शस्त्र विधि: अष्टांग हृदय सूत्रस्थान 26 और वाग्भट के 26 शस्त्र

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शस्त्र विधि: अष्टांग हृदय सूत्रस्थान 26 और वाग्भट के 26 शस्त्र

सारांश: अष्टांग हृदय के सूत्रस्थान का 26वाँ अध्याय, शस्त्र विधि, धार वाले 26 शस्त्रों का वर्णन करता है: उनके नाम, धातु, बनावट, 13 कर्म, 8 दोष, पकड़ने का तरीका और उन्हें रखने का कोश। यह लेख अध्याय के पहले भाग को एक शास्त्रीय ग्रंथ के अध्ययन के रूप में प्रस्तुत करता है; इसमें कोई सलाह या प्रक्रिया नहीं है।

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पढ़ने का समय: 21 मिनट

Read this article in English: Shastra Vidhi: Ashtanga Hridaya Sutrasthana 26 and Vagbhata's Twenty-Six Sharp Instruments

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यह अध्याय चीज़ों का वर्णन उनकी सामग्री और रूप के आधार पर करता है; हम इस साबुन का परिचय भी उसी तरह देते हैं: मुल्तानी मिट्टी से बनी नहाने की टिक्की।

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शस्त्र विधि क्या है: अष्टांग हृदय सूत्रस्थान 26 का परिचय

आयुर्वेद की आठ शाखाओं में शल्य वह शाखा है जिसका संबंध ऑपरेशन से जुड़े काम से है, और अष्टांग हृदय में इसके उपकरणों पर लगातार दो अध्याय हैं। सूत्रस्थान का 25वाँ अध्याय, यंत्र विधि, बिना धार वाले उपकरणों पर है, और उस अध्याय पर हमारे लेख में एक सौ एक यंत्रों का वर्णन है। 26वाँ अध्याय, शस्त्र विधि, धार वाले उपकरणों (शस्त्र) पर है।

शुरुआत अष्टांग हृदय (आगे संक्षेप में ‘हृदय’) के हर अध्याय की तरह होती है: अथातः शस्त्रविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः, यानी ‘अब हम शस्त्रों की विधि वाले अध्याय की व्याख्या करेंगे’, इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः, यानी ‘ऐसा आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था’। इसके बाद बिना किसी भूमिका के सीधे एक संख्या आती है।

हमने विद्यानाथ का अंग्रेज़ी अनुवाद (चौखम्बा) पढ़ा है, जिसमें यह अध्याय मुद्रित पृष्ठ 362 से 377 तक है और दो असमान हिस्सों में बँटा है। पहला हिस्सा शस्त्रों पर है और दूसरा रक्तमोक्षण, यानी रक्त निकालने की शास्त्रीय विधि पर, जिसमें जलौका (जोंक), शृंग (सींग), अलाबु (तुंबी) और घटी (घड़ा) आते हैं। दूसरा हिस्सा पहली पंक्ति से ही चिकित्सा-प्रक्रिया से जुड़ा है, इसलिए उसे किसी अलग लेख के लिए छोड़ दिया गया है। पहले हिस्से में किसी ऑपरेशन का नहीं, वस्तुओं का वर्णन है, लगभग उसी तरह जैसे कोई सावधान कारीगर करता, और यह लेख भी इसी दृष्टि तक सीमित रहता है।

अध्याय एक नज़र में

  • ग्रंथ: अष्टांग हृदय, सूत्रस्थान 26, शस्त्र विधि अध्याय, वाग्भट।
  • पाठ की गिनतियाँ: 26 शस्त्र (षड्विंशतिः), 13 कर्म, 8 दोष (अष्टौ दोषाः)।
  • समानांतर पाठ: चरक संहिता, चिकित्सा स्थान 25.55 (छह कर्म); अष्टांग संग्रह, सूत्रस्थान 34 (वही 26 शस्त्र दूसरे क्रम में, और बारह कर्म); सुश्रुत संहिता (बीस शस्त्र और आठ कर्म, संपादक के अनुसार)।

सूत्रस्थान, यानी अष्टांग हृदय का सिद्धांतों वाला खंड, तीस अध्यायों का है, और उसके आख़िरी नौ अध्याय प्रक्रियाओं और उपकरणों पर हैं। ये 22 गण्डूषादि विधि (हमारा लेख) और 23 आश्च्योतन-अंजन विधि (हमारा लेख) से शुरू होकर तर्पण-पुटपाक, यंत्र, शस्त्र, सिराव्यध, शल्याहरण और शस्त्रकर्म विधि से होते हुए 30 क्षार-अग्निकर्म विधि पर पूरे होते हैं। इस लेख के सभी अंदरूनी लिंक अंग्रेज़ी लेखों के हैं।

शस्त्र लक्षण: चार श्लोकों में बनावट और धार

पहले चार श्लोक ‘शस्त्र-लक्षण’ शीर्षक के नीचे हैं, और कारीगर के लिए लिखे विवरण जैसे लगते हैं:

