायन और वाजीकरण।
यह क्रम क्यों मायने रखता है
वाग्भट पहले आधार रखते हैं, फिर शरीर और मन, फिर निदान, फिर चिकित्सा, फिर औषध-निर्माण और अंत में विशेष शाखाएँ। आधुनिक चिकित्सा पाठ्यक्रम भी इसी क्रम में चलता है — पहले मूल विज्ञान, फिर नैदानिक विषय, फिर विशेषज्ञता। यह क्रम वाग्भट ने आधुनिक चिकित्सा-शिक्षा से लगभग 1,500 साल पहले तय कर दिया था।

सूत्रस्थान — हर विद्यार्थी की पहली सीढ़ी
सूत्रस्थान यानी पहले 30 अध्याय ही वह खंड है जिससे हर BAMS विद्यार्थी की पढ़ाई शुरू होती है। भारत में आज जो भी खुद को आयुर्वेदिक डॉक्टर कहता है, उसने इनमें से अधिकांश अध्याय कंठस्थ किए हैं।
पहला अध्याय आयुष्कामीय अध्याय (दीर्घ जीवन की इच्छा) आयुर्वेद की परिभाषा से शुरू होता है — आयु यानी जीवन, वेद यानी विज्ञान। इसी में तीन दोष, अग्नि, सात धातु, तीन मल, षड्रस (छह रस), द्रव्यगुण और चिकित्सा के चार पाद — वैद्य, रोगी, परिचारक और औषध — का परिचय दिया जाता है।
इसके बाद अध्याय 2 दिनचर्या और अध्याय 3 ऋतुचर्या आते हैं — यानी सुबह की दिनचर्या और छह ऋतुओं का ढाँचा, दोनों इसी खंड से मिलते हैं। अध्याय 4, रोगानुत्पादनीय अध्याय, स्वस्थ रहने की चर्या पर है; यहीं वाग्भट तेरह अधारणीय वेग गिनाते हैं — शरीर के वे स्वाभाविक वेग जिन्हें कभी नहीं रोकना चाहिए — और वे वेग भी बताते हैं जिन्हें सोच-समझकर रोकना चाहिए।
अध्याय 5, द्रव-द्रव्य विज्ञानीय, तरल पदार्थों का अध्याय है। इसमें जल, दूध, दही, छाछ, घी, तेल और आसव-अरिष्ट जैसे द्रव्यों को आयुर्वेदिक वर्गीकरण में रखा गया है, साथ में समय, मात्रा और ऋतु से जुड़े नियम भी। अध्याय 6 से आगे आहार-द्रव्य, फिर उचित आहार-मात्रा, फिर रस (स्वाद), वीर्य (शक्ति), विपाक (पाचन के बाद का परिणाम) और प्रभाव (विशेष क्रिया) का विज्ञान आता है। सूत्रस्थान पूरा होते-होते विद्यार्थी के पास आयुर्वेद की पूरी शब्दावली आ जाती है — किसी एक रोग का सामना करने से पहले ही।
पढ़ना कहाँ से शुरू करें
अगर आप विद्यार्थी नहीं हैं और सिर्फ़ समझने के लिए पढ़ रहे हैं, तो सूत्रस्थान के अध्याय 2, 3 और 4 से शुरू करना आसान रहता है — दिनचर्या, ऋतुचर्या और वेग। ये तीनों अध्याय बिना किसी नैदानिक पृष्ठभूमि के भी पढ़े जा सकते हैं।

अष्टांग हृदय, चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में अंतर
भारतीय आयुर्वेद परंपरा में तीन आधार-ग्रंथों को बृहत्त्रयी कहा जाता है। तीनों की भूमिका अलग है।
चरक संहिता — लगभग पहली से दूसरी शताब्दी ईस्वी की, ऋषि आत्रेय की पुरानी मौखिक शिक्षाओं से संपादित। यह कायचिकित्सा का प्रमुख ग्रंथ है, तीनों में सबसे लंबा और सबसे दार्शनिक। गहरे सिद्धांत यहीं पढ़े जाते हैं — जीवन का दर्शन, वैद्य की नैतिकता, और अलग-अलग विचार-धाराओं के बीच लंबे शास्त्रार्थ।
