पैर धोकर सोना चाहिए? सुश्रुत संहिता में पाद-प्रक्षालन के सात गुण

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पैर धोकर सोना चाहिए? सुश्रुत संहिता में पाद-प्रक्षालन के सात गुण

सारांश: दिन भर दफ़्तर के जूते, फिर उन्हीं मोज़ों में बिस्तर पर: पैर धोना अक्सर छूट जाता है। सुश्रुत संहिता (चिकित्सास्थान 24.69-70) इस पर पूरा एक श्लोक देती है और पैर धोने के सात गुण गिनाती है। यहाँ श्लोक का अर्थ, डल्हण की टीका, NIH का सर्वे और NHS के बताए कदम हैं।

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पढ़ने का समय: 18 मिनट

Read this article in English: Washing Your Feet in the Sushruta Samhita: Pada Prakshalana and Its Seven Effects

रात को पैर धोना: रोज़ की आदत और एक आम भूल

एक आम कामकाजी दिन सोचिए। जूते सुबह नौ बजे से पहले पहने जाते हैं और आठ बजे के बाद उतरते हैं। बीच में आना-जाना, मेज़ या काउंटर पर काम, किसी लाइन में या साइट पर देर तक खड़े रहना, शायद मेट्रो से पैदल चलना भी। दिन के अंत में जूते दरवाज़े पर उतरते हैं और हममें से कई लोग सीधे बिस्तर पर चले जाते हैं, कभी-कभी दिन भर पहने मोज़ों के साथ ही।

पैर साफ़ दिखते हैं, क्योंकि वे दिन भर ढके रहे। यहीं हम एक आम भूल करते हैं: पैर धोने को हम बदबू या कीचड़ का उपाय मानते हैं, जो तभी करना है जब पैर गंदे दिखें। आयुर्वेद के आधार-ग्रंथों में से एक, सुश्रुत संहिता, इसे दिनचर्या के अध्याय में रखती है, भोजन और पैरों में तेल लगाने वाले श्लोकों के बीच, और दो छोटी पंक्तियों में इसके सात गुण गिनाती है।

बिस्तर की सफ़ेद चादर पर छोड़े गए दिन भर पहने स्लेटी मोज़े और नीचे ढीले फीतों वाले काले दफ़्तरी जूते

इनमें पहला गुण है पैरों का मल (गंदगी) हटाना, और श्लोक इस पर कोई शर्त नहीं लगाता कि गंदगी दिखनी चाहिए। दो आधुनिक स्रोत भी इस पर अपनी बात रखते हैं। अमेरिका के राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (NIH) के एक सर्वे में त्वचा की फंगस (फफूँद) की सबसे ज़्यादा विविधता पैरों पर मिली, और ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवा NHS के अनुसार पैरों की बदबू अक्सर पसीने और बैक्टीरिया के जमाव से होती है।

यह लेख हमारी रील का पूरा रूप है। यहाँ जो कुछ है, वह ग्रंथ की सलाह है या किसी स्रोत के अपने शब्द, हमारी ओर से कोई वादा नहीं।

अनागतबाधा-प्रतिषेध: दिनचर्या का अध्याय

यह श्लोक सुश्रुत संहिता के चिकित्सास्थान के अध्याय 24 से है। अध्याय का नाम अनागतबाधा-प्रतिषेध है: अनागत (जो अभी आया नहीं), बाधा (कष्ट) और प्रतिषेध (रोकना), यानी कष्ट आने से पहले ही उसे रोकना। इसका विषय दिनचर्या है, जिसका पूरा परिचय हमारे अंग्रेज़ी लेख आयुर्वेदिक दिनचर्या में है।

कविराज कुंजलाल भिषग्रत्न का अंग्रेज़ी अनुवाद इसे स्वच्छता के नियमों का अध्याय कहता है, जिसमें “रोज़ पालन किए जाने वाले आचरण के नियम” हैं: पहले दाँतों की सफ़ाई, फिर स्नान और वस्त्र से भोजन तक शरीर की देखभाल, और उसके बाद पैर।

