सारांश: आयुर्वेद में गैस और पेट फूलने को कमज़ोर पाचन-अग्नि, बढ़े हुए वात और आम यानी बिना पचे भोजन के चिपचिपे अंश से जोड़ा जाता है। अजवाइन, हींग, जीरा, सौंफ और रात में त्रिफला — रसोई के ये पारंपरिक तरीके सबसे पहले सुझाए जाते हैं, और साथ में खाने का समय तथा विरुद्ध आहार सुधारना भी ज़रूरी माना जाता है।
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Read this article in English: Ayurvedic Remedies for Gas and Bloating: Quick Natural Relief
- पेट फूलने और गैस की आयुर्वेदिक वजह क्या मानी जाती है
- गैस और पेट फूलने के प्रकार: आपका प्रकार कौन-सा है
- गैस और पेट फूलने के 10 आयुर्वेदिक घरेलू उपाय
- खान-पान में क्या बदलें: विरुद्ध आहार की सूची
- पुराने पेट फूलने के लिए पारंपरिक जड़ी-बूटियाँ
- पाचन-अग्नि के लिए दिनचर्या में क्या बदलें
- रोज़ पेट फूलता हो तो त्रिफला लेने का पारंपरिक तरीका
- डॉक्टर या वैद्य को कब दिखाना ज़रूरी है
- अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

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Rog Nashak Chai में अजवाइन, सौंफ, जीरा, इलायची, अदरक, तुलसी, काली मिर्च, लौंग और सेंधा नमक — इस लेख में बताए गए कई पाचक द्रव्य सहित नौ द्रव्य पारंपरिक अनुपात में पहले से मिले होते हैं, इसलिए भोजन के ब
प्रोडक्ट देखें →पेट फूलने और गैस की आयुर्वेदिक वजह क्या मानी जाती है
अगर आप पेट फूलने की आयुर्वेदिक दवा या घरेलू उपाय खोजते हुए यहाँ तक पहुँचे हैं, तो शायद सामान्य उपाय पहले ही आज़मा चुके हैं — एसिडिटी की टैबलेट, जीरे का पानी, दूध बंद कर देना। कभी आराम मिलता है, कभी नहीं। आयुर्वेद इसे केवल "ज़्यादा गैस" मानकर नहीं देखता; इस शिकायत को समझने के लिए वह तीन बातों पर ध्यान देता है — अग्नि, वात और आम।
अग्नि यानी पाचन की शक्ति। जब यह मंद या अनियमित हो जाती है, जिसे आयुर्वेद में मंदाग्नि और विषमाग्नि कहा गया है, तो भोजन पेट और छोटी आँत में देर तक रुका रहता है, उसमें सड़न शुरू होती है, और वही वायु बनती है जो आप महसूस करते हैं।

अष्टांग हृदय, सूत्रस्थान, अध्याय 11 में यही बात कही गई है — पेट का फूलना (आयुर्वेद में आध्मान) और वायु का रुक जाना (आनाह), दोनों अग्नि के बिगड़ने से शुरू होते हैं।
वात गति का दोष है, और बड़ी आँत यानी पक्वाशय को इसका मुख्य स्थान माना जाता है। खाने का समय बिगड़ने, सूखा-ठंडा भोजन, ज़्यादा यात्रा, देर रात तक जागने या तनाव से नीचे की ओर चलने वाली अपान वात उलटी दिशा में चलने लगती है। इसीलिए पेट फूलने के साथ गुड़गुड़ और कभी कब्ज़ (आयुर्वेद में विबंध) भी जुड़ी रहती है।
आम वह चिपचिपा अंश है जो कमज़ोर अग्नि के कारण बिना पचा रह जाता है, और परंपरा में इसे पोषण के अवशोषण में रुकावट बनाने वाला माना जाता है। सुबह जीभ पर सफ़ेद परत, भोजन के बाद भारीपन और मुँह से आती गंध — ये इसके जाने-पहचाने संकेत माने जाते हैं।