षड्विंशतिः सुकर्मारैर्घटितानि यथाविधि। शस्त्राणि रोमवाहीनि बाहुल्येनाङ्गुलानि षट्॥
सुरूपाणि सुधाराणि सुग्रहाणि च कारयेत्। अकरालानि सुध्मातसुतीक्ष्णावर्तितेऽयसि॥

समाहितमुखाग्राणि नीलाम्भोजच्छवीनि च। नामानुगतरूपाणि सदा सन्निहितानि च॥
स्वोन्मानार्धचतुर्थांशफलान्येकैकशोऽपि च। प्रायो द्वित्राणि युञ्जीत तानि स्थानविशेषतः॥

इनमें लगभग वह सब है जो बनाने वाले को जानना चाहिए:

  • कौन बनाए — सुकर्मार, यानी धातु का अच्छा कारीगर (अनुवाद में ‘कुशल लोहार’), जो यथाविधि, यानी तय तरीके से काम करे।
  • किस धातु से — अयस्, यानी लोहा, जो सुध्मात (भट्ठी की आँच में अच्छी तरह तपाया), सुतीक्ष्ण (तेज़ किया) और आवर्तित (गढ़ा हुआ) हो। अनुवाद में यह भी जोड़ा गया है कि धार हथौड़े से पीटकर तेज़ की जाती है।
  • कितना बड़ा — अधिकतर (बाहुल्येन) छह अंगुल, यानी छह उँगलियों की चौड़ाई (अनुवाद में नौ सेंटीमीटर); आगे के कई वर्णनों में दूसरी लंबाइयाँ भी दी गई हैं।
  • किस अनुपात में — फल, यानी धार वाला भाग, शस्त्र की अपनी लंबाई (स्वोन्मान) का आधा या चौथाई।
  • कैसी तैयारी — सुधार (अच्छी धार), समाहित-मुखाग्र (मुख और नोक सधे हुए) और सुग्रह (पकड़ने में आसान)।
  • कितने — प्रायो द्वित्राणि, यानी आम तौर पर हर प्रकार के दो या तीन, जो सदा सन्निहित, यानी हमेशा पास रखे जाएँ।

इस संख्या पर एक छोटा-सा हिसाब, जो अध्याय ख़ुद नहीं करता: हर प्रकार के दो हों तो पूरा सेट 26 × 2 = 52 नग का होगा, और तीन हों तो 26 × 3 = 78 का। ये जोड़ हमारे हैं, पाठ के नहीं, पर इनसे लगता है कि छब्बीस की संख्या प्रकारों की गिनती है, और कोश में रखा सामान इस सूची से बड़ा रहा होगा।

पुरानी लकड़ी के फटे सिरे पर रखा, जंग के छींटों वाला काला और खुरदुरा लोहे का टुकड़ा

एक शब्द, जिसे अनुवाद नरम कर देता है: विद्यानाथ सुरूप और अकराल को साथ जोड़कर ‘सुंदर आकार वाला’ लिख देते हैं, पर संस्कृत शब्द का अर्थ इससे कहीं ज़्यादा सटीक है। कराल वह है जो मुँह फाड़े हो और डराए, और अकराल उसका निषेध है। बाक़ी गुण धातु, धार या पकड़ने वाले हाथ से जुड़े हैं, जबकि अकराल उस व्यक्ति से जुड़ा है जिसे शस्त्र को देखना पड़ता है।

धार का वर्णन दो वाक्यांशों में है, और दोनों रोज़मर्रा की चीज़ों के सहारे बात करते हैं। पहला है रोमवाही: रोम यानी बाल, और अनुवाद के अनुसार शस्त्र बाल को उसकी लंबाई में चीर सके।

दूसरा है नीलाम्भोजच्छवि, यानी नीलाम्भोज की छवि, उसकी आभा या रंगत। नीलाम्भोज पानी में उगने वाला नीला फूल है, जिसे ज़्यादातर नीलोत्पल कहा जाता है, और अनुवाद में इसका अर्थ यह दिया गया है कि धार का रंग नील कमल की पंखुड़ियों जैसा दिखे। श्लोक इतना ही कहता है; यह नहीं बताता कि धार नीली क्यों या कैसे दिखे। छवि शब्द आभा के लिए है, आकार के लिए नहीं; आकार की शर्त उसी श्लोक के अगले वाक्यांश, नामानुगतरूपाणि, में है।

इसका एक सीधा अर्थ हो सकता है, जिसे हम केवल अपने अनुमान के रूप में रख रहे हैं। लोहे या स्टील की चमकदार सतह को हल्का गर्म करने पर उस पर पतली परतों के रंग एक क्रम में आते हैं, पहले भूसे जैसा पीला, फिर काँसे जैसा, फिर बैंगनी और फिर नीला, और कई परंपराओं के धातु-कारीगर काम करते समय इन रंगों से धातु की अवस्था पहचानते आए हैं। अगर श्लोक का यही आशय हो, तो इसे फूल की उपमा में लिखा गया तैयारी का निर्देश माना जा सकता है। पर यह बात न अध्याय कहता है, न अनुवादक, और जिन पृष्ठों को हमने पढ़ा उनमें कोई टीका भी ऐसा कहती नहीं मिली; उपमा पाठ की है, धातु-विज्ञान वाली व्याख्या हमारी।

