सारांश: चरक संहिता के सूत्रस्थान 8.18 में ईर्ष्या पर केवल दो शब्दों की एक पंक्ति है: हेतावीर्ष्युः, फले नेर्ष्युः। आज की भाषा में, ईर्ष्या करनी ही हो तो किसी की मेहनत से करें, उसके नतीजे से नहीं। इस लेख में इस पंक्ति का अर्थ, उससे मेल खाते आज के शोध और एक हफ़्ते का सरल अभ्यास दिया गया है।
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Read this article in English: Envy in Charaka Samhita (Sutrasthana 8.18): Hetav Irshyuh, Phale Nershyuh, Envy the Effort, Not the Result
- चरक संहिता में ईर्ष्या की बात क्यों: सदवृत्त और मन
- सूत्रस्थान 8.18: हेतावीर्ष्युः, फले नेर्ष्युः का अर्थ
- फले नेर्ष्युः: दूसरों के नतीजे पर क्यों न जलें
- सोशल मीडिया पर तुलना को वहीं रोकना
- हेतावीर्ष्युः: ईर्ष्या हो, तो मेहनत से
- आपने यह कैसे किया? ईर्ष्या को सीख में बदलना
- इस हफ़्ते ईर्ष्या को मेहनत में बदलने के 7 दिन
- यह पंक्ति क्या नहीं कहती
- अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

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चरक संहिता के सूत्रस्थान का आठवाँ अध्याय इन्द्रियोपक्रमणीय अध्याय कहलाता है। इसका विषय है इन्द्रियों (ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ) की देखभाल, और उस मन की भी जो इन्हें चलाता है। पूरे अध्याय का परिचय आप हमारे लेख चरक संहिता भाग 8 में पढ़ सकते हैं।
इसी अध्याय के तीन हिस्सों पर हमारे अलग लेख भी हैं: बोलने के नियम, भरोसे के नियम और काम के नियम। यह लेख श्लोक 8.18 की लंबी सूची में से केवल एक छोटी पंक्ति की बात करता है।
सदवृत्त (अच्छे आचरण की संहिता) की शुरुआत में चरक बताते हैं कि ऐसे नियम चिकित्सा ग्रंथ में क्यों हैं। श्लोक 8.17 कहता है कि जो भी अपना भला चाहता है, उसे सदवृत्त का पालन पूरा, हमेशा और मन लगाकर करना चाहिए। श्लोक 8.18 के अनुसार इसके पालन से दो बातें एक साथ जुड़ी हैं: आरोग्य (अच्छा स्वास्थ्य) और इन्द्रिय-विजय (इन्द्रियों पर नियंत्रण)। इसके बाद श्लोक सज्जन व्यक्ति के व्यवहार, स्वच्छता और मन की संभाल की एक लंबी सूची बन जाता है।
ईर्ष्या मन की बहुत पुरानी आदत है, पर आज हमारा इससे सामना पहले से कहीं ज़्यादा बार होता है। फ़ोन हर कुछ सेकंड में किसी और की नई कार, नया घर, शादी, छुट्टियाँ या प्रमोशन सामने ले आता है। चरक ने यह दृश्य नहीं सोचा होगा, फिर भी इस विषय पर उनके दो शब्द आज की स्थिति पर काफ़ी हद तक लागू होते हैं।
सूत्रस्थान 8.18: हेतावीर्ष्युः, फले नेर्ष्युः का अर्थ
यह पंक्ति छोटे-छोटे शब्दों की एक कड़ी के बीच आती है, जो अपने ऊपर नियंत्रण रखने वाले व्यक्ति का वर्णन करते हैं। नीचे श्लोक 8.18 का वही हिस्सा है, जैसा चरक संहिता रिसर्च, ट्रेनिंग एंड स्किल डेवलपमेंट सेंटर के 2020 संस्करण में छपा है।
चरक संहिता, सूत्रस्थान 8.18 (अंश)
… वश्यात्मा, धर्मात्मा, हेतावीर्ष्युः, फले नेर्ष्युः, निश्चिन्तः, निर्भीकः …
नीचे दिए अर्थ हमारी सरल व्याख्या हैं, जिन्हें 2020 संस्करण के अंग्रेज़ी अनुवाद से मिलाकर देखा गया है।
- वश्यात्मा — जिसका मन उसके अपने वश में हो।
- धर्मात्मा — जिसका स्वभाव धर्म के अनुसार, यानी नेक हो।