संक्षेप में आयुर्वेद का तर्क
कमज़ोर अग्नि और बढ़ा हुआ वात भोजन को अधपचा छोड़ देते हैं, और वही भाग सड़कर गैस तथा भारीपन बनाता है। क्रम यही माना जाता है — पहले अग्नि, फिर वात, और आम धीरे-धीरे कम होता जाता है।
गैस और पेट फूलने के प्रकार: आपका प्रकार कौन-सा है
हर पेट फूलना एक जैसा नहीं होता। आयुर्वेद इसे प्रमुख दोष के हिसाब से अलग-अलग देखता है, जिससे उपाय सही चुना जा सके।
वात प्रकार — सबसे अधिक देखा जाने वाला
ऊपरी पेट में फूलना, गुड़गुड़, जगह बदलती वायु, आती-जाती तेज़ ऐंठन और साथ में कब्ज़। भोजन छोड़ने, यात्रा, चलते-फिरते खाने या घंटों वातानुकूलित कमरे में बैठने पर यह बढ़ता है। गरम और हल्के मसाले वाले भोजन तथा अजवाइन या हींग के पानी से इसमें जल्दी अंतर महसूस होने की बात कही जाती है।
पित्त प्रकार
खट्टी डकार, भरे पेट के साथ सीने की जलन, तला-मसालेदार खाने के बाद बढ़ना और ज़्यादा प्यास। कब्ज़ की जगह अक्सर एसिडिटी (आयुर्वेद में अम्लपित्त) और पतला मल साथ आता है। यहाँ पित्त को शांत रखते हुए अग्नि को सहारा देना होता है, इसलिए तेज़ अदरक या काली मिर्च की तुलना में जीरे का पानी, सौंफ की चाय, धनिया-पुदीना और ठंडा गुलाब जल बेहतर माने जाते हैं।
कफ प्रकार
घंटों तक "पेट भरा हुआ" लगना, शरीर में भारीपन, जीभ पर सफ़ेद परत और खाने की इच्छा कम होना। दूध-दही, गेहूँ, मिठाई और दिन में सोने के बाद यह बढ़ता है। इसमें पाचन जगाने वाले गरम मसाले — अदरक, काली मिर्च, पिप्पली, दालचीनी — भोजन के बीच लंबा अंतराल और दिन में न सोना सुझाया जाता है।
मिश्रित या आम प्रकार
जीभ पर मोटी परत, मुँह से गंध, सुबह उठते ही भारीपन और लगभग रोज़ पेट फूलना — इसे आम के गहरे जम जाने का संकेत माना जाता है। यहाँ कुछ दिनों का हल्का आहार और रात में त्रिफला का नियमित उपयोग उपयोगी बताया जाता है।
गैस और पेट फूलने के 10 आयुर्वेदिक घरेलू उपाय
ये उपाय रसोई के हैं और आयुर्वेद में दो हज़ार साल से इसी काम के लिए बताए जाते रहे हैं। अपने प्रकार से मिलते दो या तीन चुनें — दसों उपाय एक साथ आज़माने की ज़रूरत नहीं।

1. अजवाइन का पानी — वात प्रकार के लिए
अजवाइन में थाइमॉल नामक सुगंधित तत्व होता है, और परंपरा में इसे पेट की वायु सहज रूप से निकलने में सहारा देने वाला माना जाता है। एक चम्मच अजवाइन एक गिलास पानी में तीन-चार मिनट उबालें, चुटकी भर काला नमक डालें, छानकर भारी भोजन के बाद गुनगुना पिएँ। स्वस्थ बड़ों के लिए यह रोज़ लेने योग्य माना जाता है, पर तेज़ गर्मी में एक दिन छोड़कर लें या इसकी जगह जीरे का पानी रखें। गर्भावस्था, स्तनपान के शुरुआती महीनों या तेज़ एसिडिटी में डॉक्टर की सलाह के बिना न लें।
2. हींग का पानी
