सारांश: चरक संहिता सूत्रस्थान 8.26, जो सद्वृत्त (अच्छे आचरण की संहिता) का हिस्सा है, भरोसे में संतुलन सिखाता है: हर किसी पर शक न करें, हर किसी पर आँख मूँदकर भरोसा भी न करें, और अपनों से मन की बात कहें। चरक इन नियमों के कारण नहीं बताते, पर आज की रिसर्च इनसे मेल खाती है।
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Read this article in English: Rules of Trust in Charaka Samhita (Sutrasthana 8.26): Don't Suspect Everyone (Sarvabhishanki), Don't Trust Everyone, Confide in Your Own

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चरक संहिता के सूत्रस्थान का आठवाँ अध्याय, इन्द्रियोपक्रमणीय अध्याय, इन्द्रियों (ज्ञान और कर्म की इन्द्रियों) और उन्हें चलाने वाले मन की देखभाल का अध्याय है। पूरा अध्याय हमने चरक संहिता भाग 8 में समझाया है, और इसके बोलने के नियमों और काम के नियमों पर अलग लेख हैं। यह लेख काम वाले नियमों से ठीक पहले आने वाले श्लोक 8.26 पर है।
चिकित्सा-ग्रंथ में ऐसे नियम क्यों हैं, इसका जवाब सद्वृत्त की शुरुआत में मिलता है। श्लोक 8.17 कहता है कि जो भी अपना भला चाहता है, वह सद्वृत्त का पालन पूरा, हमेशा और पूरे ध्यान के साथ करे (सर्वदा स्मृतिमास्थाय)। श्लोक 8.18 के अनुसार इससे एक साथ दो चीज़ें मिलती हैं: आरोग्य (अच्छी सेहत) और इन्द्रिय-विजय (इन्द्रियों पर नियंत्रण)।
2020 का संस्करण, जिसे हम आधार मानते हैं, श्लोक 8.26 को अलग शीर्षक देता है: समाज में रहते हुए मन को अच्छा बनाए रखने के नियम। यह श्लोक उन सब रिश्तों की बात करता है जिनमें भरोसा शामिल है: जिन पर व्यक्ति निर्भर है, जो उस पर निर्भर हैं, जिन अजनबियों से उसका वास्ता पड़ता है, और उसका अपना परिवार।

चरक संहिता, सूत्रस्थान 8.26 (संस्कृत पाठ: चरक संहिता रिसर्च, ट्रेनिंग एंड स्किल डेवलपमेंट सेंटर का 2020 संस्करण)
नाधीरो नात्युच्छ्रितसत्त्वः स्यात्, नाभृतभृत्यः, नाविश्रब्धस्वजनः, नैकः सुखी, न दुःखशीलाचारोपचारः, न सर्वविश्रम्भी, न सर्वाभिशङ्की, न सर्वकालविचारी॥
आठ मनाहियाँ, सरल अर्थ के साथ (अर्थ हमारे अपने हैं, 2020 संस्करण के अंग्रेज़ी अनुवाद से मिलाए गए)
- नाधीरः स्यात् — अधीर (बेसब्र) न हों।
- नात्युच्छ्रितसत्त्वः — बहुत ज़्यादा उत्तेजित न हों।
- नाभृतभृत्यः — जो आप पर निर्भर हैं, उन्हें बिना सहारे के न छोड़ें।
- नाविश्रब्धस्वजनः — ऐसे न बनें जो अपने ही लोगों से मन की बात न कहे।
- नैकः सुखी — अकेले सुखी न हों।
- न दुःखशीलाचारोपचारः — स्वभाव, आचरण या बर्ताव में दूसरों के लिए अप्रिय न बनें।
- न सर्वविश्रम्भी, न सर्वाभिशङ्की — न हर किसी पर पूरा भरोसा करें, न हर किसी पर शक करें।
- न सर्वकालविचारी — हर समय, हर बात में कमियाँ निकालने वाले न बनें।