संस्कृत पाठ हमने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडियन मेडिकल हेरिटेज (NIIMH) की ई-संहिता पर पढ़ा, जहाँ मूल पाठ के साथ डल्हण की टीका निबंधसंग्रह भी छपी है। वहाँ हमारे श्लोक के आसपास का क्रम यह है:

24.68-69, आहार: भोजन तृप्त करता है (प्रीणन), तुरंत बल देता है (सद्यो बलकृत्) और शरीर को धारण करता है (देहधारक)।
24.69-70, पाद-प्रक्षालन (पैर धोना): इस लेख का श्लोक।
24.70-71, पादाभ्यंग (पैरों में तेल लगाना): जिसे ग्रंथ निद्राकर, यानी नींद लाने वाला कहता है।
24.71-73, पादत्र (जूते-चप्पल): इन्हें पहनना, और फिर बिना इनके चलना।

यानी सूची भोजन से पैरों पर आती है और तीन श्लोकों तक वहीं रहती है। ई-संहिता श्लोक की पहली पंक्ति 69 और दूसरी 70 पर छापती है, इसलिए संदर्भ 24.69-70 है; भिषग्रत्न अनुच्छेदों से गिनते हैं और इसे अनुच्छेद 45-46 में देते हैं (दूसरा खंड, पृष्ठ 489)।

इस बात में सुश्रुत अकेले नहीं हैं। चरक संहिता, सूत्रस्थान 5.98 भी इसकी प्रशंसा करती है: “पादयोर्मलमार्गाणां शौचाधानमभीक्ष्णशः”, जिसका CSRTSDC अंग्रेज़ी अनुवाद है “पैरों और मल-मार्गों की बार-बार सफ़ाई”। अभीक्ष्णशः का अर्थ मोनियर-विलियम्स का संस्कृत शब्दकोश “लगातार” देता है। यह श्लोक हमने नाखून कितने दिन में काटें वाले लेख में पढ़ा है।

पाद-प्रक्षालन का श्लोक: शब्द-दर-शब्द अर्थ

सुश्रुत संहिता, चिकित्सास्थान 24.69-70

पादप्रक्षालनं पादमलरोगश्रमापहम्॥६९॥
चक्षुःप्रसादनं वृष्यं रक्षोघ्नं प्रीतिवर्धनम्॥७०॥

श्लोक का सरल अर्थ: पैर धोना पैरों के मल, रोग और थकान को हटाता है; आँखों को निर्मल करता है, वृष्य है, राक्षसों को दूर रखता है और प्रसन्नता बढ़ाता है। दो पंक्तियाँ, छह शब्द और सात गुण। अब एक-एक शब्द:

पाद-प्रक्षालनम्: पैरों (पाद) का धोना (प्रक्षालन)। मोनियर-विलियम्स प्रक्षालन के अर्थ “धोना” और “साफ़ करना, शुद्ध करना” देते हैं।

पाद-मल-रोग-श्रम-अपहम्: एक लंबा समास (कई शब्दों से बना एक शब्द), जिसका आख़िरी हिस्सा अपह है, यानी “रोकना, दूर हटाना”। यह मल (गंदगी), रोग और श्रम (थकान) को हटाता है, और शुरुआत का पाद इन्हें पैरों से जोड़ता है।

चक्षुः-प्रसादनम्: आँखों (चक्षु) को निर्मल करना (प्रसादन)। मोनियर-विलियम्स प्रसादन के अर्थ “साफ़ करना, निर्मल बनाना” और “शांत करना, सुकून देना, प्रसन्न करना” देते हैं।

वृष्यम्: एक शास्त्रीय श्रेणी, जिसकी चीज़ें शुक्र को पोषण देने वाली कही जाती हैं; डल्हण की व्याख्या के साथ इस पर आगे बात करेंगे।

रक्षोघ्नम्: रक्षस् (राक्षस) के साथ -घ्न जुड़ा है; मोनियर-विलियम्स के अनुसार “राक्षसों को भगाने या नष्ट करने वाला”।

प्रीति-वर्धनम्: प्रीति (प्रसन्नता) को बढ़ाने वाला (वर्धन)। मोनियर-विलियम्स प्रीति का अर्थ “कोई भी सुखद अनुभूति, आनंद, ख़ुशी, संतोष” देते हैं।