चरक संहिता, चिकित्सा स्थान, अध्याय 15 में हींग को आनाह यानी नीचे की ओर रुकी हुई वायु के लिए प्रमुख द्रव्य के रूप में गिना गया है। आधा कप गुनगुने पानी में चौथाई चम्मच शुद्ध (गुलाबी) हींग घोलें, चुटकी भर सेंधा नमक मिलाएँ और धीरे-धीरे पिएँ। बचाव के लिए दाल, राजमा या चने बनाने से पहले घी में चुटकी भर हींग भून लें — इसी परंपरा से लगभग हर दाल में हींग का छौंक पहले से शामिल है।
3. अदरक, नींबू और सेंधा नमक — भोजन से पहले
चरक संहिता में बताया गया यह तरीका सरल है: अदरक की एक पतली कतरन, नींबू की कुछ बूँदें और चुटकी भर सेंधा नमक, भोजन से पाँच मिनट पहले चबा लें। माना जाता है कि इससे मुँह में लार बनती है और पाचन की तैयारी शुरू हो जाती है, जिससे भोजन देर तक रुका नहीं रहता। कफ प्रकार और उन लोगों के लिए यह ख़ास उपयोगी माना जाता है जिन्हें भूख कम लगती है, पर भारीपन बना रहता है।
4. जीरे का पानी — पित्त प्रकार के लिए सौम्य विकल्प
यह शरीर में गर्मी नहीं बढ़ाता, इसलिए पेट फूलने के साथ जलन, एसिडिटी या खट्टी डकार हो तो इसे सही चुनाव माना जाता है। एक चम्मच जीरा रातभर एक गिलास पानी में भिगोएँ और सुबह छानकर घूँट-घूँट पिएँ; या सूखा भूनकर दो मिनट उबालें और गुनगुना पिएँ। स्वाद हल्का रहता है, इसलिए बच्चे भी इसे पी लेते हैं।
5. सौंफ की चाय — भोजन के बाद की पुरानी आदत
सौंफ में एनेथोल नामक तत्व होता है, और परंपरा में इसे अपान वात को धीरे-धीरे नीचे की ओर सरकाने वाला माना जाता है। भोजन के बाद एक चम्मच सौंफ चबाएँ, या एक कप पानी में एक चम्मच सौंफ पाँच मिनट उबालकर छानकर गुनगुनी पिएँ। इसमें दो-तीन इलायची या कुछ पुदीना पत्ते मिलाने की परंपरा भी है।
6. रात में त्रिफला
पेट रोज़ फूलता हो तो तुरंत राहत के साथ आम को कम करने और बड़ी आँत को फिर से संतुलित करने की ज़रूरत मानी जाती है, और इसके लिए त्रिफला का उपयोग किया जाता है। मात्रा और तरीका आगे अलग हिस्से में है।
7. पुदीना और काला नमक का पानी — तेज़ ऐंठन के लिए
वायु ऊपर अटक जाए और सीने या ऊपरी पेट में ऐंठन हो, तो इसे जल्दी आराम देने वाला उपाय माना जाता है। मुट्ठी भर ताज़े पुदीना पत्ते मसलकर आधा कप गुनगुने पानी में डालें, चुटकी भर काला नमक और नींबू की कुछ बूँदें मिलाएँ।
8. गुनगुना पानी पीने की आदत
दिनभर गुनगुना पानी घूँट-घूँट पिएँ, न बहुत गरम और न ठंडा, ख़ासकर भोजन के आसपास। ठंडा पानी अग्नि को मंद करने वाला माना जाता है, और बर्फ़ वाले पेय शहरी जीवन में पेट फूलने की बड़ी वजहों में गिने जाते हैं। शास्त्रों में गुनगुने पानी यानी उष्ण जल के कई गुण बताए गए हैं, जिनमें एक वातानुलोमन भी है — वायु को सहज रूप से नीचे की ओर बढ़ने में सहारा।
छोटी आदत: मेज़ पर गुनगुने पानी का थर्मस रखें और हर बीस-तीस मिनट में एक घूँट लें। कुछ लोगों को सिर्फ़ इस एक बदलाव से दिनभर के भारीपन में फ़र्क़ महसूस हो सकता है।