यही फूल अध्याय में एक बार आकार के रूप में भी आता है। छब्बीस में से एक शस्त्र उत्पलपत्र है, यानी ‘नील कमल का पत्र’, लंबी धार वाला फलक, जिसका नाम पंखुड़ी की रूपरेखा से पड़ा है।

26 शस्त्रों के नाम, गिनती और नामानुगत रूप

नाम चार छोटे श्लोकों में आते हैं, जहाँ कई जगह दो नाम एक ही द्विवचन (दो के लिए आने वाले) शब्द में जुड़े हैं। नीचे हर नाम का अर्थ और अनुवाद के अनुसार उसका रूप है; वर्णनों में दिए उपयोग छोड़ दिए गए हैं।

  1. मण्डलाग्र (‘गोल सिरा’): तर्जनी जैसा फलक, जब नाखून हथेली की ओर हो।
  2. वृद्धिपत्र (‘वृद्धि का पत्ता’): वृद्धि नाम के पौधे के पत्ते से नाम; अनुवाद में नाई के उस्तरे जैसा।
  3. उत्पलपत्र (‘नील कमल का पत्र’): लंबी धार वाला फलक।
  4. अध्यर्धधार (‘डेढ़ धार वाला’): उत्पलपत्र का छोटी धार वाला साथी; अनुवाद में आधी धार वाला चाकू।
  5. सर्पमुख (‘साँप के मुँह वाला’): साँप के मुँह जैसा आकार।
  6. एषणी (‘खोजने वाली’): टटोलने की चिकनी छड़, जिसका सिरा केंचुए के मुँह जैसा है।
  7. वेतसपत्र (‘बेंत का पत्ता’): वेतस बेंत के पत्ते जैसा संकरा फलक।
  8. शरारीमुख (‘शरारी की चोंच वाला’): एक जल-पक्षी की चोंच से नाम।
  9. त्रिकूर्चक (‘तीन गुच्छों वाला’): एक साथ लगी तीन नोकें।
  10. कुशपत्र (‘कुश की पत्ती’): कुश घास की पत्ती जैसा फलक।
  11. आटीमुख (‘आटी की चोंच वाला’): आटी पक्षी की चोंच जैसा, आकार में कुशपत्र जितना।
  12. अन्तर्वक्त्र-अर्धचन्द्रक (‘भीतर मुख वाला अर्धचंद्र’): आधे चाँद की तरह मुड़ी धार।
  13. व्रीहिमुख (‘धान के दाने जैसे मुख वाला’): दाने के आकार की नुकीली नोक।
  14. कुठारिका (‘छोटी कुल्हाड़ी’): अनुवाद में गाय के दाँत जैसा छोटा फलक, लकड़ी के हत्थे में लगा।
  15. शलाका (‘छड़’): अनुवाद में ताँबे की छड़, जिसके दोनों सिरे कुरबक की कली जैसे हैं।
  16. अंगुलिशस्त्र (‘उँगली का शस्त्र’): उँगली के नाप की अँगूठी से निकला छोटा फलक, आधार पर धागा बँधा।
  17. बडिश (‘मछली का काँटा’): मुड़े मुख वाला नुकीला काँटा।
  18. करपत्र (‘आरी’): दाँतेदार, हत्थे के साथ।
  19. कर्तरी (‘कैंची’): कैंची।
  20. नखशस्त्र (‘नाखून का शस्त्र’): दो धारें, एक सीधी और एक मुड़ी हुई।
  21. दन्तलेखनक (‘दाँत खुरचने वाला’): चार पहलू, हर पहलू पर तेज़ धार।
  22. सूची (‘सुई’): तीन प्रकार की, गोल, छिपे छेद वाली और मज़बूत।
  23. कूर्च (‘कूची’): लकड़ी के गोल हत्थे में लगी सात या आठ सुइयाँ।
  24. खज (‘मथनी’): लकड़ी के गोल हत्थे में लगे आठ काँटे।
  25. आरा (‘सुआ’): चार प्रकार का; अनुवाद में मोची के सुए जैसा, नीचे के आधे हिस्से में गोल और नोक की ओर चौकोर।
  26. कर्णवेधनी (‘कान छेदने वाली’): चमेली की कली जैसी नोक।

यह सूची अलग-अलग वस्तुओं की नहीं, प्रकारों की गिनती है: आरा ‘चतुर्विधाकारा’ यानी चार रूपों वाला है, और सूच्यः यानी सुइयाँ बहुवचन में आती हैं। कुछ नाम आकार बताते हैं, कुछ वह चीज़ जिससे आकार मिलता है, और कुछ काम, जैसे एषणी और कर्णवेधनी।

