सारांश: चरक संहिता के चिकित्सा स्थान, अध्याय 1, पाद 3 (श्लोक 41 से 47) में त्रिफला रसायन एक नहीं, पाँच अलग-अलग योगों के रूप में मिलता है — रोज़ के 1+2+4 फलों से लेकर लोहे के पात्र पर तैयार होने वाले लौह-त्रिफला तक। हर योग शहद और घी के साथ, पूरे एक वर्ष तक लेने के लिए कहा गया है। यहाँ पाँचों योग, उनका श्लोक-संदर्भ, मात्रा और अनुपान एक ही जगह पढ़िए।
पढ़ने का समय: 22 मिनट
Read this article in English: Triphala Rasayana in Charaka Samhita: The 5 Classical Triphala Rejuvenation Formulas from Chikitsa Sthana 1.3 (Haritaki, Vibhitaki, Amalaki)
- त्रिफला रसायन क्या है और चरक संहिता में यह कहाँ लिखा है
- तीन फल: हरीतकी, बिभीतकी और आमलकी, और 1:2:4 का पारंपरिक अनुपात
- पहला योग: रोज़ 1+2+4 फल, शहद और घी के साथ (चि. 1.3#41–42)
- दूसरा योग: लोहे के पात्र वाला त्रिफला — लौह-त्रिफला (चि. 1.3#43–44)
- तीसरा और चौथा योग: मेधा के लिए मधुक-तुगाक्षीरी-पिप्पली, और सरल त्रिफला-खांड (चि. 1.3#45)
- पाँचवां योग: धातु, विडंग और लवण वाले तीन संयोग (चि. 1.3#46–47)
- अनुपान और मात्रा: उत्तम, मध्यम और हीन बल के अनुसार
- रसायन की शर्त: चरक के पथ्य-अपथ्य (चि. 1.3#7–8)
- आज की दिनचर्या में त्रिफला की परंपरा कैसे उतारें
- अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

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च्यवनप्राश का मुख्य आधार आँवला है — वही फल जो त्रिफला के पारंपरिक 1:2:4 अनुपात में चार गुना मात्रा में आता है, इसलिए यह इस विषय से सीधे जुड़ा है।
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त्रिफला आयुर्वेद की सबसे परिचित तैयारियों में गिनी जाती है। भारत में ज़्यादातर लोग इसे एक ही तरह से जानते हैं — “पेट के लिए तीन फलों का चूर्ण”। इसके लिए किसी संस्कृत श्लोक तक पहुँचने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती।
पर शास्त्र में त्रिफला कोई अकेला योग नहीं है। वहाँ यह एक श्रेणी है, जिसके भीतर कई अलग-अलग तैयारियाँ आती हैं। यह बात सबसे साफ़ चरक संहिता के चिकित्सा स्थान, अध्याय 1 (रसायन अध्याय), पाद 3 में दिखती है — जहाँ श्लोक 41 से 47 तक, सिर्फ़ सात श्लोकों में, आचार्य चरक त्रिफला रसायन के पाँच अलग-अलग योग गिनाते हैं।
अगर आपने त्रिफला को केवल भूरे डिब्बे वाले चूर्ण के रूप में देखा है, तो यह विस्तार नया लग सकता है। चरक ताज़े साबुत फलों वाला त्रिफला बताते हैं; लोहे के पात्र पर चौबीस घंटे रखा हुआ त्रिफला-कल्क; मधुक, तुगाक्षीरी और पिप्पली के साथ मेधा (बुद्धि) के लिए बना योग; केवल खांड के साथ मिला हुआ सरल योग; और तीन और संयोग — धातुओं के साथ, विडंग-पिप्पली के साथ, तथा लवण के साथ।
त्रिफला रसायन कहाँ लिखा है (kaha likha hai)
ग्रंथ — चरक संहिता, काय चिकित्सा का आधार-ग्रंथ।