9. भोजन के बाद वज्रासन
वज्रासन, यानी एड़ियों पर घुटने मोड़कर बैठना, परंपरा में भोजन के तुरंत बाद किया जाने वाला आसन है। दोपहर और रात के भोजन के बाद पाँच से दस मिनट इसमें बैठने से आँतों पर हल्का दबाव पड़ता है और वायु नीचे की ओर सरकने में सहारा मिलता है।
10. पेट की हल्की मालिश (उदर मर्दन)
एक बड़ा चम्मच तिल का तेल गुनगुना करें, फिर पीठ के बल लेट जाएँ; गर्मियों में नारियल तेल भी इस्तेमाल किया जा सकता है। हथेलियों को सपाट रखकर नाभि के चारों ओर घड़ी की दिशा में गोल घुमाएँ — दाईं ओर से ऊपर, ऊपर से बाईं ओर, और बाईं ओर से नीचे। यही बड़ी आँत की दिशा मानी जाती है। दिन में दो बार पाँच मिनट की यह मालिश परंपरा में वायु को नीचे की ओर सहज करने वाली, यानी अनुलोमन की, पुरानी विधियों में गिनी जाती है।
खान-पान में क्या बदलें: विरुद्ध आहार की सूची
उपाय तब तक पूरा काम नहीं करते जब तक वजह रोज़ दोहराई जाती रहे। आयुर्वेद में इसके लिए एक साफ़ शब्द है — विरुद्ध आहार, यानी वे मेल जो अलग-अलग ठीक हैं, पर साथ खाने पर आम बनाते हैं। इन्हें समय के साथ गैस, पेट फूलना और त्वचा की शिकायतों से जोड़ा जाता है।

बचने योग्य आठ मुख्य मेल:
- दूध और फल — ख़ासकर केला, खट्टे फल और खरबूज। परंपरा में इसे आम बनाने वाले प्रमुख मेलों में गिना गया है; केले का मिल्कशेक और फलों वाला दही इसी में आते हैं।
- दूध और नमक — दूध या मसाला चाय के साथ नमकीन। माना जाता है कि इससे पेट के भीतर दूध फट सकता है।
- दूध के साथ हरी पत्तेदार सब्ज़ी, मूली, मछली या मांस — इन मेलों को परंपरा में भारी और पेट फूलने वाला माना जाता है।
- फल और पका हुआ भोजन साथ — फल अकेले, खाली पेट और भोजन से तीस मिनट पहले खाने की सलाह दी जाती है, बाद में मिठाई की तरह नहीं।
- 40 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा गरम किया शहद — शास्त्रों में इसे लंबे समय तक आम बनाने वाला कहा गया है; गरम चाय में शहद न मिलाएँ।
- रात में दही — दही भारी और ठंडा होता है, और सूर्यास्त के बाद इसे कफ बढ़ाने वाला माना जाता है।
- घी और शहद बराबर मात्रा में — शास्त्रों में बराबर अनुपात असंगत बताया गया है; मात्रा असमान रखी जाती है।
- कच्चा सलाद और पका भोजन एक साथ — बरसात में खाली पेट यह और कठिन माना जाता है; दोनों में से एक चुनें।
ये चीज़ें अग्नि को ठंडा करने वाली मानी जाती हैं और पाचन संभलने तक कम रखी जाती हैं — आइसक्रीम, ठंडे पेय और मिल्कशेक, सर्दियों में कच्चा खीरा, शाम को ज़्यादा पनीर, और मैदे से बनी चीज़ें तथा ब्रेड।
ध्यान रखें: एक ही दिन में सब कुछ छोड़ देना — "कल से दूध बंद, गेहूँ बंद, चीनी बंद" — आम तौर पर हफ़्ते भर में टूट जाता है। आयुर्वेद धीरे-धीरे बदलने को बेहतर मानता है: हफ़्ते में एक चीज़ बदलें, जो पसंद है उसे रखें, और पहले खाने का क्रम और समय ठीक करें।