गिनती की जाँच: 9 + 7 + 8 + 2 = 26

विद्यानाथ के संस्करण में नामों वाले श्लोक कोष्ठक में छपे हैं। अनुवादक की टिप्पणी के अनुसार कुछ पांडुलिपियों में पहले चार श्लोकों के बाद के साढ़े तीन श्लोक छूट गए थे, और नाम उन्हीं में थे। संख्या पाठ के स्थिर हिस्से में है, क्योंकि षड्विंशतिः पहले श्लोक का पहला शब्द है, जबकि नाम कमज़ोर हिस्से में हैं। इसलिए संख्या से नामों को जाँचा जा सकता है।

हर द्विवचन शब्द को दो नाम गिनें, तो पहला श्लोक नौ नाम देता है (मण्डलाग्र से त्रिकूर्चक तक), दूसरा सात (कुशपत्र से अंगुलिशस्त्र तक), तीसरा आठ (बडिश से खज तक) और चौथा दो (आरा और कर्णवेधनी)। यह जोड़ ठीक घोषित संख्या तक पहुँचता है, लेकिन तभी जब एक शब्द को एक ख़ास तरह से पढ़ा जाए।

छपा पाठ अन्तर्वक्त्रार्धचन्द्रके है, और ‘-के’ वही द्विवचन अंत है जो उत्पलाध्यर्धधारके और शलाकाङ्गुलिशस्त्रके में दो-दो नाम जोड़ता है। इसे भी जोड़ा मानें, यानी एक ‘अन्तर्वक्त्र’ और एक अलग ‘अर्धचन्द्रक’, तो सूची सत्ताईस की हो जाएगी। पर संपादक शब्द के पास कोष्ठक में एकवचन पाठांतर ‘-कम्’ छापते हैं, अनुवादक इसे एक शस्त्र गिनते हैं, और आगे का वर्णन भी आधे चाँद जैसी धार वाले एक ही शस्त्र का है। इसी पाठ को मानने पर, और केवल इसी पर, नाम छब्बीस होते हैं।

यानी हर प्रति में बची संख्या उस हिस्से के एक पाठ की पुष्टि करती है जो कुछ प्रतियों में खो गया। इस तरह अध्याय में अपनी जाँच का एक अंक मौजूद है।

नामानुगत रूप: जब नाम ही आकार बता दे

बनावट का तीसरा श्लोक माँगता है कि शस्त्रों का रूप उनके नाम के अनुसार हो। पिछले अध्याय में वाग्भट कई यंत्रों के नाम उन पशु-पक्षियों के मुख पर रखते हैं जिनसे वे मिलते हैं, जैसे बगुला, कौआ और सिंह; अध्याय 26 इसी चलन को एक शर्त का रूप देता है। यहाँ नाम केवल बाद में जोड़ी गई पहचान नहीं, बल्कि वह विवरण माना गया है जिसके अनुसार लोहार काम करे।

नामों के स्रोत चार तरह के हैं: पौधे (वृद्धि, उत्पल, वेतस, कुश, धान, और वर्णनों में कुरबक व चमेली की कलियाँ), जीव (साँप और दो जल-पक्षी, और वर्णनों में केंचुए का मुँह व, अनुवाद में, गाय का दाँत), घर की चीज़ें (आरी, कैंची, काँटा, कुल्हाड़ी, सुई, कूची, मथनी, मोची का सुआ) और ज्यामिति (गोल सिरा, आधा चाँद, डेढ़ धार, तीन नोकें)।

कुश घास की पत्ती, बेंत का संकरा हरा पत्ता, बैंगनी कमल की पंखुड़ी, धान की छोटी बाली और चमेली की सफ़ेद कली

जो ग्रंथ सदियों तक हाथ से नक़ल होता रहा, उसमें चित्र भरोसे के साथ आगे नहीं पहुँच सकते थे, पर जो नक़ल करने वाला चित्र नहीं बना सकता, वह भी शब्द सही उतार लेता है। एक तरह से फूल, घास, दाना और कली ही इस अध्याय के रेखाचित्रों का काम करते हैं, और इसी वजह से इस पेज की तस्वीरों में पौधे, लोहा, कपड़ा और पत्थर हैं, कोई शस्त्र नहीं।

वाग्भट के दो ग्रंथ: एक गिनती, दो क्रम

विद्यानाथ की टिप्पणी में अष्टांग संग्रह का क्रम भी दिया गया है, जिसे वह वृद्ध वाग्भट, यानी ‘बड़े वाग्भट’ का ग्रंथ बताती है। संग्रह में भी छब्बीस शस्त्र हैं, पर वह दन्तलेखन और मण्डलाग्र से शुरू होकर बडिश और नखशस्त्र पर समाप्त होता है, जबकि हृदय आरा और कर्णवेधनी पर। दो जगह शब्द सचमुच अलग है: हृदय का अंगुलिशस्त्र संग्रह में मुद्रिका (‘अँगूठी’) है, और कूर्च सूचीकूर्च (‘सुई-कूची’), जो उसी गुच्छे का पूरा नाम है।