सुश्रुत संहिता — लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व की शिक्षाओं से संकलित और चौथी शताब्दी ईस्वी तक वर्तमान रूप में संपादित। यह शल्य-तंत्र का प्रमुख ग्रंथ है। इसमें 300 से अधिक शल्य-प्रक्रियाएँ और 120 शल्य-उपकरण दर्ज हैं, जिनमें नाक की पुनर्रचना की प्रसिद्ध प्रारंभिक तकनीक भी शामिल है।
अष्टांग हृदय — लगभग चौथी से पाँचवीं शताब्दी ईस्वी का, व्यावहारिक और समन्वयकारी ग्रंथ। तीनों में सबसे छोटा, सबसे पठनीय और अभ्यास में सबसे आसान माना जाता है। यह चरक की औषध-दृष्टि और सुश्रुत की शल्य-दृष्टि को एक साथ जोड़ता है, और इसमें वाग्भट की अपनी देन भी जुड़ती है — विशेष रूप से योग-रचनाओं और रोज़मर्रा के जीवन से जुड़े सुझावों में।
तीनों को याद रखने का आसान तरीका
चरक दार्शनिक वैद्य हैं। सुश्रुत शल्य-चिकित्सक हैं। वाग्भट वह शिक्षक हैं जो इस पूरे ज्ञान को रोज़ के अभ्यास में उतारने लायक बनाते हैं।
इसी वजह से भारत में विद्यार्थी अष्टांग हृदय का सूत्रस्थान पहले पढ़ते हैं और पुराने दोनों ग्रंथों तक बाद में पहुँचते हैं। इन तीन बड़े ग्रंथों के बाद लघुत्रयी आती है — माधव निदान, शार्ङ्गधर संहिता और भावप्रकाश — जो मध्यकाल में बृहत्त्रयी के आधार पर आगे बढ़े। दोनों त्रयी मिलकर आयुर्वेदिक शिक्षा की मानक पाठ्य-सूची बनाती हैं।

अनुवाद, टीकाएँ और आज का BAMS पाठ्यक्रम
अष्टांग हृदय भारत तक सीमित नहीं रहा। रचना के चार सौ वर्षों के भीतर यह हिमालय पार कर तिब्बत पहुँचा, ख़ैबर दर्रे से होकर फ़ारस गया और वहाँ से अरबी चिकित्सा-पुस्तकालयों तक।
तिब्बत, आठवीं शताब्दी। तिब्बती बौद्ध ग्रंथ-संग्रह तंग्यूर में अष्टांग हृदय का पूरा तिब्बती अनुवाद शामिल है, चरक संहिता और सुश्रुत संहिता के साथ। यही अनुवाद तिब्बती पारंपरिक चिकित्सा — सोवा रिग्पा — के आधारों में से एक बना, जो आज भी तिब्बत, भूटान, लद्दाख और नेपाल के कुछ हिस्सों में चलती है।
बग़दाद, लगभग उसी काल में। अब्बासी ख़लीफ़ाओं के आदेश पर — उसी दरबार में जहाँ यूनानी चिकित्सा ग्रंथों का अरबी अनुवाद हो रहा था — अष्टांग हृदय का अरबी अनुवाद तैयार हुआ। इसी अरबी रास्ते से वाग्भट के विचार टुकड़ों में मध्यकालीन यूरोपीय चिकित्सा तक पहुँचे। जर्मनी, बीसवीं शताब्दी में भारतविद् लुइज़े हिल्गनबर्ग और विलिबाल्ड किर्फ़ेल के आधुनिक जर्मन अनुवाद ने इसे यूरोपीय विद्वानों और आयुर्वेद अभ्यासियों तक पहुँचाया।
भारत के भीतर इस ग्रंथ पर 37 से अधिक ज्ञात संस्कृत टीकाएँ लिखी गईं — किसी भी पारंपरिक आयुर्वेदिक ग्रंथ पर सबसे अधिक। इनमें सबसे प्रसिद्ध हैं अरुणदत्त की सर्वांग सुंदरा (लगभग 1200 ई.), हेमाद्रि की आयुर्वेद रसायन (1271–1309 ई.), चंद्रनंदन की पदार्थ चंद्रिका (दसवीं शताब्दी) और श्रीदास पंडित की हृदय बोधिका (चौदहवीं शताब्दी)। हर टीका किसी श्लोक में और गहरे उतरती है और अक्सर उदाहरण, व्यावहारिक स्पष्टीकरण तथा अतिरिक्त योग जोड़ती है।