- हेतावीर्ष्युः — कारण के प्रति ईर्ष्या या उत्साह रखने वाला।
- फले नेर्ष्युः — फल, यानी नतीजे के प्रति ईर्ष्या न रखने वाला।
- निश्चिन्तः — चिंता से मुक्त।
- निर्भीकः — भय से रहित।
हेतु का अर्थ है कारण, यानी वह चीज़ जिससे कुछ घटित होता है। फल का अर्थ है पेड़ का फल, और उसी से कोई भी नतीजा। मुख्य शब्द ईर्ष्यु है, जिसके संस्कृत शब्दकोशों में दो अर्थ मिलते हैं: ईर्ष्या करने वाला, और उत्साही या उत्सुक।
अधिकरण कारक (सप्तमी) वाले शब्द के साथ इसका अर्थ होता है उस चीज़ के प्रति ईर्ष्या। इसलिए हेतावीर्ष्युः का अर्थ है कारण के प्रति ईर्ष्या, और फले नेर्ष्युः का अर्थ है फल के प्रति ईर्ष्या नहीं।
2020 संस्करण इसे अंग्रेज़ी में नरमी से रखता है: कारण के प्रति उत्साही रहें, पर परिणाम को लेकर व्याकुल न हों। हम इसे आज की भाषा में ऐसे पढ़ते हैं: ईर्ष्या करनी ही हो, तो मेहनत से करें, नतीजे से नहीं। यह वाक्य चरक का उद्धरण नहीं है, यह इस पंक्ति की हमारी समझ है।
आसपास के शब्द भी इस पंक्ति से मेल खाते हैं। पहले वश्यात्मा और धर्मात्मा आते हैं, बाद में निश्चिन्त और निर्भीक, मानो अपने वश में रहने वाला व्यक्ति अपनी शांति दूसरों के नतीजों के हाथ में नहीं देता और उसका ध्यान कारणों पर रहता है। चरक यह नहीं बताते कि शब्द इसी क्रम में क्यों हैं, इसलिए इस पढ़त को बहुत आगे तक खींचना उचित नहीं। फिर भी, जो मन दिन भर दूसरों के नतीजे देखता रहे, वह शायद ही चिंता से मुक्त रह पाता है।
भगवद्गीता से मिलती-जुलती बात: भगवद्गीता (2.47) भी कर्म और उसके फल को साथ रखती है, अपने प्रसिद्ध श्लोक में फल पर अधिकार जताए बिना काम करने की बात कहकर। चरक की पंक्ति का दायरा छोटा है: वह केवल यह बताती है कि ईर्ष्या को किस ओर मोड़ें।
फले नेर्ष्युः: दूसरों के नतीजे पर क्यों न जलें
सदवृत्त के बाक़ी नियमों की तरह चरक यहाँ भी नियम कहकर आगे बढ़ जाते हैं, कारण नहीं बताते। आगे दिए गए कारण आज के शोध से हैं, और उनका श्रेय उन शोधकर्ताओं को है जिन्होंने ये अध्ययन किए, चरक को नहीं।

नतीजा किसी की ज़िंदगी का वह हिस्सा है जो हमें दिखता है: सैलरी, कार, घर, छुट्टियों की तस्वीरें। उसके पीछे की मेहनत ज़्यादातर दिखाई नहीं देती। नतीजों की तुलना आसान है, लगभग अपने-आप हो जाती है, और चरक की पंक्ति साफ़ कहती है कि इन पर न जलें।
काम की जगह पर नतीजों की तुलना का असर एक जाने-माने अध्ययन में दिखता है। 2012 में अर्थशास्त्री डेविड कार्ड, एलेक्ज़ांद्रे मास, एनरिको मोरेटी और इमैनुएल साएज़ का यह अध्ययन ‘अमेरिकन इकोनॉमिक रिव्यू’ में छपा। उस समय एक नई वेबसाइट पर यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया के कर्मचारियों का वेतन दिखने लगा था। शोधकर्ताओं ने बिना किसी क्रम के चुने गए कुछ कर्मचारियों को इस साइट के बारे में बताया, और साइट देखने वालों में से ज़्यादातर ने अपने ही विभाग के साथियों का वेतन देखा।