विश्रम्भ यानी इतना गहरा भरोसा कि आप किसी पर निर्भर हो सकें और उससे अपनी बातें कह सकें; अभिशङ्का यानी शक। चरक हर किसी पर भरोसा करने (सर्वविश्रम्भी) और हर किसी पर शक करने (सर्वाभिशङ्की), दोनों को मना करते हैं। तीसरा शब्द स्वजन है, यानी अपने लोग: परिवार और सबसे करीबी लोग, जिनसे यह श्लोक मन की बात कहने को कहता है। चरक नियम बताकर आगे बढ़ जाते हैं; आगे दिए गए कारण आज की रिसर्च से हैं, और उनका श्रेय शोधकर्ताओं को है, चरक को नहीं।
पहला नियम: हर किसी पर शक न करें (न सर्वाभिशङ्की)
कुछ लोग हर नए व्यक्ति को संभावित धोखेबाज़ मानकर चलते हैं। पड़ोसी मिठाई लाया है तो ज़रूर कोई मतलब होगा, नया सहकर्मी उनकी जगह लेना चाहता है, हर पेशकश में कोई जाल है। यह सावधानी जैसा लगता है, और सावधानी सुरक्षित लगती है।

इसकी कीमत पर सबसे ठोस रिसर्च 2016 का एक पेपर है: अर्थशास्त्री जेफ़्री बटलर, पाओला जूलियानो और लुइजी गुइसो का "द राइट अमाउंट ऑफ़ ट्रस्ट" (भरोसे की सही मात्रा)। इसमें यूरोपियन सोशल सर्वे का एक जाना-माना सवाल इस्तेमाल हुआ: क्या ज़्यादातर लोगों पर भरोसा किया जा सकता है, या लोगों से जितनी सावधानी बरतें, उतना अच्छा? लोग 0 से 10 तक के पैमाने पर जवाब देते हैं: 0 यानी पूरी सावधानी, 10 यानी ज़्यादातर लोगों पर भरोसा।
लेखकों ने 32 देशों से सर्वे के पाँच दौर जोड़कर कुल 1,02,298 लोगों के जवाबों की तुलना उनके घर की आमदनी से की। आमदनी भरोसे के साथ पैमाने पर लगभग 7 तक बढ़ी और फिर घटने लगी। जो किसी पर भरोसा नहीं करते थे, वे लगभग 7 वालों से औसतन 14% कम कमाते थे; यह अंतर लगभग उतना ही है जितनी अतिरिक्त आमदनी उसी डेटा में कॉलेज की डिग्री से जुड़ी दिखी।
लेखकों के अनुसार बहुत शक्की लोग धोखे से तो बचते हैं, पर फ़ायदे वाले सौदे भी ठुकरा देते हैं, यानी बुरे मौकों के साथ अच्छे भी। चरक की पंक्ति के लिए यह उचित कारण है: हर किसी पर शक करने से मिलने वाली सुरक्षा मुफ़्त नहीं होती, उसकी कीमत वे लोग और मौके हैं जो सच्चे थे।
नए व्यक्ति पर भरोसा कैसे करें: छोटी ज़िम्मेदारी से शुरुआत
शक छोड़ने का मतलब यह नहीं कि पहले ही दिन किसी को सब कुछ सौंप दिया जाए। कदम-दर-कदम दिया गया भरोसा भी भरोसा ही है, और इससे लोगों को यह दिखाने का मौका मिलता है कि वे असल में कैसे हैं।
यह आज़माएँ: किसी नए व्यक्ति पर पहले थोड़ा भरोसा करके देखें: उसे कोई छोटा काम, अपना थोड़ा समय या कोई छोटी ज़िम्मेदारी दें। देखें कि वह उसे कैसे निभाता है, और जैसे-जैसे वह भरोसा कमाए, वैसे-वैसे ज़्यादा दें।

श्लोक की आख़िरी पंक्ति, न सर्वकालविचारी (हर समय आलोचना न करें), इसी नियम से जुड़ी है। सोच-विचार की अपनी जगह है, जैसे श्लोक 8.27 के काम वाले नियमों में (बिना जाँचे किसी काम में न लगें); पर शक और हर बात में कमी निकालने की आदत, दोनों लोगों को दूर रखती हैं और आसपास के लोगों के लिए हर दिन मुश्किल बना देती हैं।
दूसरा नियम: हर किसी पर भरोसा न करें (न सर्वविश्रम्भी)
चरक का नियम दोनों ओर से सावधान करता है: जिस पंक्ति में वे हर किसी पर शक करने से मना करते हैं, उसी में हर किसी पर भरोसा करने से भी। जो हर कॉल करने वाले, हर फ़ॉरवर्ड किए गए मैसेज और हर मुस्कुराते अजनबी की बात मान लेता है, वह दूसरी तरफ़ की ग़लती करता है, और उसकी कीमत भी उतनी ही भारी है।