बाक़ी अंतर पर्यायवाची हैं, जैसे सर्पमुख और सर्पवक्त्र (मुख, वक्त्र और वदन तीनों का अर्थ मुँह है), या कर्णवेधनी और कर्णव्यधन। मुख्य अंतर क्रम का है। क्रम बदलने पर भी सूची छब्बीस की ही रहती है, जिससे लगता है कि गिनती प्रकारों के हिसाब से हो रही है, किसी रटी हुई शृंखला की तरह नहीं। संपादक के अनुसार सुश्रुत बीस शस्त्र गिनते हैं; वह अंश हमने ख़ुद नहीं पढ़ा, और सुश्रुत के अपने आँकड़ों के लिए सुश्रुत संहिता पर हमारा परिचय देखें।

शस्त्र कर्म, शस्त्र दोष और पकड़ने का तरीका

शस्त्र कर्म: छह, आठ, बारह और तेरह

श्लोक 28 बताता है कि शस्त्र क्या करते हैं: उत्पाट्यपाट्यसीव्यैष्यलेख्यप्रच्छानकुट्टनम्। छेद्यं भेद्यं व्यधो मन्थो ग्रहो दाहश्च तत्क्रियाः॥ पहली पंक्ति एक समास में सात कर्म बाँधती है और दूसरी छह अलग से गिनाती है: 7 + 6 = 13।

अनुवाद के क्रम में ये हैं: उत्पाटन (उखाड़कर निकालना), पाटन (चीरना), सीवन (टाँके लगाना), एषण (टटोलना), लेखन (खुरचना), प्रच्छान, कुट्टन (चुभाना), छेदन (काटकर अलग करना), भेदन (खोलना), व्यधन (छेद करना), मन्थन (घुमाकर छेदना), ग्रहण (पकड़ना) और दहन (दाग़ना)। प्रच्छान को विद्यानाथ द्रव निकालना कहते हैं, जबकि चरक के अनुवाद में वैन लून इसे हल्की खरोंचें लगाना कहते हैं।

यह संख्या हर ग्रंथ में एक नहीं है:

  • चरक संहिता, चिकित्सा स्थान 25.55 — छह: वैन लून के अनुवाद में चीरना, छेद करना, काटकर अलग करना, खुरचना, खरोंचें लगाना और टाँके लगाना।
  • सुश्रुत संहिता, सूत्रस्थान 5.5 — आठ: टिप्पणी के अनुसार छेदन, भेदन, लेखन, व्यधन, एषण, आहरण, विस्रावण और सीवन।
  • अष्टांग संग्रह, सूत्रस्थान 34 — बारह: टिप्पणी के अनुसार हृदय के तेरह, दहन को छोड़कर, दूसरे क्रम में।
  • अष्टांग हृदय, सूत्रस्थान 26.28 — तेरह: सीधे श्लोक से गिने गए।

चरक के छहों कर्मों के समकक्ष वाग्भट के तेरह कर्मों में मौजूद हैं: पाटन, व्यधन, छेदन, लेखन, प्रच्छान और सीवन। (टिप्पणी चरक के छह कर्म संस्कृत में देते हुए लेखन की जगह लेपन छापती है; वैन लून का ‘खुरचना’ बताता है कि अभिप्रेत शब्द शायद लेखन है।) संग्रह जिस एक कर्म को छोड़ता है, वह दहन है। सूची में यही अकेला कर्म है जो धार से नहीं होता, और इसी विषय पर हृदय का तीसवाँ अध्याय, क्षार-अग्निकर्म विधि, है।

संग्रह के बारह कर्मों वाली संपादक की छपी तालिका एक से बारह तक चलती है पर आठ नंबर छोड़ देती है, इसलिए उसमें ग्यारह ही कर्म दिखते हैं। हृदय के तेरह से मिलाने पर दहन के अलावा कुट्टन नहीं मिलता, और शायद वही छूटी हुई आठवीं पंक्ति है। यह निष्कर्ष दोनों सूचियों से हमारा है, टिप्पणी का नहीं।

शस्त्र दोष: आठ कमियाँ

श्लोक 29 जाँच की सूची है: कुण्ठखण्डतनुस्थूलह्रस्वदीर्घत्ववक्रताः। शस्त्राणां खरधारत्वमष्टौ दोषाः प्रकीर्तिताः॥ सात दोष पहले समास में हैं और एक दूसरी पंक्ति में, 7 + 1 = 8, और श्लोक कुल संख्या ख़ुद भी देता है: अष्टौ, यानी आठ।

ये हैं कुण्ठ (भोथरा), खण्ड (टूटा या किनारे से झड़ा), तनु (ज़रूरत से पतला), स्थूल (ज़रूरत से मोटा), ह्रस्व (बहुत छोटा), दीर्घ (बहुत लंबा), वक्र (मुड़ा हुआ) और खरधार (खुरदुरी धार)। चार दोष दो विपरीत जोड़ों में हैं, यानी अच्छे शस्त्र की पहचान किसी गुण की अति से नहीं, बल्कि दो कमियों के बीच के संतुलन से होती है। हर दोष काम से पहले आँख या हाथ से कुछ पलों में जाँचा जा सकता है, और यह सूची बनावट वाले श्लोकों से मेल भी खाती है: सुधार कुण्ठ और खरधार का उलटा है, और ‘लंबाई का आधा या चौथाई’ वाला अनुपात ह्रस्व और दीर्घ का।