इसके बाद सभी से उनकी नौकरी के बारे में पूछा गया, और असर केवल एक दिशा में दिखा। जिनका वेतन अपनी यूनिट और अपने तरह के काम में बीच के स्तर से कम निकला, उन्होंने वेतन और नौकरी, दोनों से कम संतोष बताया, और उनमें नई नौकरी खोजने वालों की संख्या साफ़ तौर पर ज़्यादा थी। जिनका वेतन बीच के स्तर से ऊपर था, उनका संतोष ज़रा भी नहीं बढ़ा। लेखकों का निष्कर्ष था कि नौकरी का संतोष कुछ हद तक इस पर भी निर्भर करता है कि आपका वेतन दूसरों की तुलना में कैसा है।
सोशल मीडिया पर तुलना को वहीं रोकना

दूसरा अध्ययन उस आदत की ओर इशारा करता है जो आज हम में से ज़्यादातर लोगों की है। 2015 में मनोवैज्ञानिक फ़िलिप वर्डुइन और उनके साथियों ने ‘जर्नल ऑफ़ एक्सपेरिमेंटल साइकोलॉजी: जनरल’ में बताया कि फ़ेसबुक का निष्क्रिय इस्तेमाल, यानी बिना हिस्सा लिए दूसरों की पोस्ट स्क्रॉल करते रहना, समय के साथ लोगों की मनोदशा को नीचे ले गया। यह असर प्रयोगशाला के एक प्रयोग में दिखा, और फिर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी, जब लोगों से दिन में कई बार उनका हाल पूछा गया। स्क्रॉलिंग और उदास मन को जोड़ने वाली कड़ी ईर्ष्या थी।
दोनों अध्ययनों को साथ रखें, तो चरक की पंक्ति के पीछे एक व्यावहारिक वजह दिखती है। बाहर से देखा गया किसी का नतीजा शायद ही हमें बेहतर स्थिति में छोड़ता है: वह हमसे बड़ा हो तो चुभता है, और छोटा हो तो कुछ नहीं जोड़ता। किसी के नतीजे पर जलने से कोई लाभ नहीं दिखता।
यह आज़माएँ: स्क्रॉल करते हुए जब किसी की सैलरी, कार या तस्वीरें चुभने लगें, तो वहीं रुक जाएँ। फ़ोन एक मिनट के लिए उल्टा करके रख दें। मक़सद फ़ोन छोड़ना नहीं है, बल्कि तुलना को उसी पल रोकना है जब वह शुरू होती है।
हेतावीर्ष्युः: ईर्ष्या हो, तो मेहनत से

चरक ऐसे मन की माँग नहीं करते जिसमें ईर्ष्या हो ही नहीं। वे ईर्ष्या को दिशा देते हैं। कारण के प्रति ईर्ष्यु रहें, यानी उत्सुक और चाहें तो ईर्ष्यालु भी: उस काम, आदत या कौशल के प्रति, जिससे वह नतीजा आया जिसे आप सराहते हैं।
मनोवैज्ञानिकों ने इससे मिलती-जुलती बात परखी है। 2011 में नील्स वान डे वेन, मार्सेल ज़ेलेनबर्ग और रिक पीटर्स का अध्ययन ‘पर्सनैलिटी एंड सोशल साइकोलॉजी बुलेटिन’ में छपा, जिसका विषय था कि ईर्ष्या प्रशंसा से आगे क्यों निकल जाती है। उन्होंने ईर्ष्या के दो रूप अलग किए: द्वेषपूर्ण ईर्ष्या, जो दूसरे को नीचे खींचना चाहती है, और सौम्य ईर्ष्या, जो ख़ुद को उसके स्तर तक ऊपर ले जाना चाहती है। इन दोनों की तुलना प्रशंसा से की गई, यानी किसी को आदर से देखने की सहज भावना से।
चार अध्ययनों में केवल सौम्य ईर्ष्या ने लोगों को ख़ुद को बेहतर बनाने की ओर बढ़ाया। पहले अध्ययन में सौम्य ईर्ष्या महसूस करने वालों ने कहा कि वे पढ़ाई में ज़्यादा समय लगाना चाहते हैं। दूसरे और तीसरे अध्ययन में जिन लोगों में सौम्य ईर्ष्या जगाई गई, उन्होंने बाद में रचनात्मक सोच की एक शब्द-पहेली परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन किया। प्रशंसा और द्वेषपूर्ण ईर्ष्या का ऐसा असर नहीं दिखा।
आपने यह कैसे किया? ईर्ष्या को सीख में बदलना

चौथे अध्ययन में एक अहम शर्त जुड़ी। मेहनत की यह प्रेरणा तभी दिखी, जब लोगों को लगा कि दूसरे व्यक्ति के स्तर तक पहुँचना उनके लिए संभव है। जब वह स्तर पहुँच से बाहर लगा, तो उन्होंने प्रशंसा महसूस की, पर कोई अतिरिक्त प्रेरणा नहीं।