उसी अध्ययन में पैमाने के ऊपरी छोर पर भी आमदनी घटी: 10 का जवाब देने वाले, यानी सबसे ज़्यादा भरोसा करने वाले, लगभग 7 वालों से 7.3% कम कमाते थे। सर्वे ने यह भी पूछा था कि क्या पिछले पाँच सालों में चार तरह के लेन-देन में उनके साथ धोखा हुआ: बैंक से, पुराना सामान ख़रीदते समय, खाने का सामान ख़रीदते समय, और प्लंबर, बिल्डर, मैकेनिक या मरम्मत करने वाले से।
धोखा खाए लोग बाद में कम भरोसा करना सीख जाते हैं, इसलिए यहाँ कारण और नतीजे को अलग करना ज़रूरी था। लेखकों ने एक सांख्यिकीय तरीके से यह किया, और पाया कि चारों क्षेत्रों में ज़्यादा भरोसा करने वालों के साथ धोखा होने की संभावना ज़्यादा थी।
उनका अपना निष्कर्ष चरक की पंक्ति से काफ़ी मेल खाता है। ज़्यादातर लोगों का भरोसा लगभग सही स्तर पर होता है, पर हर दस में से लगभग एक व्यक्ति इतना ज़्यादा या इतना कम भरोसा करता है कि उसे अपनी संभावित आमदनी के 13% से ज़्यादा का नुकसान होता है।
फ़ोन पर ओटीपी, पिन या पैसे माँगे जाएँ तो क्या करें
आज यह ग़लती सबसे साफ़ रूप में फ़ोन पर दिखती है। कोई फ़ोन करके कहता है कि वह बैंक, कूरियर या रिफ़ंड देने वाली किसी कंपनी से बोल रहा है, और कार्ड नंबर, पिन या ओटीपी माँगता है, या "समस्या सुलझाने" के लिए पैसे भेजने को कहता है।
यह आज़माएँ: ऐसा कोई कॉल आए, तो रुक जाएँ और उस कॉल पर कुछ भी न बताएँ। फ़ोन रखें और ख़ुद जाँचें: कार्ड पर छपे नंबर या बैंक की आधिकारिक वेबसाइट पर दिए नंबर पर बैंक को फ़ोन करें, या पहले परिवार में किसी से पूछ लें। बैंक और भारतीय रिज़र्व बैंक बार-बार कहते हैं कि असली बैंक कभी ओटीपी या पिन नहीं माँगता।

इसका मतलब हर किसी पर शक करना नहीं है; वह पहले नियम के ख़िलाफ़ होगा। चरक बीच का रास्ता बताते हैं: लोगों के लिए खुले रहें, पर कोई भी ज़रूरी चीज़ सौंपने से पहले जाँच लें।
अगर आपको लगता है कि ऑनलाइन या फ़ोन पर आपके साथ धोखा हो चुका है, तो साइबर अपराध की राष्ट्रीय हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करें या cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें, और तुरंत अपने बैंक को बताएँ। ऐसे मामलों में देर न करें।
तीसरा नियम: अपनों से मन की बात कहें (नाविश्रब्धस्वजनः)
तीसरा नियम अजनबियों से हटकर अपने लोगों की बात करता है, यानी उनकी जिन पर पूरा भरोसा किया जा सकता है। हम में से कई लोग किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो पैसे, काम या सेहत की हर चिंता अपने तक रखता है, जब तक वह ज़रूरत से कहीं बड़ी न हो जाए। कभी-कभी वह व्यक्ति हम ख़ुद होते हैं।

इस नियम का एक कारण 2019 की एक रिसर्च में मिलता है। मनोवैज्ञानिक माइकल स्लेपियन और एडिथ मोल्टन-टेटलॉक के अध्ययन "कॉन्फ़ाइडिंग सीक्रेट्स एंड वेल-बीइंग" (राज़ साझा करना और मन की भलाई) में 800 से ज़्यादा लोगों और उनके 10,000 से ज़्यादा असली राज़ों को देखा गया। उन्होंने परखा कि किसी जान-पहचान वाले को राज़ बताने से क्या बदला।