पुराने पेट फूलने के लिए पारंपरिक जड़ी-बूटियाँ
रसोई के उपाय उसी दिन राहत के लिए हैं। पेट फूलना पुराना हो चुका हो तो नीचे दी गई पाँच जड़ी-बूटियों को हफ़्तों और महीनों में अग्नि को फिर से संतुलित करने से जोड़ा जाता है। ये लगभग हर पारंपरिक पाचक योग में मिलती हैं, जिनमें हिंग्वाष्टक चूर्ण और पाचक क्वाथ भी शामिल हैं।
पिप्पली (छोटी पीपल) — अग्नि जगाने वाली जड़ी-बूटियों में इसे पहली पसंद माना जाता है, क्योंकि यह पित्त को बहुत बढ़ाए बिना काम करती है। परंपरा में इसे रसायन, यानी शक्ति और ओज बनाए रखने वाला द्रव्य भी कहा गया है।
चित्रक — पारंपरिक ग्रंथों में इसे दीपन-पाचन, यानी भूख जगाने और भोजन पचाने वाले द्रव्यों में गिना जाता है। उपयोग कफ और आम प्रधान प्रकार में होता है, जहाँ जीभ पर मोटी परत हो और पाचन सुस्त रहे। उष्ण स्वभाव के कारण इसे वैद्य की देख-रेख में लिया जाता है।
जीरक (जीरा) — ऊपर बताया गया यही द्रव्य लंबे समय तक अग्नि को स्थिर रखने के लिए भी इस्तेमाल होता है, ख़ासकर पित्त प्रधान लोगों में जिन्हें तेज़ गरम द्रव्य सहन नहीं होते।
धान्यक (धनिया) — शीतल, सुगंधित और तीनों दोषों के लिए अनुकूल माना जाता है। पेट फूलने के साथ हल्की जलन भी हो, तो धनिये के बीज का पानी परंपरा में पहली पसंद माना जाता है।
त्रिफला — इस सूची में यही एक योग है, और इसे तीनों दोषों के संतुलन तथा बड़ी आँत को सौम्य रूप से व्यवस्थित करने से जोड़ा जाता है।
इन द्रव्यों को एक साथ लेने का आसान तरीका
घर पर इतने मसालों का संतुलित मिश्रण बनाना संभव है, पर समय लेता है। Rog Nashak Chai में नौ पाचक द्रव्य — अजवाइन, सौंफ, जीरा, इलायची, अदरक, तुलसी, काली मिर्च, लौंग और सेंधा नमक — पारंपरिक अनुपात में पहले से मिले होते हैं। दोपहर के भोजन के बाद एक गुनगुना कप इसे दिनचर्या में जोड़ने का सरल तरीका है।

पाचन-अग्नि के लिए दिनचर्या में क्या बदलें
जड़ी-बूटियाँ और चाय कुछ घंटों में हल्कापन देती हैं। पेट फूलना बार-बार न लौटे, इसके लिए दिनचर्या में बदलाव ज़रूरी माना जाता है।
सबसे भारी भोजन दोपहर में रखें — आयुर्वेद में अग्नि को सूर्य के साथ चलने वाली माना जाता है। ग्यारह से दो बजे के बीच पाचन सबसे सक्रिय रहता है, और यही समय दिन के सबसे भारी भोजन के लिए सुझाया जाता है। रात का भोजन हल्का और जल्दी रखा जाता है, आदर्श रूप से साढ़े सात बजे तक। रात दस बजे किया गया भारी भोजन आज के शहरी जीवन में पेट फूलने की आम वजहों में गिना जाता है।
बीच-बीच में कुछ न खाएँ — दिन में तीन बार सादा और संतुलित भोजन, बीच में कुछ नहीं। यह अंतराल अग्नि को पिछला भोजन पूरा पचाने का समय देता है; लगातार कुछ खाते रहने से अधपचा भोजन आँतों में बना रहता है।