यहाँ व्याकरण की एक छोटी बात ध्यान देने लायक है। समास की शुरुआत में पाद होने से मल, रोग और थकान, तीनों पैरों के माने जा सकते हैं। भिषग्रत्न इन्हें अलग करते हैं: मल और रोग को वे तलवों से जोड़ते हैं (“तलवों पर चिपकी सारी गंदगी और स्थानीय रोग”), और थकान को किसी जगह से नहीं जोड़ते (“थकान का भाव हटाता है”)।

सुश्रुत के अनुसार पैर धोने के सात गुण

डल्हण सात में से सिर्फ़ दो गुणों की व्याख्या करते हैं: आँखों वाले गुण की और वृष्य की। नीचे की हर बात ग्रंथ का कथन है या टीकाकार की व्याख्या, आधुनिक शोध का निष्कर्ष नहीं।

1. पाद-मल, यानी पैरों का मल हटाना: मल का सामान्य अर्थ है गंदगी, मैल या अशुद्धि। आयुर्वेद की संस्कृत में यह उन चीज़ों का भी नाम है जो शरीर ख़ुद बाहर निकालता है, और मोनियर-विलियम्स इनमें मेद (चर्बी) से निकलने वाला पसीना भी गिनाते हैं। श्लोक यह नहीं बताता कि यहाँ कौन-सा मल है।

2. रोग, यानी पैरों के रोग हटाना: रोग बीमारी का सामान्य शब्द है; मोनियर-विलियम्स इसे “बल के टूटने” से जोड़ते हैं। भिषग्रत्न इसे “स्थानीय रोग” कहकर पैरों तक सीमित करते हैं।

श्लोक न किसी रोग का नाम लेता है, न कोई उदाहरण देता है। यह ग्रंथ का शब्द है; हम यह दावा नहीं करते कि पैर धोने से कोई रोग टलता है या मिटता है।

3. श्रम, यानी थकान हटाना: हमारी रील इसी पंक्ति से शुरू होती है। मोनियर-विलियम्स श्रम का अर्थ “थकान, थकावट” और “परिश्रम, मेहनत” देते हैं, यानी काम से आने वाली थकान।

यही अध्याय स्नान, सुगंधित लेप, पैरों में तेल, चलने की छड़ी, आरामदायक बिस्तर और आसन, पंखे की हवा और हल्की मालिश (संवाहन) को भी थकान हटाने वाला कहता है। पैर धोना यह कैसे करता है, ग्रंथ नहीं बताता।

4. चक्षुः-प्रसादन, यानी आँखों को निर्मल करना: डल्हण की पहली व्याख्या इसी पर है:

डल्हण, निबंधसंग्रह (24.69-70 पर)

चक्षुःप्रसादनं दृष्टिप्रसादनं, दृष्टिसंयुक्तपादनिबन्धननाडीप्रसादनत्वात्; प्रभावादित्यपरे।

सरल अर्थ: आँखों का प्रसादन यानी दृष्टि का प्रसादन, क्योंकि पैर धोना उन नाड़ियों को निर्मल करता है जो पैरों से बँधी हैं और दृष्टि से जुड़ी हैं; दूसरों के मत में यह प्रभाव से, यानी अपनी अंतर्निहित शक्ति से होता है। डल्हण दोनों मत दर्ज करते हैं और किसी एक को नहीं चुनते। ई-संहिता यहाँ एक पाठभेद (पाठ का दूसरा रूप) भी देती है: दृष्टिगत, यानी “दृष्टि तक पहुँचा हुआ”।

भिषग्रत्न के फ़ुटनोट में तलवों को आँखों से जोड़ने वाली यह नाड़ी “नर्व” है, जिसे पैर धोना ठंडा रखता है। ये दोनों बातें उस संस्कृत पाठ में नहीं हैं जो हमने पढ़ा: मोनियर-विलियम्स नाड़ी का व्यापक अर्थ “कोई भी नलिका जैसा अंग (जैसे शिरा या धमनी)” देते हैं, डल्हण मार्ग का नाम नहीं लेते, और टीका में प्रसादन (निर्मल करना) है, ठंडक नहीं।