किसी एक को बताने के बाद भी बाकी लोगों से वह राज़ उतनी ही बार छिपाना पड़ता था। बदलाव इसमें आया कि लोग उसे कैसे संभालते थे: बताने वालों को लगा कि उनके साथ कोई है और वे उसे बेहतर संभाल सकते हैं, और इसी से वे बेहतर स्थिति में रहे। उनका मन भी उस राज़ पर कम बार लौटा, और यह नतीजा सर्वे और प्रयोगों, दोनों में मिला।
यह चरक की पंक्ति से अच्छी तरह मेल खाता है। अपनों से छिपाई गई चिंता बार-बार लौटती है और आप उसका सामना अकेले करते हैं, जबकि किसी करीबी से कह देने पर वही चिंता संभालने लायक लगने लगती है।
यह आज़माएँ: कोई एक बात चुनें जो कुछ समय से मन पर बोझ बनी है, और उसे घर के किसी भरोसेमंद व्यक्ति से कहें, जैसे जीवनसाथी, माता-पिता, भाई या बहन। उनसे हल मिलना ज़रूरी नहीं; बात कह देना ही इसका मकसद है।
श्लोक की बाकी पाँच पंक्तियाँ
रिसर्च सबसे सीधे ऊपर के तीन नियमों पर बात करती है। पर श्लोक की बाकी पंक्तियाँ भी इसी बारे में हैं कि व्यक्ति दूसरों के बीच कैसे रहे।
- धैर्य और स्थिरता (पंक्ति 1 और 2) — जो इंतज़ार नहीं कर सकता और जो जल्दी बहक जाता है, दोनों पर भरोसा करना मुश्किल होता है। भरोसे के नियमों के लिए स्थिर स्वभाव ज़रूरी है।
- आश्रितों का ध्यान (पंक्ति 3) — चरक के समय में इसका मतलब घर के सहायक और सेवक थे; आज यह हर उस व्यक्ति पर लागू होता है जो आप पर निर्भर है, जैसे आपके लिए काम करने वाले लोग, बुज़ुर्ग माता-पिता या छोटे भाई-बहन।
- ख़ुशी बाँटना (पंक्ति 5) — चरक का संकेत है कि अच्छी ख़बर बाँटने के लिए होती है।
- दूसरों के लिए सहज होना (पंक्ति 6) — ऐसे व्यक्ति बनें जिनसे लोग ख़ुशी से मिलना-जुलना चाहें।
इस हफ़्ते इन नियमों का अभ्यास कैसे करें
चरक अच्छे आचरण का पालन सर्वदा, यानी हमेशा, करने को कहते हैं (8.17)। एक हफ़्ता बस शुरुआत है, पर इन आदतों को पहचानने के लिए काफ़ी है; एक बार में एक नियम पर ध्यान दें।
- दिन 1 और 2: न सर्वाभिशङ्की — ध्यान दें कि आप कब किसी के बारे में सबसे बुरा मान लेते हैं, और किसी एक व्यक्ति को छोटी ज़िम्मेदारी दें।
- दिन 3 और 4: न सर्वविश्रम्भी — पैसे, कार्ड नंबर, पिन या ओटीपी माँगने वाले हर कॉल या मैसेज पर: रुकें, फ़ोन रखें, ख़ुद जाँचें; परिवार के बड़ों को भी यही बताएँ।
- दिन 5 और 6: नाविश्रब्धस्वजनः — मन की कोई एक बात घर पर किसी से कहें, और देखें कि बाद में वह कम बार लौटती है या नहीं।
- दिन 7: न सर्वकालविचारी — एक पूरा दिन घर या काम पर किसी को बेवजह टोके बिना बिताएँ, और देखें कि वह दिन सबको कैसा लगा।
एक पंक्ति में: भरोसा धीरे-धीरे दें, पैसे देने से पहले जाँचें, और घर पर मन की बात कहें।
ये नियम क्या नहीं हैं: ये किसी समस्या की पहचान नहीं हैं। थोड़ा शक सामान्य है, पर अगर हर किसी पर अविश्वास के साथ लगातार डर, नींद न आना या घर या काम पर परेशानी हो, या कोई चिंता अकेले उठाना मुश्किल लगे, तो किसी श्लोक की बजाय डॉक्टर या काउंसलर से बात करें। कोई चल रही स्वास्थ्य समस्या, गर्भावस्था, बच्चों से जुड़ा सवाल हो या कोई दवा चल रही हो, तो डॉक्टर या वैद्य की सलाह लें।