गुणों की सूची से दोषों की सूची ज़्यादा काम की क्यों है: ‘अच्छा बना है’ कहना एक राय है, जबकि ‘मुड़ा हुआ है’ कहना एक अवलोकन। देखे जा सकने वाले आठ दोष गिनाकर श्लोक मानक को ऐसा बना देता है कि दो अलग लोग उसे एक ही तरह लागू कर सकें।

शस्त्र ग्रहण: पकड़ के तीन तरीके

श्लोक 30 से 32 पकड़ बताते हैं: छेदभेदनलेख्यार्थं शस्त्रं वृन्तफलान्तरे। तर्जनीमध्यमाङ्गुष्ठैर्गृह्णीयात्सुसमाहितः॥ काटने, खोलने और खुरचने के लिए शस्त्र वृन्त (हत्था) और फल के बीच से, तर्जनी, मध्यमा और अँगूठे से, पूरे ध्यान के साथ पकड़ा जाता है। द्रव निकालने वाले शस्त्र हत्थे के सिरे पर तर्जनी और अँगूठे के बीच, बाहर निकालने वाले मूल के पास से, और बाक़ी उस तरह पकड़े जाते हैं जिससे काम आसान हो।

व्रीहिमुख की पकड़ अलग है: उसका हत्था तलप्रच्छन्न, यानी हथेली से ढका रखकर, उसे मुख पर पकड़ा जाता है, और पाठ इसका कारण नहीं देता। हम बस दर्ज करते हैं कि यही एक पकड़ शस्त्र की लंबाई को नज़र से ओझल रखती है, और यही अध्याय शुरुआत में माँग करता है कि शस्त्र अकराल, यानी देखने में डरावने न हों। यह संबंध हमारा अनुमान है, और हो सकता है कि यह बस व्यावहारिक सुविधा की बात हो।

शस्त्र कोश: ऊनी अस्तर वाला कपड़े का बस्ता

अध्याय के इस पहले भाग के आख़िरी दो श्लोक बताते हैं कि शस्त्र कहाँ रखे जाएँ, और इस तकनीकी अध्याय में ये पंक्तियाँ काफ़ी घरेलू लगती हैं: स्यान्नवाङ्गुलविस्तारः सुघनो द्वादशाङ्गुलः। क्षौमपत्रोर्णकौशेयदुकूलमृदुचर्मजः॥ विन्यस्तपाशः सुस्यूतः सान्तरोर्णस्थशस्त्रकः। शलाकापिहितास्यश्च शस्त्रकोशः सुसञ्चयः॥

अर्थ: कोश नौ अंगुल चौड़ा और बारह अंगुल लंबा हो, घना बना हुआ, और क्षौम (लिनन), पत्ते, ऊन, रेशम, महीन कपड़े या मुलायम चमड़े का हो। उसकी डोरियाँ अपनी जगह लगी हों, वह अच्छी तरह सिला हो, शस्त्र उसके भीतर ऊन पर रखे हों, मुँह एक छड़ से बंद हो, और वह आसानी से साथ ले जाया जा सके।

अनुवाद कोश को बारह इंच गुणा नौ इंच बताता है, पर संस्कृत पाठ उसी अंगुल में नापता है जिसमें शस्त्र नापे गए। इससे कोश का नाप उसमें रखे सामान से जुड़ जाता है: मानक शस्त्र छह अंगुल का है और कोश बारह का, यानी 12 = 2 × 6, भीतर की चीज़ से ठीक दोगुना लंबा। सामग्री सब मुलायम या लचीली है, अस्तर ऊर्ण यानी ऊन का है, और आख़िरी शब्द सुसञ्चय में ऐसी चीज़ का भाव है जो सामान को अच्छी तरह समेटकर रखे; अनुवाद इसे ‘ले जाने में आसान’ कहता है।

हाथ से सिला, ऊनी अस्तर वाला बंद लिनन का बस्ता, जो ऐंठी डोरी से बँधा और लकड़ी की पतली पिन से बंद है

कोश को ‘सदा सन्निहितानि’, यानी ‘हमेशा पास रखे हुए’, वाली शर्त का व्यावहारिक हल माना जा सकता है। छब्बीस प्रकारों के दो-तीन शस्त्रों में से हर एक को अलग जगह चाहिए, और यही जगह अनुवाद में बताए गए ‘खाने’ देते हैं। जिस धार को बाल चीरना है, उसे ऐसी चीज़ में रखना होगा जो उसे भोथरा न करे, यानी ऊन में।

अनुशस्त्र: जो शस्त्र न होकर भी उसका काम करे

शस्त्रों के वर्णन और कर्मों की सूची के बीच, श्लोक 27 में अनुशस्त्र, यानी सहायक शस्त्रों का वर्ग बताया गया है। अनुवाद में इनकी सूची है: जोंक, क्षार, अग्नि, सूर्यकांत (धूप समेटने वाला पत्थर), काँच, स्फटिक, चुंबक, नाखून, सागौन और निर्गुण्डी के पत्ते, और खुरदुरी सतह वाली चीज़ें, जैसे सूखा गोबर। अनुवाद के अनुसार ये असली शस्त्र न होते हुए भी शस्त्रों का काम करते हैं, और चिकित्सक ‘अपनी बुद्धि लगाकर’ भोथरे और धार वाले उपकरण बना सकता है।