अगले श्लोक पर भी डल्हण लिखते हैं: “पादाभ्यङ्गोऽत्रापि दृष्टिप्रदः पूर्ववत्”, यानी पहले की तरह यहाँ भी पैरों में तेल लगाना दृष्टि देता है। पैरों और आँखों का यह संबंध कई शास्त्रीय ग्रंथों में है, और भावप्रकाश के स्नान और वस्त्र वाले श्लोकों पर हमारे लेख में यही फ़ुटनोट खड़ाऊँ वाले उस श्लोक के साथ रखा गया है, जो पैरों को आँखों से भी जोड़ता है। यह सब शास्त्रीय व्याख्या है, आधुनिक शरीर-रचना नहीं, और आपकी नज़र के बारे में हम कोई दावा नहीं करते।

5. वृष्य, डल्हण के अनुसार शुक्र को पोषण: डल्हण लिखते हैं: “वृष्यं शुक्रवृद्धिकरं, प्रभावात्॥”, यानी वृष्य का अर्थ है प्रभाव से शुक्र बढ़ाने वाला। आयुर्वेद के शरीर-विज्ञान में शुक्र प्रजनन से जुड़ा सार है, सात धातुओं (शरीर के ऊतकों) में आख़िरी।

प्रभाव का अर्थ है कि असर चीज़ की अपनी शक्ति से आता है, उसके स्वाद, गरम-ठंडी प्रकृति या किसी और गुण से नहीं। डल्हण कोई प्रक्रिया नहीं बताते।

इस शब्द को कैसे समझें, यह अध्याय ख़ुद दिखाता है। दो श्लोक बाद जूते-चप्पल वाली पंक्ति इन्हीं तीन शब्दों पर, इसी क्रम में ख़त्म होती है: वृष्यं रक्षोघ्नं प्रीतिवर्धनम्। इस अध्याय में वृष्य पैर धोने, जूते-चप्पल, आरामदायक बिस्तर और आसन, और हल्की मालिश, सबके लिए आया है। इस तरह यह अच्छी दिनचर्या की प्रशंसा का शब्द लगता है, पैरों पर पानी का कोई अलग असर नहीं; यह हमारी व्याख्या है, न कि कोई मापा हुआ परिणाम या हमारा दावा।

6. रक्षोघ्न, यानी राक्षसों को दूर रखना: रक्षस् प्राचीन भारतीय मान्यताओं के अदृश्य, हानिकारक प्राणी हैं; मोनियर-विलियम्स इसका अर्थ “दुष्ट प्राणी या दानव” देते हैं, और भिषग्रत्न इसका अनुवाद “बुरी आत्माओं से बचाव” करते हैं। चलने की छड़ी वाले श्लोक (24.76-78) पर ई-संहिता एक पाठभेद देती है, जिसमें छपे पाठ के भयघ्न (डर भगाने वाला) की जगह रक्षोघ्न है, और साथ में डल्हण की टीका का पाठभेद: “रक्षोघ्नं राक्षसघ्नम्”, यानी राक्षसों का नाश करने वाला।

यह शब्द उन्हीं मान्यताओं की दुनिया का है, कीटाणुओं का कोई पुराना नाम नहीं; श्लोक सूक्ष्म जीवों की बात नहीं करता और हम इसे स्वच्छता के दावे में नहीं बदलते। इसी अध्याय में यह शब्द फूल, वस्त्र और रत्न पहनने (24.64-65) और जूते-चप्पल (24.71-72) की प्रशंसा में भी आता है।

7. प्रीति-वर्धन, यानी प्रसन्नता बढ़ाना: यह गुण सबसे सीधा है, और भिषग्रत्न इसे “मन को प्रसन्न करता है” लिखते हैं। यह भी इस अध्याय में सुख देने वाली चीज़ों की प्रशंसा का शब्द है, जो फूल, वस्त्र और रत्न पहनने और जूते-चप्पल के लिए भी आता है।

पाद-प्रक्षालन: पत्थर के फ़र्श पर पानी भरा पीतल का तसला, पीतल का लोटा और तह किया हुआ सूती तौलिया