ऊपर की रिसर्च चरक का प्रमाण भी नहीं है। भरोसे वाला अध्ययन सावधानी से किया गया, पर वह यूरोप के सर्वे पर आधारित है और कई लोगों के औसत की बात करता है; राज़ वाला अध्ययन ऑनलाइन स्वयंसेवकों पर हुआ। दोनों में से कोई भी लगभग दो हज़ार साल पुराने ग्रंथ को परखने के लिए नहीं बना था; ये बस दिखाते हैं कि सेहत और इन्द्रियों पर नियंत्रण के लिए लिखे गए नियम, भरोसे की आज की समझ से भी मेल खाते हैं।
हमारी ओर से: इस लेख की किसी बात के लिए किसी प्रोडक्ट की ज़रूरत नहीं है। फिर भी कुछ देखना चाहें, तो हमारा सबसे जाना-पहचाना प्रोडक्ट दिव्य स्नान मुल्तानी मिट्टी साबुन है: मुल्तानी मिट्टी पर आधारित, हाथ से छोटे बैचों में बना नहाने का सादा साबुन, 100 ग्राम की चार टिकियों के पैक में।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
चरक संहिता में भरोसे के बारे में क्या कहा गया है? +
सूत्रस्थान 8.26 कहता है न सर्वविश्रम्भी, न सर्वाभिशङ्की: न हर किसी पर पूरा भरोसा करें, न हर किसी पर शक। इसी श्लोक में नाविश्रब्धस्वजनः भी है, यानी अपने लोगों से मन की बात कहें।
सर्वविश्रम्भी (sarvavishrambhi) और सर्वाभिशङ्की (sarvabhishanki) का क्या अर्थ है? +
विश्रम्भ यानी गहरा भरोसा, और सर्वविश्रम्भी वह जो हर किसी पर भरोसा कर ले। अभिशङ्का यानी शक, और सर्वाभिशङ्की वह जो हर किसी पर शक करे। चरक एक ही पंक्ति में दोनों को मना करते हैं।
क्या हर किसी पर शक करना ग़लत है? +
चरक इसके ख़िलाफ़ सलाह देते हैं। बटलर, जूलियानो और गुइसो (2016) के 1,02,298 लोगों वाले अध्ययन में सबसे कम भरोसा करने वाले, सही मात्रा में भरोसा करने वालों से 14% कम कमाते थे, क्योंकि वे अच्छे मौके भी ठुकरा देते थे।
क्या हर किसी पर भरोसा करने से धोखा ज़्यादा होता है? +
उसी अध्ययन में सबसे ज़्यादा भरोसा करने वाले, सही मात्रा में भरोसा करने वालों से 7.3% कम कमाते थे, और बैंक, पुराने सामान, खाने के सामान और मरम्मत से जुड़े लेन-देन में उनके साथ धोखा होने की संभावना ज़्यादा थी। चरक का रास्ता बीच का है: पैसे या निजी जानकारी देने से पहले जाँच लें।
आयुर्वेद अपनों से मन की बात कहने को क्यों कहता है? +
सूत्रस्थान 8.26 का नाविश्रब्धस्वजनः अपने लोगों से मन की बात कहने को कहता है। स्लेपियन और मोल्टन-टेटलॉक (2019) ने 800 से ज़्यादा लोगों पर पाया कि जिन्होंने किसी जान-पहचान वाले को राज़ बताया, वे उसे बेहतर संभाल पाए और उनका मन उस पर कम बार लौटा।
यह चरक संहिता में कहाँ है, और कौन-सा अनुवाद इस्तेमाल हुआ है? +
चरक संहिता, सूत्रस्थान, अध्याय 8 (इन्द्रियोपक्रमणीय अध्याय), श्लोक 26। संस्कृत पाठ चरक संहिता रिसर्च, ट्रेनिंग एंड स्किल डेवलपमेंट सेंटर के 2020 संस्करण से है; सरल अर्थ हमारे अपने हैं, उसी संस्करण से मिलाए गए।