स्थान — चिकित्सा स्थान।
अध्याय — अध्याय 1, रसायन अध्याय।
पाद — पाद 3, यानी चौथा पाद (यह अध्याय चार पादों में बँटा है)।
श्लोक — 41 से 47।
विद्वान इसे संक्षेप में चि. 1.3#41–47 लिखते हैं। इस लेख में हर शास्त्रीय संदर्भ इसी रूप में दिया गया है।
एक बात पहले साफ़ कर लेना ठीक रहेगा। यह हिस्सा उसी बड़े रसायन अध्याय का अंश है, जिसमें त्रिफला के अलावा कई और रसायन गिनाए गए हैं।
इनमें ब्रह्म रसायन (चि. 1.3#3–6), केवलामलक रसायन (चि. 1.3#9–14), लौहादि रसायन (चि. 1.3#15–23) और स्वर्ण-रजत रसायन (चि. 1.3#23) आते हैं। आगे ऐंद्र रसायन (चि. 1.3#24–29) तथा मेध्य औषधियाँ — मंडूकपर्णी, यष्टिमधु, गुडूची और शंखपुष्पी (चि. 1.3#30–31) — भी इसी क्रम में हैं।
इसके बाद पिप्पली रसायन (चि. 1.3#32–35), पिप्पली-वर्धमान रसायन (चि. 1.3#36–40) तथा शिलाजतु रसायन (चि. 1.3#48–61) मिलते हैं। यह लेख केवल त्रिफला वाले हिस्से पर केंद्रित है, क्योंकि आज के घर में उतारने के लिहाज़ से यही योग सबसे सुलभ माने जाते हैं।

तीन फल: हरीतकी, बिभीतकी और आमलकी, और 1:2:4 का पारंपरिक अनुपात
पाँच योगों में जाने से पहले तीनों फलों को समझ लेना ज़रूरी है। आयुर्वेद हर द्रव्य को छह तरह से देखता है — रस (स्वाद), गुण, वीर्य (शीत या उष्ण प्रभाव), विपाक (पचने के बाद का प्रभाव), प्रभाव (द्रव्य का अपना विशेष असर) और दोष-कर्म (वात, पित्त और कफ पर काम)। तीनों फलों का यह पूरा विवरण भावप्रकाश निघण्टु के हरीतक्यादि वर्ग और सुश्रुत संहिता सूत्रस्थान 38 में मिलता है।
हरीतकी (हरड़) — त्रिफला के तीनों फलों में इसे शीर्ष माना जाता है। इसके संस्कृत पर्याय ही इसका परिचय हैं — अभया (निर्भय), पथ्या (हितकर), विजया और जयंती। तिब्बती चिकित्सा-परंपरा में भैषज्य गुरु के हाथ में यही फल दिखाया जाता है।
भावप्रकाश निघण्टु, हरीतक्यादि वर्ग, श्लोक 25 के अनुसार इसका रस मुख्यतः कषाय है, और लवण को छोड़कर बाकी चारों रस भी कम मात्रा में मौजूद रहते हैं — इसी कारण टीकाकार इसे पंचरस कहते हैं। गुण लघु और रूक्ष, वीर्य उष्ण, विपाक मधुर। इसे त्रिदोषहर माना गया है, विशेष रूप से वात पर। इसका प्रभाव दीपन (अग्नि को प्रदीप्त करना), पाचन (आम को पचाना) और अनुलोमन (अपान वायु को नीचे की दिशा में नियमित करना) बताया गया है — इसीलिए कब्ज़ (आयुर्वेद में विबंध) में इसका पारंपरिक उपयोग मिलता है।
बिभीतकी (बहेड़ा) — नाम को “वि + भी” से जोड़ा जाता है, यानी जो भय को हटाए। लोक-व्युत्पत्ति इसे भय से भी जोड़ती है, क्योंकि पके बहेड़े की गुठली पुराने भारत में जुए के पासे के रूप में इस्तेमाल होती थी, और जुआ खिलाड़ी के लिए भय तथा बर्बादी ले आता था। फल गोल, चिकना और भूरा होता है।