ऐसी सूची को कैसे समझें। शास्त्रीय ग्रंथ रोज़ की किसी आदत की प्रशंसा अच्छे शब्दों की एक लड़ी से करते हैं और वही शब्द श्लोक-दर-श्लोक दोहराते हैं। इन्हें आदत बनाए रखने के लिए अपने समय की भाषा में दिए गए ग्रंथ के कारण मानें, मापे हुए नतीजे नहीं।

पादाभ्यंग और पादत्र: अगले दो श्लोक

पैर धोने वाला श्लोक दिन का कोई समय नहीं बताता और नींद के बारे में कुछ नहीं कहता। नींद अगले श्लोक में आती है, और वह तेल से जुड़ी है, पानी से नहीं:

सुश्रुत संहिता, चिकित्सास्थान 24.70-71

निद्राकरो देहसुखश्चक्षुष्यः श्रमसुप्तिनुत्। पादत्वङ्मृदुकारी च पादाभ्यङ्गः सदा हितः॥

श्लोक के अनुसार पैरों में तेल लगाना (पादाभ्यंग) नींद लाता है (निद्राकर), शरीर को सुख देता है (देहसुख), आँखों के लिए हितकर है (चक्षुष्य), थकान और सुप्ति को हटाता है और पैरों की त्वचा मुलायम करता है; यह सदा हितकर है (सदा हितः)। सुप्ति का अर्थ मोनियर-विलियम्स नींद या उनींदापन देते हैं, और सुश्रुत के हवाले से सुन्नपन भी; भिषग्रत्न इसका अर्थ उनींदापन लेते हैं।

पादाभ्यंग, अगले श्लोक की पैरों की तेल-मालिश: बिस्तर के पास स्टूल पर पीतल की छोटी कटोरी में तेल और तह किया हुआ सूती कपड़ा

इसलिए जब लोग कहते हैं कि सुश्रुत पैर धोकर सोने को कहते हैं, तो वे दो श्लोकों को एक कर रहे होते हैं। अगला श्लोक भी अपनाना चाहें, तो सोने से पहले पादाभ्यंग पर हमारी गाइड देखें। दिन भर जूतों के बाद सोने से पहले पैर धोना आज की आदत पर हमारी अपनी व्यावहारिक सलाह है, ग्रंथ का निर्देश नहीं।

तीसरा श्लोक जूते-चप्पल पर है (पादत्र, यानी पैरों का आवरण)। जो लोग मानते हैं कि ग्रंथ जूतों के ख़िलाफ़ है, उन्हें यह श्लोक चौंका सकता है:

सुश्रुत संहिता, चिकित्सास्थान 24.71-73

पादरोगहरं वृष्यं रक्षोघ्नं प्रीतिवर्धनम्। सुखप्रचारमोजस्यं सदा पादत्रधारणम्॥
अनारोग्यमनायुष्यं चक्षुषोरुपघातकृत्। पादाभ्यामनुपानद्भ्यां सदा चङ्क्रमणं नृणाम्॥

ग्रंथ के अनुसार हमेशा जूते-चप्पल पहनना पैरों के रोगों को हरता है (पादरोगहर), वृष्य है, राक्षसों को दूर रखता है, प्रसन्नता बढ़ाता है, चलना आसान बनाता है (सुखप्रचार) और ओज के लिए हितकर है। अगली पंक्ति कहती है कि हमेशा नंगे पैर चलना अस्वस्थ करने वाला (अनारोग्य) है, आयु घटाता है (अनायुष्य) और आँखों को हानि पहुँचाता है। डल्हण पादत्र का अर्थ देते हैं: “पादत्रं पादहितं पादुकादि”, यानी जो पैरों के लिए हितकर हो, जैसे लकड़ी की खड़ाऊँ (पादुका) आदि।

यानी यह अध्याय जूते-चप्पल पहनने की भी प्रशंसा करता है और पैर धोने की भी; दोनों एक ही दिनचर्या का हिस्सा हैं।

पैरों पर क्या रहता है: NIH का सर्वे

सुश्रुत यह नहीं बताते कि पैरों का मल किस चीज़ से बना है, पर एक आधुनिक सर्वे से अंदाज़ा मिलता है कि पैरों की त्वचा पर क्या रहता है। 2013 में NIH के दो संस्थानों के शोधकर्ताओं ने मानव त्वचा की फंगस का पहला ऐसा सर्वे प्रकाशित किया जो जीनोम के विश्लेषण पर आधारित था (फ़िंडली और साथी, Nature 2013; नेशनल ह्यूमन जीनोम रिसर्च इंस्टीट्यूट की प्रेस विज्ञप्ति, 22 मई 2013)।