यह सूची पहली नज़र में बेमेल लगती है, क्योंकि इसमें एक जीव, एक दाहक मिश्रण, एक तत्व, पत्थर, शरीर का एक अंग और पत्ते साथ रखे गए हैं। इनमें न सामग्री एक है, न रूप; साझा बात काम की है: हर एक धार के काम का कोई हिस्सा कर सकता है। यही सिद्धांत अध्याय अपने छब्बीस शस्त्रों पर भी लगाता है, जब कहता है कि उन्हें स्थान-विशेष के अनुसार काम में लिया जाए।

भूरे पत्थर पर रखा सागौन का बड़ा सूखा पत्ता, साफ़ स्फटिक और निर्गुण्डी की पाँच पत्तियों वाली हरी टहनी

यंत्रों वाला पिछला अध्याय भी ऐसे ही समाप्त होता है, जहाँ अनुयंत्रों में हाथ, समय और ख़ुशी या डर जगाने वाली चीज़ें तक गिनी गई हैं। दोनों अध्यायों में वाग्भट सूची को खुला रखते हैं। यानी सूची को अंतिम सीमा नहीं माना गया; आगे का निर्णय चिकित्सक की समझ पर छोड़ा गया है। यह श्लोक हमने सिर्फ़ अनुवाद में पढ़ा, इसलिए इसे अनुवादक के शब्दों में ही रखा है।

पायन और अभ्यास: अष्टांग संग्रह क्या जोड़ता है

इन पृष्ठों के दो और अंश हृदय के श्लोक नहीं, अष्टांग संग्रह का संपादकीय सार हैं, इसलिए उन्हें अलग रखा गया है। पहला है शस्त्र पायन, यानी तपे फलक को किसी द्रव में बुझाना। टिप्पणी तीन द्रव बताती है और हर एक को उस ऊतक से जोड़ती है जिससे शस्त्र का सामना होगा: क्षार वाला फलक हड्डी के लिए, पानी वाला मांस के लिए और तेल वाला वाहिकाओं और स्नायुओं के लिए। चुनाव का कारण टिप्पणी नहीं बताती।

धातु का काम करने वाले लोग इसका सिद्धांत पहचान लेंगे, भले ही हर ब्योरा उन्हें परिचित न लगे: गर्म फलक जिस द्रव में बुझाया जाए, उससे तय होता है कि वह कितनी जल्दी ठंडा होगा, और इसलिए धार कितनी कठोर और कितनी भंगुर होगी। तीन द्रवों को तीन तरह के काम से जोड़ना कम से कम इससे मेल खाता है। नील कमल की तरह यहाँ भी धातु-विज्ञान वाली बात हमारी व्याख्या है, पाठ का दावा नहीं।

गहरी लकड़ी पर कतार में रखे मिट्टी के तीन कटोरे, जिनमें साफ़ पानी, सुनहरा तेल और राख घुला दूधिया पानी है

दूसरा अंश सीखने के बारे में है। टिप्पणी कहती है कि वैद्य शास्त्र में निपुण हो, बहुत-से ऑपरेशन देखकर अनुभव ले और नमूनों पर अभ्यास करे (अनुवाद में ‘पुतले’), और शरीर की रचना सीखने के लिए मृत्यु के बाद शरीर का विच्छेदन आवश्यक है। लिखा हुआ विवरण किसी कला का केवल एक हिस्सा है, दूसरा हिस्सा प्रशिक्षित हाथ है, और ग्रंथ यह दावा नहीं करता कि केवल कोई सूची वह कुशलता दे सकती है।

यह लेख क्या नहीं बताता, और अध्याय क्या नहीं कहता

यह लेख कोई निर्देश नहीं है। इस अध्याय में बताई गई कोई भी चीज़ आज़माने के लिए नहीं है, और इस पेज पर कुछ भी करने की विधि नहीं दी गई है। यहाँ एक शास्त्रीय ग्रंथ को केवल इतिहास और अध्ययन की दृष्टि से देखा गया है। किसी भी प्रक्रिया से जुड़ा सवाल योग्य चिकित्सक के पास ही ले जाएँ।

इसी कारण अध्याय के लगभग हर वर्णन में शस्त्र के साथ जुड़े शरीर के अंग और स्थितियाँ यहाँ छोड़ दी गई हैं, और छह अंगुल के मानक व कोश के अलावा फलकों के माप भी नहीं दिए गए। पृष्ठ 370 से आगे का रक्तमोक्षण वाला भाग किसी बाद के लेख के लिए है; उस विषय पर चरक का अध्याय चरक संहिता, सूत्रस्थान 24 वाले लेख में है और सुश्रुत का सिराव्यध विधि: सुश्रुत संहिता, शारीर स्थान 8 वाले लेख में।