इसका रस मुख्यतः कषाय है, गुण लघु और रूक्ष, वीर्य उष्ण और विपाक मधुर। इसे मुख्यतः कफ और पित्त को संतुलित करने वाला माना गया है, और स्वर, श्वास-मार्ग तथा कृमि से जुड़े प्रसंगों में इसका शास्त्रीय उल्लेख मिलता है। इसका एक पर्याय “अक्ष” (आँख) भी है — और यही कारण है कि त्रिफला सुश्रुत उत्तर तंत्र में बताई गई नेत्र-तर्पण जैसी क्रियाओं में परंपरागत रूप से इस्तेमाल होता रहा है।
आमलकी (आँवला) — त्रिफला का तीसरा और सबसे बड़ी मात्रा वाला फल; पारंपरिक 1:2:4 अनुपात में चार भाग इसी के होते हैं। इसके पर्याय हैं धात्री (जो माता की तरह पोषण दे), अमृता, वयस्था (आयु को थामने वाली) और श्रीफल। गुण-कर्म में यह पंच रस वाला है, लवण को छोड़कर, जिनमें अम्ल प्रधान है; गुण गुरु, रूक्ष और शीत; वीर्य शीत — तीनों फलों में केवल यही शीत वीर्य वाला है; विपाक मधुर। इसे त्रिदोषहर, विशेषकर पित्त को शांत करने वाला माना गया है, और इसके प्रभाव में रसायन, चक्षुष्य (नेत्रों के लिए हितकर), केश्य (बालों के लिए हितकर) तथा वृष्य गिनाए जाते हैं।
आँवले को विटामिन C का समृद्ध प्राकृतिक स्रोत माना जाता है; कई जगह इसकी तुलना संतरे से बीस से तीस गुना अधिक मात्रा के रूप में की जाती है। तीनों फलों में यह अकेला है जिसे चरक ने अकेले भी एक पूर्ण रसायन के रूप में दिया है — केवलामलक रसायन, चि. 1.3#9–14।
त्रिफला का पारंपरिक अनुपात — 1:2:4
1 भाग हरीतकी : 2 भाग बिभीतकी : 4 भाग आँवला। यह अनुपात भावप्रकाश निघण्टु के हरीतक्यादि वर्ग में मिलता है और चरक संहिता तथा शार्ङ्गधर संहिता दोनों में यही झलकता है। अनुपात वज़न के हिसाब से है — और चरक के पहले योग (चि. 1.3#41–42) में साबुत फलों की गिनती के हिसाब से।
बाज़ार में मिलने वाले कई चूर्ण लागत के कारण 1:1:1 में बनते हैं। अगर आप वही रस-संतुलन चाहते हैं जो चरक बताते हैं, तो लेबल पर 1:2:4 लिखा होना देख लीजिए।
इस अनुपात के पीछे की सोच सीधी है। आँवला शीतल और रसायन वाला भार उठाता है, इसलिए सबसे अधिक मात्रा में; बिभीतकी बीच में कफ को संतुलित करने वाला हिस्सा है; और हरीतकी सबसे कम मात्रा में, क्योंकि उसका अनुलोमन और अग्नि से जुड़ा काम तीखा माना गया है।

पहला योग: रोज़ 1+2+4 फल, शहद और घी के साथ (चि. 1.3#41–42)
यह पूरे अध्याय का आधार-योग है। चरक इसे दो कसे हुए श्लोकों में रखते हैं।
मूल श्लोक का भाव — चरक संहिता, चिकित्सा स्थान 1.3#41–42
“त्रिफला मनुष्य को सौ वर्ष तक जरा (वृद्धावस्था के लक्षणों) से रहित और स्वस्थ रखती है। विधि — भोजन पच जाने के बाद 1 हरीतकी, भोजन के बाद 2 बिभीतकी और भोजन के बाद 4 आँवले लें। यह सब रोज़, शहद और घी के साथ, एक वर्ष तक लेना चाहिए।”
यह शास्त्र का कथन है और उसी रूप में पढ़ा जाना चाहिए — इसे किसी परिणाम के वादे की तरह नहीं लिया जाता। श्लोक में तीन बातें ध्यान देने लायक हैं। पहली, मात्रा साबुत ताज़े फलों में दी गई है, चूर्ण में नहीं; शास्त्र की पहली पसंद यही रूप है। दूसरी, समय दिन भर में बँटा हुआ है: हरीतकी तब जब पिछला भोजन पच चुका हो (जिसे जीर्णाशन कहा गया है, यानी अगले भोजन से पहले खाली पेट), और बिभीतकी तथा आँवला भोजन के बाद (भुक्तान्ते)। तीसरी, अनुपान शहद और घी दोनों हैं, साथ में।