शोधकर्ताओं ने 10 स्वस्थ वयस्कों के शरीर की 14 जगहों से नमूने लिए। शरीर और बाँहों की ग्यारह जगहों पर फंगस के एक ही वंश, मलासेज़िया (Malassezia), का दबदबा था, जबकि पैरों की तीन जगहों, यानी एड़ी, पैर के नाखून और उँगलियों के बीच की त्वचा, पर फंगस की “बहुत अधिक विविधता” मिली। विज्ञप्ति ये संख्याएँ देती है:

  • एड़ी: “सबसे जटिल जगह”, वंश के स्तर पर लगभग 80 तरह की फंगस
  • पैर के नाखून: लगभग 60 तरह की
  • उँगलियों के बीच की त्वचा: 40 तरह की
  • कोहनी का भीतरी मोड़, बाँह का निचला हिस्सा और हथेली: हर जगह 18 से 32
  • सिर और धड़ की जगहें (जैसे पीठ, गर्दन का पिछला हिस्सा, कान और भौंहों के बीच की त्वचा): हर जगह सिर्फ़ 2 से 10

दो सावधानियाँ ज़रूरी हैं। सर्वे ने धोने, मोज़ों या जूतों को नहीं परखा, बस यह देखा कि स्वस्थ लोगों में कहाँ क्या रहता है। विज्ञप्ति के अनुसार फंगस के समुदाय समय के साथ काफ़ी स्थिर भी दिखे: तीन महीने तक के अंतर पर दो बार जाँचने पर उनमें थोड़ा ही बदलाव मिला। इसलिए यह सर्वे नहीं बता सकता कि धोने से पैरों पर रहने वाली फंगस बदलती है।

दिन के अंत में लकड़ी के जूता-स्टैंड पर ढीले फीतों वाले गहरे रंग के चमड़े के दफ़्तरी जूतों की जोड़ी

जर्नल Temperature में 2019 की एक समीक्षा (बेकर) के अनुसार पसीने की ग्रंथियाँ सबसे घनी हथेलियों और तलवों पर होती हैं, लगभग 250 से 550 प्रति वर्ग सेंटीमीटर, जबकि चेहरे, धड़, बाँहों और टाँगों पर यह घनत्व लगभग दो से पाँच गुना कम है। NHS का पैरों की बदबू (ब्रोमोडोसिस) वाला पेज पसीने की मात्रा पर असर डालने वाली चीज़ों में गरम मौसम, व्यायाम और दिन भर खड़े रहना गिनाता है।

सुश्रुत मल कहते हैं, NHS पसीने और बैक्टीरिया का जमाव, और NIH फंगस गिनता है। ये एक ही दावा नहीं हैं, और ग्रंथ सूक्ष्म जीवों की बात नहीं करता; तीनों में साझा बस जगह है, यानी पैर, जिन्हें रील वाली आदत पूरे दिन मोज़ों और जूतों में बंद रखती है।

पैर धोने का सही तरीका: NHS के सात कदम

सुश्रुत गुण बताते हैं, तरीका नहीं। तरीके के लिए हमने NHS के दो पेज देखे: Smelly feet यानी पैरों की बदबू (आख़िरी समीक्षा 16 जुलाई 2025) और Athlete’s foot (आख़िरी समीक्षा 29 अप्रैल 2024)। दोनों पैरों की एक-एक आम समस्या पर हैं, पैर धोने की सामान्य गाइड नहीं। नीचे उनकी पंक्तियाँ हिंदी में हैं; इन्हें जोड़कर रोज़ की दिनचर्या बनाना हमारा सुझाव है, NHS का नहीं।

1. पैर साफ़ और सूखे रखें। बदबू वाला पेज: “पैरों को साफ़ और सूखा रखें, उँगलियों के बीच भी”।