बैठकर खाएँ, साथ में दूसरा काम न करें — चलते, गाड़ी चलाते या काम करते हुए खाने से हवा ज़्यादा निगली जाती है और पाचन की तैयारी अधूरी रह जाती है। भोजन के लिए बैठें, फ़ोन दूर रखें और कम से कम पंद्रह मिनट दें।
समय की एक लय बनाएँ — अग्नि को लय से चलने वाली प्रक्रिया माना जाता है। उठने, खाने और सोने का समय लगभग तय हो तो पाचन का चक्र व्यवस्थित रहता है, और अनियमित समय इसे उलझा देता है।
तनाव को भी संभालें, सिर्फ़ भोजन को नहीं — मन और पाचन का संबंध परस्पर माना जाता है, इसलिए तनाव में आँतों की गति धीमी पड़ सकती है। रोज़ सुबह दस मिनट अनुलोम-विलोम या भ्रामरी इसीलिए पाचन की दिनचर्या का हिस्सा माने जाते हैं।
रोज़ पेट फूलता हो तो त्रिफला लेने का पारंपरिक तरीका
पेट फूलना छह महीने से ज़्यादा पुराना हो तो एक योग अलग से देखना ठीक रहता है — त्रिफला। तीन भारतीय फलों, हरीतकी, बिभीतकी और आमलकी (आँवला), के इस मेल को पारंपरिक योगों में व्यापक रूप से अध्ययन किए गए योगों में गिना जाता है।
इससे तीन बातें जोड़ी जाती हैं: इसे मल-गति को सौम्य रूप से नीचे की ओर सहारा देने वाला माना जाता है, आँवले को आँतों के अनुकूल वातावरण यानी माइक्रोबायोम के लिए सहायक कहा जाता है, और हरीतकी को आँत की भीतरी परत के लिए सौम्य माना गया है। आदत पड़ने वाली चीज़ के रूप में इसे नहीं देखा जाता, और परंपरा में इसका उपयोग लंबे समय तक रोज़ किया जाता रहा है।
सबसे सरल तरीका इस तरह बताया जाता है:
- आधा चम्मच त्रिफला चूर्ण आधा कप गुनगुने पानी में — टैबलेट की जगह चूर्ण।
- रात के भोजन के दो घंटे बाद, सोने से पहले।
- पहले दो हफ़्ते सप्ताह में पाँच रातें, उसके बाद रोज़।
- कुछ लोगों को इन हफ़्तों में मल-नियमितता, सुबह के हल्केपन या जीभ पर जमी परत में बदलाव महसूस हो सकता है।
गर्भावस्था में त्रिफला छोड़ने की सलाह दी जाती है, जब तक डॉक्टर इसकी अनुमति न दें। तेज़ माहवारी के दिनों में हरीतकी कुछ लोगों में रक्त-स्राव बढ़ा सकती है, इसलिए उन दिनों इसे रोक देना ठीक माना जाता है।

डॉक्टर या वैद्य को कब दिखाना ज़रूरी है
ये उपाय रोज़मर्रा के सामान्य पेट फूलने के लिए हैं और जाँच या चिकित्सकीय सलाह की जगह नहीं लेते। इनमें से कोई भी बात हो तो पहले डॉक्टर को दिखाएँ:
- पेट फूलने के साथ बिना कोशिश वज़न घटना।
- मल में खून, या काला और लसदार मल।
- तेज़ बुख़ार के साथ पेट फूलना।
- ऐसा तेज़ दर्द जिसमें सीधा बैठना मुश्किल हो जाए, ख़ासकर एक तरफ़ का दर्द।
- खान-पान और दिनचर्या सुधारने के बाद भी तीन हफ़्ते से ज़्यादा बना रहने वाला पेट फूलना।
- लगातार बनी रहने वाली उलटी।
- चालीस से ऊपर की महिला में नया और लगातार बना रहने वाला पेट फूलना, जिसमें स्त्री-रोग संबंधी कारणों की जाँच ज़रूरी है।