शहद और घी को साथ लेना पहली नज़र में विरुद्ध आहार के उस नियम से टकराता दिखता है जो दोनों को बराबर मात्रा में मिलाने से मना करता है। टीकाकार इसका उत्तर देते हैं — वह नियम बराबर मात्रा के कच्चे मिश्रण पर लागू होता है, रसायन के अनुपान पर नहीं, जहाँ दोनों असमान मात्रा में लिए जाते हैं।
मात्रा अलग-अलग क्यों है, इसका कारण भी साफ़ है: हर फल यहाँ अलग काम कर रहा है। खाली पेट ली गई एक हरीतकी सुबह की अपान वायु, यानी नीचे की दिशा में चलने वाली वात, पर काम करती है और मल की सहज निकासी को सहारा देने वाली मानी जाती है। एक ही फल इसलिए, क्योंकि हरीतकी उष्ण वीर्य वाली और तीखी मानी गई है; अधिक मात्रा अपान को अनावश्यक रूप से सक्रिय कर सकती है।
भोजन के बाद ली गई दो बिभीतकी खाने के बाद बढ़ने वाले कफ को संतुलित करती हैं। और चार आँवले इस योग का मुख्य रसायन-भार उठाते हैं — शीतल, पोषक और ओज को धीरे-धीरे बनाने वाला हिस्सा।
चरक का यह योग मानकर चलता है कि आपके आसपास हरीतकी, बिभीतकी और आँवले के पेड़ हैं। आज ज़्यादातर घरों में ऐसा नहीं है। शार्ङ्गधर संहिता के मध्यम खंड में दर्ज परंपरागत समाधान यही है कि साबुत फलों की मात्रा को उसी 1:2:4 अनुपात में चूर्ण की मात्रा में बदल लिया जाए। आमतौर पर सुझाई जाने वाली मात्रा 3 से 6 ग्राम त्रिफला चूर्ण है, रात में एक बार गुनगुने पानी के साथ — या पूरे शास्त्रीय रूप के लिए एक चम्मच शहद और एक चम्मच घी के साथ — और यह क्रम पूरे एक वर्ष तक।
आज के घर के लिए व्यावहारिक तरीका
त्रिफला चूर्ण रात में सोने से पहले, गुनगुने पानी में घोलकर लें। इसी समय हरीतकी का अनुलोमन वाला काम सुबह की निकासी को सहारा देने वाला माना जाता है। पानी गुनगुना या सामान्य तापमान का बेहतर माना जाता है, और दूध या दूध से बनी चीज़ों के एक घंटे के भीतर इसे लेने से बचने की सलाह दी जाती है।

दूसरा योग: लोहे के पात्र वाला त्रिफला — लौह-त्रिफला (चि. 1.3#43–44)
दूसरा योग रस-शास्त्र की तरफ़ झुका हुआ है और भारतीय चिकित्सा में लोहे के सबसे पुराने दर्ज उपयोगों में गिना जाता है। चरक इसे पहले योग जैसा ही उद्देश्य देते हैं, पर तैयारी अधिक सघन है।
मूल श्लोक का भाव — चरक संहिता, चिकित्सा स्थान 1.3#43–44
“इससे मनुष्य सौ वर्ष तक जरा से रहित और स्वस्थ जीवन जीता है। विधि — एक नए लोहे के पात्र पर त्रिफला का कल्क (गाढ़ा लेप) चढ़ाएँ। इसे चौबीस घंटे रहने दें। फिर उस लेप को इकट्ठा करें और शहद-जल में घोलकर लें। औषधि पच जाने के बाद घी से भरपूर भोजन करें। यह क्रम एक वर्ष तक चले।”