आज के शब्दों में यही हेतावीर्ष्युः है। जो ईर्ष्या इस ओर मुड़ी हो कि किसी ने क्या किया, और साथ में यह भाव हो कि आप भी ऐसा कर सकते हैं, वह मेहनत में बदल जाती है। जो ईर्ष्या इस ओर मुड़ी हो कि किसी के पास क्या है, वह केवल जलन बनकर रह जाती है।
इसलिए किसी के नतीजे से होने वाली ईर्ष्या को एक सवाल में बदलना उपयोगी हो सकता है: आपने यह कैसे किया? यह सवाल अपने-आप में एक तारीफ़ है, और अक्सर लोग इसका जवाब ख़ुशी से देते हैं।
यह आज़माएँ: जिनसे आपको ईर्ष्या होती है, उनसे यही सवाल पूछिए। फिर उनके तरीक़ों में से एक छोटा कदम चुनें और इसी हफ़्ते शुरू करें, क्योंकि जो कदम सच में उठाया जा सके, वही इस भावना को काम की दिशा देता है।
इस हफ़्ते ईर्ष्या को मेहनत में बदलने के 7 दिन

चरक सदवृत्त का पालन हमेशा करने को कहते हैं (8.17)। एक हफ़्ता केवल शुरुआत है, पर इतने में वह आदत दिखने लगती है जिसकी ओर यह पंक्ति इशारा करती है। इसके लिए एक छोटी नोटबुक रखें, या फ़ोन में एक नोट बना लें।
दिन 1 और 2 — जलन को पहचानें: जब भी ईर्ष्या हो, एक पंक्ति लिखें: किससे, और किस बात पर। ज़्यादातर बातें नतीजे होंगी, जैसे सैलरी, कार, घर, शरीर या छुट्टियाँ।
दिन 3 और 4 — कारण खोजें: हर बात के आगे लिखें कि उस व्यक्ति ने वहाँ तक पहुँचने के लिए शायद क्या किया होगा: सालों का अभ्यास, सुबह जल्दी उठना, कोई जोखिम या कोई कौशल। आपको सब कुछ पता नहीं होगा। अंदाज़ा लगाना ही इस अभ्यास का मक़सद है।
दिन 5 — नतीजे पर रुकें: स्क्रॉल करते हुए जब जलन शुरू हो, फ़ोन एक मिनट के लिए उल्टा रख दें। आज हर बार ऐसा करें।
दिन 6 — पूछें: अपनी सूची से कोई ऐसा व्यक्ति चुनें जिससे आप सच में बात कर सकते हैं। उनसे पूछें कि उन्होंने यह कैसे किया, और जवाब में किस्मत नहीं, कदम सुनें।
दिन 7 — एक कदम उठाएँ: उन कदमों में से सबसे छोटा चुनें जो आप भी कर सकते हैं, और आज उसे एक बार करें। लिख लें कि अगली बार यह कब करेंगे।
याद रखने के लिए: किसी का नतीजा आपके हाथ में नहीं है, पर उसके पीछे की मेहनत से आप सीख सकते हैं। इसलिए ध्यान मेहनत पर रखें।
यह पंक्ति क्या नहीं कहती
यह कुछ भी महसूस न करने की माँग नहीं है। ईर्ष्या एक साधारण मानवीय भावना है, और चरक की पंक्ति बस यह बताती है कि उसे किस ओर मोड़ें।
यह कोई निदान भी नहीं है। अगर ईर्ष्या के साथ लगातार बेचैनी, नींद न आना, ऐसा ग़ुस्सा जो आसपास के लोगों को चोट पहुँचाए, या ऐसे विचार हों जिन्हें आप मन से हटा नहीं पा रहे, तो इसके लिए किसी श्लोक के बजाय डॉक्टर या काउंसलर से बात करना बेहतर है।
किसी लंबे समय से चल रही शारीरिक या मानसिक परेशानी, गर्भावस्था, बच्चों से जुड़े सवाल या चल रही दवाओं की स्थिति में अपने डॉक्टर या वैद्य से सलाह ज़रूर लें।
यह शोध चरक की बात का प्रमाण भी नहीं है। वेतन वाला अध्ययन अमेरिका के एक राज्य के यूनिवर्सिटी कर्मचारियों पर था, स्क्रॉलिंग वाला फ़ेसबुक इस्तेमाल करने वालों पर, और ईर्ष्या वाले प्रयोग ज़्यादातर विश्वविद्यालय के छात्रों पर। हर अध्ययन अपने सवाल के लिए बना था, लगभग दो हज़ार साल पहले लिखे किसी ग्रंथ को परखने के लिए नहीं। ये अध्ययन इतना ही दिखाते हैं कि स्वास्थ्य और इन्द्रियों पर नियंत्रण के लिए लिखी गई एक पंक्ति, तुलना, ईर्ष्या और मेहनत के बारे में आज की जानकारी से मेल खाती है।