2. रोज़ साबुन से धोएँ। यही पेज: “पैर दिन में कम से कम एक बार धोएँ”। कोष्ठक में यह पंक्ति “अगर हो सके तो” एक ख़ास तरह का साबुन भी सुझाती है।

3. थपथपाकर सुखाएँ। Athlete’s foot पेज: “धोने के बाद पैर सुखाएँ, ख़ासकर उँगलियों के बीच; रगड़ने के बजाय थपथपाकर सुखाएँ”।

4. पैरों का तौलिया अलग रखें। यही पेज: “पैरों के लिए अलग तौलिया रखें और उसे नियमित रूप से धोएँ”।

5. रोज़ साफ़ मोज़े पहनें। यही पेज: “हर दिन साफ़ मोज़े पहनें, सूती मोज़े सबसे अच्छे हैं”।

6. एक ही जोड़ी लगातार दो दिन नहीं। बदबू वाला पेज: “एक ही मोज़े या जूते लगातार 2 दिन न पहनें”।

7. जूतों को सूखने दें। बदबू वाला पेज: “जूते दोबारा पहनने से पहले उन्हें सूखने दें”।

पैर धोने का सही तरीका: पानी भरा पीतल का तसला, सादे साबुन की टिकिया और सिर्फ़ पैरों के लिए रखा अलग तौलिया

कब किसी से पूछें। पैरों की त्वचा कटी हो, उसमें दरारें, दर्द, लाली या खुजली हो, या पैरों की कोई बात आपको चिंतित करे, तो फ़ार्मासिस्ट या डॉक्टर से पूछें; NHS के दोनों पेज बताते हैं कि डॉक्टर को कब दिखाएँ। कोई चल रही स्वास्थ्य समस्या हो, आप गर्भवती हों, बात बच्चों की हो या आप कोई दवा ले रहे हों, तो पैरों में तेल लगाने जैसी नई आदत से पहले डॉक्टर या वैद्य से सलाह लें। यह लेख रोज़ पैर धोने के बारे में है, पैरों की किसी समस्या के बारे में नहीं।

दिन भर जूतों के बाद: शाम के लिए हमारी सलाह। सुबह से जूते-मोज़े पहने हों, तो पैरों की देखभाल का पहला मौका शाम को ही मिलता है।

जूते दरवाज़े पर उतारें और फीते ढीले करके हवा लगने दें। दिन के मोज़े धुलने में डालें, बिस्तर पर नहीं। फिर साबुन-पानी से पैर धोएँ, उँगलियों के बीच भी, और पैरों के अलग तौलिये से थपथपाकर सुखाएँ; चाहें तो सोने से पहले अगले श्लोक वाला तेल (पादाभ्यंग) लगा लें। इसके लिए पानी, साबुन और तौलिये से ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए।

दिन भर पहने मोज़े और जूतों का क्या करें

रील में कमेंट करने का शब्द SOCKS है, इसलिए यहाँ वह सब है जो हमारे स्रोत मोज़ों के बारे में कहते हैं, उससे ज़्यादा नहीं। ऊपर के कदमों के अलावा ये तीन बातें हैं:

हवादार कपड़ा: बदबू वाला पेज कहता है कि पैरों पर हवादार या प्राकृतिक चीज़ें पहनें, जैसे सूती कपड़ा या चमड़ा।
किसी से साझा नहीं: Athlete’s foot पेज कहता है कि तौलिये, मोज़े या जूते दूसरों के साथ साझा न करें।
पैर गरम करने वाले जूते नहीं: यही पेज कहता है कि ऐसे जूते न पहनें जिनसे पैर गरम और पसीने से भरे रहें।

जूतों पर दोनों पेजों में थोड़ा फ़र्क़ है: बदबू वाला पेज कहता है कि एक ही जूते लगातार 2 दिन न पहनें, जबकि Athlete’s foot पेज कहता है कि एक ही जोड़ी लगातार 2 से 3 दिन से ज़्यादा न पहनें। सख़्त वाली बात मानें, तो दफ़्तर के दो जोड़ी जूते एक-एक दिन छोड़कर पहनने से हर जोड़ी को सूखने के लिए एक दिन मिल जाता है; यह हिसाब हमारा है।