यहाँ तीन बातें एक साथ हो रही हैं। पहली — नया लोहे का पात्र धीरे-धीरे छूटने वाले लोहे का स्रोत बनता है; परंपरा में माना जाता है कि आँवले की हल्की खटास चौबीस घंटे में पात्र से लोहे की बहुत सूक्ष्म मात्रा घोल लेती है। आगे चलकर शास्त्र ने इसी दिशा में लौह भस्म विकसित की।
दूसरी — इस ठहराव में हरीतकी और आँवले के घटक लोहे के साथ मिलकर ऐसा रूप बनाते हैं जो शुद्ध लोहे की तुलना में पेट पर अधिक सौम्य और शरीर के लिए अधिक ग्रहणीय माना जाता है। तीसरी — बाद का घी-युक्त भोजन वह स्निग्ध आधार देता है, जिसे परंपरा में इस योग के लिए उपयुक्त माना गया है।
चरक विशेष रूप से “नव लौह पट्ट” कहते हैं, यानी नया लोहे का पात्र। कारण सीधा है: नए पात्र की सतह पर पुरानी परत, जंग और रसोई की अशुद्धियाँ नहीं होतीं, इसलिए लेप में उतरने वाला लोहा साफ़ रहता है। पुराने समय में यह हाथ से पीटा हुआ, बिना किसी परत वाला लोहे का पत्तर होता था; आज शास्त्रीय फार्मेसियाँ ताज़ा गढ़ा हुआ या खाद्य-श्रेणी का साफ़ लोहे का पात्र इस्तेमाल करती हैं।
तैयार लेप की पारंपरिक मात्रा व्यक्ति के बल के अनुसार लगभग 5 से 10 ग्राम बताई जाती है — सुबह खाली पेट, लगभग 100 मिलीलीटर गुनगुने शहद-जल में घोलकर, और यह क्रम एक वर्ष तक। टीकाकार इसे शिशिर ऋतु यानी देर सर्दी में शुरू करने की सलाह देते हैं, ताकि इसका प्रभाव वसंत में उस समय पूरा हो जब शरीर में कफ स्वाभाविक रूप से बढ़ता है।
यह घर पर करने वाला प्रयोग नहीं है। लौह-त्रिफला शास्त्रीय फार्मेसी की तैयारी है। इसे किसी लाइसेंस प्राप्त शास्त्रीय आयुर्वेदिक फार्मेसी से ही लें, जहाँ यह परंपरागत विधि से बनती हो। किसी भी लोहे के टुकड़े पर इसे घर में बनाने की कोशिश न करें — लोहे का स्रोत खाद्य-श्रेणी का होना चाहिए और तैयारी निगरानी में होनी चाहिए। शरीर में लोहे की अधिकता से जुड़ी स्थिति, थैलेसीमिया या गर्भावस्था में लोहे वाला कोई भी रसायन वैद्य की देखरेख के बिना न लें।

तीसरा और चौथा योग: मेधा के लिए मधुक-तुगाक्षीरी-पिप्पली, और सरल त्रिफला-खांड (चि. 1.3#45)
तीसरा योग चार द्रव्यों का है और पाँचों में अकेला ऐसा है जिसमें त्रिफला के साथ नाम लेकर दूसरी जड़ी-बूटियाँ जोड़ी गई हैं। इसका उद्देश्य मेधा (बुद्धि), स्मृति और बल बताया गया है।
मूल श्लोक का भाव — चरक संहिता, चिकित्सा स्थान 1.3#45
“यह मेधा, स्मृति और बल देता है, आयु तथा उत्कर्ष को बढ़ाता है और जरा को शांत करता है — त्रिफला + मधुक, तुगाक्षीरी, पिप्पली + शहद, घी।”
मधुक (यष्टिमधु, मुलेठी) — रस मधुर, वीर्य शीत, गुण गुरु। इसे चक्षुष्य, वृष्य और कंठ्य (स्वर के लिए हितकर) कहा गया है, और शास्त्र की मेध्य औषधियों में गिना जाता है। इस योग में इसका काम त्रिफला के तीनों फलों के रूखेपन को संतुलित करना है।
तुगाक्षीरी (वंशलोचन) — बाँस की गाँठों से निकलने वाला हल्का चाँदी जैसा दानेदार पदार्थ। भावप्रकाश निघण्टु में इसे शीत वीर्य, चक्षुष्य और रक्त-स्राव को थामने वाला (रक्तस्तंभक) बताया गया है। इस योग में यह शीतल, मधुर और खनिज-युक्त आधार देता है।