पाठ्यक्रम से जुड़ाव
केंद्रीय भारतीय चिकित्सा परिषद (CCIM) अष्टांग हृदय के सूत्रस्थान को BAMS (बैचलर ऑफ़ आयुर्वेदिक मेडिसिन एंड सर्जरी) के पहले वर्ष का मुख्य विषय रखती है। देश के आयुर्वेदिक कॉलेजों की समय-सारणी में पहला ग्रंथ आमतौर पर यही मिलता है।
आज की दिनचर्या में अष्टांग हृदय
संस्कृत और तिथियों को एक तरफ़ रख दें, तो अष्टांग हृदय मूल रूप से एक व्यावहारिक पुस्तक है। जो शिक्षाएँ 1,500 साल तक चलती रही हैं, उनमें से अधिकांश आज भी सामान्य घर की दिनचर्या में अपनाई जा सकती हैं।
सुबह की दिनचर्या। सूर्योदय से पहले उठना, जीभ साफ़ करना, औषधीय चूर्ण या दातुन से दाँत साफ़ करना, सिर में तेल लगाना, शरीर पर तेल की मालिश यानी अभ्यंग, गुनगुने पानी से स्नान और फिर थोड़ी देर ध्यान या प्रार्थना। यह क्रम सूत्रस्थान के दिनचर्या अध्याय से आता है।
अपनी प्रकृति की समझ। वाग्भट का प्रकृति वाला अध्याय — यानी आपकी जन्मजात दोष-रचना — आज की लगभग हर आयुर्वेदिक सिफ़ारिश का आधार माना जाता है। रोज़ का तेल और रोज़ का आहार चुनने से पहले अपनी प्रकृति समझ लेना उपयोगी रहता है।
तीन पारंपरिक योग। पूरे ग्रंथ में वाग्भट तीन योगों का बार-बार उल्लेख करते हैं — त्रिफला (तीन फलों का योग, पाचन से जुड़ा), त्रिकटु (तीन तीखे द्रव्यों का योग, पाचन और कफ से जुड़ी स्थितियों में) और च्यवनप्राश, जिसे रसायन वर्ग का अवलेह माना जाता है। हमारा च्यवनप्राश भी इसी परंपरा के योग पर आधारित है — आँवला, अश्वगंधा, ब्राह्मी और घी से बना अवलेह, जिसे ग्रंथों के अनुसार दिन में एक चम्मच लिया जाता है।
ऋतु के अनुसार आहार और तेरह वेग। सूत्रस्थान का ऋतुचर्या अध्याय बताता है कि भारत की छह ऋतुओं में कौन-सा आहार और कौन-सी आदतें उपयुक्त मानी जाती हैं। और तेरह अधारणीय वेग — भूख, प्यास, नींद, छींक, जम्हाई, आँसू और बाकी — वह सूची है जिसे रोकने से बचने की सलाह ग्रंथ बार-बार देता है।
यह लेख जानकारी और परंपरा की समझ के लिए है, किसी चिकित्सकीय सलाह के रूप में नहीं। किसी चल रही स्वास्थ्य-स्थिति, गर्भावस्था, बच्चों या पहले से चल रही दवाओं की स्थिति में कोई भी आयुर्वेदिक योग शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर या योग्य वैद्य से सलाह लें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अष्टांग हृदय किसने लिखा है? (ashtanga hridaya kisne likha hai / ashtang hriday kiski rachna hai) +