तो दिन भर के मोज़े बिस्तर के बजाय धुलाई में क्यों जाएँ? किसी भी स्रोत ने मोज़े पहनकर सोने का अध्ययन नहीं किया, और हम इस पर कोई दावा नहीं करेंगे। वे बस कहते हैं कि मोज़े हर दिन साफ़ हों और लगातार दो दिन न पहने जाएँ, यानी सुबह से पहने मोज़ों का इस्तेमाल उस दिन के लिए पूरा हो चुका है। रात में पैर गरम रखने हों, तो इसके लिए साफ़ मोज़ों की अलग जोड़ी रखी जा सकती है।

धूप वाली बालकनी में रस्सी पर सूखते साफ़ सूती मोज़े और पास में ढीले फीतों के साथ हवा में रखे दफ़्तरी जूते

सुश्रुत के अध्याय में मोज़ों के लिए कोई शब्द नहीं है; डल्हण जूते-चप्पल का उदाहरण खड़ाऊँ (पादुका) देते हैं, जिसमें पैर खुली हवा में रहते हैं। बंद दफ़्तरी जूतों में पहने जाने वाले मोज़ों के लिए NHS की सलाह काम आती है, श्लोक की नहीं।

इस विषय पर और पढ़ें (अंग्रेज़ी में)

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या सुश्रुत संहिता रात को पैर धोकर सोने को कहती है? +

नहीं। पैर धोने वाला श्लोक, चिकित्सास्थान 24.69-70, सात गुण बताता है पर दिन का कोई समय नहीं। नींद अगले श्लोक 24.70-71 में आती है, जहाँ पैरों में तेल लगाने (पादाभ्यंग) को निद्राकर कहा गया है। दिन भर जूतों के बाद सोने से पहले पैर धोना आज की आदत पर हमारी व्यावहारिक सलाह है, सुश्रुत का निर्देश नहीं।

दिन में कितनी बार पैर धोने चाहिए? +

NHS कहता है, दिन में कम से कम एक बार। सुश्रुत का श्लोक कोई संख्या नहीं देता। चरक संहिता (सूत्रस्थान 5.98) पैरों और मल-मार्गों की अभीक्ष्णशः सफ़ाई की प्रशंसा करती है, यानी मोनियर-विलियम्स के अनुसार “लगातार” और CSRTSDC के अनुवाद में “बार-बार”।

सुश्रुत पैर धोने को आँखों से क्यों जोड़ते हैं? +

श्लोक बस इतना कहता है कि पैर धोना आँखों को निर्मल करता है (चक्षुः-प्रसादन)। डल्हण दो व्याख्याएँ देते हैं: पैरों से बँधी और दृष्टि से जुड़ी नाड़ियों का निर्मल होना, या प्रभाव, यानी अंतर्निहित शक्ति। ये शास्त्रीय व्याख्याएँ हैं, आधुनिक शरीर-रचना नहीं, और नज़र के बारे में हम कोई दावा नहीं करते।

रक्षोघ्न का क्या अर्थ है? +

रक्षोघ्न का अर्थ है राक्षसों को भगाने या नष्ट करने वाला। रक्षस् प्राचीन भारतीय मान्यताओं के हानिकारक प्राणी हैं, और भिषग्रत्न इसका अनुवाद “बुरी आत्माओं से बचाव” करते हैं। यह ग्रंथ का शब्द है, कीटाणुओं का कोई पुराना नाम नहीं, और श्लोक सूक्ष्म जीवों की बात नहीं करता।

क्या पैर की उँगलियों के बीच सुखाना ज़रूरी है? +

NHS की सलाह के अनुसार, हाँ। उसका Athlete’s foot पेज कहता है कि धोने के बाद पैर सुखाएँ, ख़ासकर उँगलियों के बीच, और रगड़ने के बजाय थपथपाकर, पैरों के अलग तौलिये से।

क्या एक ही मोज़े दोबारा पहनना ठीक है? +

NHS की सलाह के अनुसार नहीं। उसका बदबू वाला पेज कहता है कि एक ही मोज़े या जूते लगातार 2 दिन न पहनें, और Athlete’s foot पेज कहता है कि हर दिन साफ़ मोज़े पहनें, सूती मोज़े सबसे अच्छे हैं।

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