हमारी ओर से: इस लेख की किसी भी बात के लिए किसी उत्पाद की ज़रूरत नहीं है, और आप यहीं से सीधे सवाल-जवाब पर जा सकते हैं। हमारा सबसे जाना-पहचाना उत्पाद नहाने का एक सादा साबुन है, दिव्य स्नान मुल्तानी मिट्टी साबुन। यह मुल्तानी मिट्टी पर आधारित, हाथ से बना साबुन है, जो छोटे बैचों में तैयार होता है और 100 ग्राम की चार टिकियों के पैक में आता है। इसका उपयोग साधारण अर्थ में नहाने के लिए है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
चरक संहिता में ईर्ष्या के बारे में क्या कहा गया है? +
चरक संहिता, सूत्रस्थान, अध्याय 8 (इन्द्रियोपक्रमणीय अध्याय) के श्लोक 18 में, सदवृत्त के भीतर, पंक्ति है: हेतावीर्ष्युः, फले नेर्ष्युः। आज की भाषा में, ईर्ष्या करनी ही हो तो किसी की मेहनत से करें, उसके नतीजे से नहीं। संस्कृत पाठ चरक संहिता रिसर्च, ट्रेनिंग एंड स्किल डेवलपमेंट सेंटर के 2020 संस्करण से है।
हेतावीर्ष्युः, फले नेर्ष्युः का मतलब क्या है? +
हेतु का अर्थ है कारण और फल का अर्थ है नतीजा, जबकि ईर्ष्यु का अर्थ ईर्ष्या करने वाला भी है और उत्साही भी। 2020 संस्करण इसका अनुवाद यों करता है: कारण के प्रति उत्साही रहें, पर परिणाम को लेकर व्याकुल न हों।
क्या दूसरों की सफलता से जलन होना गलत है? +
चरक इस भावना को गलत नहीं कहते, बल्कि उसे दिशा देते हैं: किसी की सफलता पर नहीं, उसके पीछे की मेहनत पर। नतीजे से ईर्ष्या का कोई लाभ नहीं दिखता, जबकि मेहनत से ईर्ष्या आपकी अपनी मेहनत बन सकती है।
सैलरी की तुलना करने से लोग नाख़ुश क्यों होते हैं? +
2012 में कार्ड, मास, मोरेटी और साएज़ के अध्ययन में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया के जिन कर्मचारियों का वेतन अपनी यूनिट के बीच के स्तर से कम निकला, वे नौकरी से कम संतुष्ट थे और उनमें नई नौकरी खोजने की संभावना ज़्यादा थी। जिनका वेतन ज़्यादा था, वे ज़्यादा ख़ुश नहीं हुए।
क्या ईर्ष्या कभी काम की भी हो सकती है? +
शोध के अनुसार सौम्य ईर्ष्या, यानी किसी को नीचे खींचने के बजाय उसके स्तर तक पहुँचने की चाह, काम की हो सकती है। वान डे वेन, ज़ेलेनबर्ग और पीटर्स (2011) के अध्ययनों में इसने लोगों को ज़्यादा पढ़ने का संकल्प लेने और बाद की परीक्षा में बेहतर करने की ओर बढ़ाया, पर तभी जब वह स्तर उन्हें अपनी पहुँच में लगा।
सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हुए जलन क्यों होती है? +
वर्डुइन और उनके साथियों (2015) ने पाया कि फ़ेसबुक पर बिना हिस्सा लिए दूसरों की पोस्ट स्क्रॉल करते रहने से समय के साथ मनोदशा नीचे गई, और इसकी कड़ी ईर्ष्या थी। फ़ीड में ज़्यादातर दूसरों के नतीजे होते हैं, और चरक की पंक्ति इन्हीं पर न जलने की बात कहती है।
क्या यह भगवद्गीता के कर्म और फल वाले उपदेश जैसा ही है? +
दोनों में कर्म और उसके फल का विचार साझा है, और भगवद्गीता (2.47) फल पर अधिकार जताए बिना अपना काम करने की बात करती है। सूत्रस्थान 8.18 में चरक की पंक्ति का दायरा छोटा है: वह केवल ईर्ष्या के बारे में है, और उसे नतीजों से हटाकर कारणों की ओर मोड़ने को कहती है।