अष्टांग हृदय की रचना आचार्य वाग्भट ने की, लगभग चौथी से पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में। वे उत्तर-पश्चिम भारत के सिंधु क्षेत्र के बौद्ध विद्वान और वैद्य थे, सिंहगुप्त के पुत्र और अपने समय के महायान बौद्ध प्रमुख भिक्षु अवलोकित के शिष्य। चरक और सुश्रुत के साथ उन्हें आयुर्वेद के तीन आधार-लेखकों में गिना जाता है।
अष्टांग हृदय में कितने अध्याय और कितने श्लोक हैं? (kitne shlok hai) +
कुल 120 अध्याय हैं, जो छह स्थानों में बँटे हैं — सूत्रस्थान 30, शारीरस्थान 6, निदानस्थान 16, चिकित्सास्थान 22, कल्प-सिद्धिस्थान 6 और उत्तरतंत्र 40 अध्याय। मानक संस्करण में श्लोकों की कुल संख्या 7,120 है।
अष्टांग संग्रह किसने लिखा है और अष्टांग हृदय से इसका क्या अंतर है? (ashtang sangrah kisne likha hai) +
दोनों ग्रंथ वाग्भट के ही लिखे हुए हैं। अष्टांग संग्रह पहले लिखा गया — वह लंबा है और गद्य तथा पद्य दोनों में विस्तार से लिखा गया संकलन है। अष्टांग हृदय उसी सामग्री का संक्षिप्त, केवल पद्य वाला रूप है, जिसे कंठस्थ करना आसान हो। भारत में मानक पाठ्यपुस्तक अष्टांग हृदय ही बनी।
क्या अष्टांग हृदय हिंदी में उपलब्ध है? मराठी pdf कहाँ मिलती है? +
हाँ। हिंदी टीकाएँ व्यापक रूप से छपती हैं और विद्यार्थियों में चौखंभा संस्करणों की निर्मला हिंदी टीका सबसे आम चुनाव मानी जाती है। मराठी, कन्नड़, मलयालम, तमिल और अंग्रेज़ी अनुवाद भी उपलब्ध हैं। ऊपर छह स्थानों और 120 अध्यायों की रूपरेखा दी गई है, ताकि आप तय कर सकें कि किस खंड से शुरू करना है।
e Samhita ashtanga hridaya क्या है? +
e-Samhita पारंपरिक आयुर्वेदिक ग्रंथों का मुफ़्त ऑनलाइन संग्रह है, जिसे राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा विरासत संस्थान (NIIMH, हैदराबाद, CCRAS के अंतर्गत) चलाता है। इसमें अष्टांग हृदय का संस्कृत पाठ अध्याय-दर-अध्याय मिलता है। यह लेख उसी ग्रंथ के छह स्थानों और मुख्य अध्यायों का सार देता है, ताकि आपको पता रहे कि वहाँ पहले क्या पढ़ना है।
अष्टांग हृदय और चरक संहिता में क्या फ़र्क है? +
चरक संहिता पहली–दूसरी शताब्दी ईस्वी की है, अधिक लंबी और दार्शनिक है और कायचिकित्सा पर केंद्रित है; उसमें लंबे शास्त्रार्थ और वैद्य की नैतिकता पर विस्तार मिलता है। अष्टांग हृदय उससे लगभग 200 से 300 साल बाद लिखा गया, संक्षिप्त और व्यावहारिक है और आठों शाखाओं को एक साथ समेटता है। कहा जाता है कि चरक सोचना सिखाते हैं और वाग्भट व्यवहार में उतारना।
क्या अष्टांग हृदय घर पर बिना गुरु के पढ़ा जा सकता है? +
हाँ, पर व्यावहारिक अपेक्षाओं के साथ। पूरी नैदानिक समझ के लिए यह ग्रंथ गुरु के साथ पढ़ने के लिए बना है। लेकिन दिनचर्या, ऋतुचर्या, आहार के नियम और न रोकने योग्य वेग जैसे जीवनशैली वाले अध्याय कोई भी विचारशील गृहस्थ पढ़ और अपना सकता है। किसी चल रही स्वास्थ्य-स्थिति में अपने डॉक्टर या वैद्य से सलाह ज़रूर लें।