जिन पृष्ठों को हमने पढ़ा, उनमें छब्बीस की संख्या के पक्ष में कोई तर्क नहीं है, और न यह कि धार में नीली आभा कैसे या क्यों आए। पाठ में धातु अयस्, यानी लोहा है; स्टील के लिए कोई शब्द नहीं है, और द्रवों में बुझाने की बात सिर्फ़ संग्रह के संपादकीय सार में है। श्लोक ‘यथाविधि’ कहकर तपाना, तेज़ करना और गढ़ना गिनाते हैं, पर लोहार का तरीका नहीं बताते।

हमारा यह अध्ययन विद्यानाथ के अनुवाद पर आधारित है, और चरक के छह कर्म गैब्रियल वैन लून के अनुवाद में भी जाँचे गए। ग्रंथ अपनी बनावट के संकेत कैसे देते हैं, इस पर बत्तीस तंत्रयुक्तियों वाला लेख देखें।

ऊपर का हर वर्णन चीज़ को उसी आधार पर बताता है जिसे जाँचा जा सके, यह नहीं कि वह किसी के लिए क्या करेगी; हम अपने प्रोडक्ट के बारे में भी इसी तरह लिखने की कोशिश करते हैं। हमारा दिव्य स्नान मुल्तानी मिट्टी साबुन नहाने की टिक्की है, जो 100 ग्राम की चार टिक्कियों के पैक में आती है; स्नान उस दिनचर्या का हिस्सा है जिसका वर्णन शास्त्रीय ग्रंथ करते हैं, और यह उसी के लिए है। अगर आपको कोई लंबी स्वास्थ्य-समस्या है, आप गर्भवती हैं, सवाल किसी बच्चे से जुड़ा है या आप कोई दवा ले रहे हैं, तो किसी भी प्रक्रिया या नए प्रोडक्ट से पहले डॉक्टर या वैद्य से सलाह लें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अष्टांग हृदय में शस्त्र विधि क्या है? +

शस्त्र विधि, यानी ‘धार वाले शस्त्रों की विधि’, वाग्भट के अष्टांग हृदय के सूत्रस्थान का 26वाँ अध्याय है। इसके पहले भाग में 26 शस्त्रों का वर्णन है: वे कैसे बनें, उनके नाम, 13 कर्म, 8 दोष, पकड़ और कोश। यह बिना धार वाले यंत्रों पर लिखे 25वें अध्याय, यंत्र विधि, के बाद आता है।

अष्टांग हृदय सूत्रस्थान 26 में कितने शस्त्र बताए गए हैं? +

छब्बीस। यह संख्या पहले श्लोक का पहला शब्द है, षड्विंशतिः, और नामों वाले चार श्लोकों का जोड़ भी यही है: नौ, सात, आठ और दो। शर्त यह है कि अन्तर्वक्त्र-अर्धचन्द्रक को एक ही शस्त्र माना जाए, जैसा संपादक का पाठांतर और अनुवादक की गिनती दोनों मानते हैं।

वाग्भट के अनुसार 13 शस्त्र कर्म कौन-से हैं? +

उत्पाटन, पाटन, सीवन, एषण, लेखन, प्रच्छान, कुट्टन, छेदन, भेदन, व्यधन, मन्थन, ग्रहण और दहन। चरक चिकित्सा स्थान 25.55 में छह कर्म देते हैं, और संपादक सुश्रुत के आठ और अष्टांग संग्रह के बारह कर्म बताते हैं।

आठ शस्त्र दोष कौन-से हैं? +

कुण्ठ (भोथरा), खण्ड (टूटा), तनु (बहुत पतला), स्थूल (बहुत मोटा), ह्रस्व (बहुत छोटा), दीर्घ (बहुत लंबा), वक्र (मुड़ा) और खरधार (खुरदुरी धार)। श्लोक कुल संख्या भी शब्द में देता है: अष्टौ, यानी आठ।

शस्त्र कोश क्या था? +

यह शस्त्र रखने का कोश था, जो नौ अंगुल चौड़ा और बारह अंगुल लंबा होता था और लिनन, पत्ते, ऊन, रेशम, महीन कपड़े या मुलायम चमड़े से अच्छी तरह सिलकर बनता था। शस्त्र उसमें ऊन पर रखे जाते थे और उसका मुँह एक छड़ से बंद होता था। बारह अंगुल का यह कोश छह अंगुल के मानक शस्त्र से ठीक दोगुना लंबा है।

क्या यह लेख चिकित्सा सलाह या निर्देश है? +

नहीं। यह लेख एक शास्त्रीय ग्रंथ को इतिहास और अध्ययन की दृष्टि से प्रस्तुत करता है, अध्याय के बताए सभी उपयोग छोड़ देता है, और इसमें से कुछ भी आज़माने के लिए नहीं है। किसी भी प्रक्रिया से जुड़े सवाल योग्य चिकित्सक से ही पूछें।

दिव्य स्नान मुल्तानी मिट्टी साबुन देखें →

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