ज़रूरी बात: इस लेख के उपाय सामान्य स्वस्थ व्यक्तियों के लिए हैं। अगर आप गर्भवती हैं, स्तनपान करा रही हैं, खून पतला करने वाली दवाएँ ले रही हैं, आँतों की कोई पुरानी समस्या है, या हाल में पेट का ऑपरेशन हुआ है, तो त्रिफला और हींग सहित कोई भी आयुर्वेदिक द्रव्य शुरू करने से पहले डॉक्टर या वैद्य से बात करें। बच्चों के लिए भी यही सलाह लागू है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पेट फूलने की आयुर्वेदिक दवा या घरेलू उपाय में सबसे तेज़ कौन-सा माना जाता है? +
काले नमक के साथ अजवाइन का पानी सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला उपाय है, ख़ासकर वात प्रकार में जहाँ ऐंठन हो या वायु अटकी हुई महसूस हो। हींग का पानी कुछ तेज़ माना जाता है, पर स्वाद कड़ा होता है। साथ में जलन या एसिडिटी हो तो जीरे का पानी अधिक सौम्य विकल्प है।
रोज़ शाम खाने के बाद गैस बनती है (gas banti hai) — क्या करें? +
सबसे पहले रात के भोजन का समय और भार देखें — आयुर्वेद में सबसे भारी भोजन ग्यारह से दो बजे के बीच और रात का भोजन हल्का तथा साढ़े सात बजे तक सुझाया जाता है। इसके साथ भोजन के बाद पाँच से दस मिनट वज्रासन जोड़ा जा सकता है। यह लगभग रोज़ हो तो रात में त्रिफला लेने का तरीका भी देखा जाता है।
पेट साफ़ न हो तो क्या करें (pet saf na ho to kya kare)? +
आयुर्वेद में इसे कब्ज़ यानी विबंध से जोड़ा जाता है, और आम तौर पर बढ़े हुए वात तथा मंद अग्नि के साथ देखा जाता है। परंपरा में यही तरीका बताया जाता है — रात के भोजन के दो घंटे बाद आधा चम्मच त्रिफला चूर्ण आधा कप गुनगुने पानी में, शुरुआत में सप्ताह में पाँच रातें। साथ में समय पर भोजन और नाभि के चारों ओर हल्की मालिश रखी जाती है। तीन हफ़्ते से ज़्यादा यही स्थिति रहे तो डॉक्टर से मिलें।
गैस है (gas hai) पर पेट नहीं फूलता — क्या यह भी कमज़ोर अग्नि का संकेत है? +
भारी भोजन के बाद कभी-कभी होने वाली गैस को आयुर्वेद में मंद अग्नि से जोड़ा जाता है, और ऊपर बताए उपायों से यह संभल सकती है। लेकिन सादा खान-पान के बाद भी तीन हफ़्ते से ज़्यादा रोज़ यही शिकायत रहे, या साथ में वज़न घटना और मल में खून जैसी बात हो, तो जाँच के लिए डॉक्टर को दिखाना ज़रूरी है।
बच्चों को ये उपाय दिए जा सकते हैं? +
सौंफ की चाय और जीरे का पानी पाँच साल से बड़े बच्चों को कम मात्रा में, यानी आधा कप तक, परंपरा में दिया जाता रहा है। अजवाइन का पानी और त्रिफला बच्चों को योग्य वैद्य या डॉक्टर की सलाह से ही दें। छोटे शिशुओं के लिए परंपरा में केवल गुनगुने घी से पेट पर हल्की मालिश बताई जाती है, मुँह से कोई जड़ी-बूटी नहीं।
क्या तनाव से भी पेट फूलता है? +
आयुर्वेद के हिसाब से हाँ। तनाव वात को बढ़ाता है, और बड़ी आँत को वात का मुख्य स्थान माना जाता है, इसलिए परीक्षा, इंटरव्यू, यात्रा या मन की उलझन के दिनों में यह शिकायत बढ़ती है। ऐसे समय अनुलोम-विलोम, रोज़ का अभ्यंग यानी तेल मालिश, और पुराने मामलों में शिरोधारा सुझाए जाते हैं।