पिप्पली (छोटी पीपल) — रस कटु, वीर्य उष्ण, विपाक मधुर। यह भी शास्त्र की मेध्य औषधियों में है — ब्राह्मी, मंडूकपर्णी, शंखपुष्पी, यष्टिमधु और ज्योतिष्मती के साथ। यहाँ इसका काम दीपन का है और योगवाही का, यानी बाकी द्रव्यों को गहरे धातुओं तक पहुँचाने वाले वाहक का।
इस योग का रस-संतुलन देखने लायक है। त्रिफला के तीन फल कषाय, मधुर, अम्ल, तिक्त और कटु — पाँच रस लाते हैं। मधुक मधुर जोड़ता है, तुगाक्षीरी मधुर के साथ शीतलता, पिप्पली बचा हुआ कटु, शहद मधुर और कषाय, तथा घी मधुर के साथ स्निग्ध आधार। यही कारण है कि टीकाकार मेधा के इस त्रिफला रसायन को पंचविध कल्पना कहते हैं।
पारंपरिक मात्रा लगभग 3 ग्राम त्रिफला चूर्ण, 1 ग्राम यष्टिमधु चूर्ण, 1 ग्राम वंशलोचन और 0.5 ग्राम पिप्पली चूर्ण है — अच्छी तरह मिलाकर, एक चम्मच शहद और एक चम्मच गाय के घी के साथ, दिन में एक बार सुबह खाली पेट, एक वर्ष तक। आयुर्वेद महाविद्यालयों की परंपरा में इसे मुख्य मेध्य रसायनों में गिना जाता है — लंबी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों और बड़ी उम्र में स्मरण-शक्ति से जुड़ी शिकायतों के प्रसंग में।
चौथा योग इसी श्लोक 45 के दूसरे हिस्से में है और पूरे अध्याय का सबसे सरल योग है — त्रिफला और खांड, शहद-घी के साथ, एक वर्ष तक। यह सरलता जानबूझकर रखी गई लगती है: चरक इसे चार द्रव्यों वाले मेध्य योग के ठीक बगल में रखते हैं, ताकि जो लोग जटिल योग नहीं जुटा सकते या जिन्हें वे सहज नहीं पड़ते — जैसे कम जठराग्नि वाले बुज़ुर्ग — उनके पास भी एक रास्ता रहे।
खांड यहाँ तीन काम करती है। पहला, मधुर रस और शीत वीर्य वाली खांड कोरे त्रिफला चूर्ण के तीखे कषाय स्वाद को रोज़ लेने लायक बनाती है; कोरा चूर्ण कई लोगों को लंबे समय तक लेना सहज नहीं लगता। दूसरा, यह हरीतकी और बिभीतकी के उष्ण-रूक्ष झुकाव के सामने मधुर, शीतल और बल देने तथा पोषण करने वाला (बल्य-बृंहण) पक्ष रखती है। तीसरा, पूरे योग का मधुर विपाक समय के साथ ओज बनने में सहारा माना जाता है।
पारंपरिक मात्रा लगभग 3 से 5 ग्राम त्रिफला चूर्ण के साथ 5 से 10 ग्राम खांड है — एक चम्मच शहद और एक चम्मच गाय के घी के साथ, सुबह खाली पेट, दिन में एक बार, एक वर्ष तक। आज के घर के लिए यह रूप सहज है: न ताज़े फल चाहिए, न लोहे का पात्र, न तीन अलग जड़ी-बूटियाँ। शुरुआत के लिए आम तौर पर यही योग सुझाया जाता है।
खांड कौन-सी लें
जैविक खांड — वही हल्के सुनहरे रंग की, कम संसाधित गन्ने की चीनी जो आयुर्वेदिक दुकानों में मिलती है। सफ़ेद रिफ़ाइंड चीनी नहीं, और रिफ़ाइंड गुड़ भी नहीं। खांड में वे सूक्ष्म खनिज और वह शीत वीर्य बचा रहता है जिस पर पुराने वैद्य भरोसा करते थे; रिफ़ाइंड चीनी को शास्त्रीय भाषा में उष्ण वीर्य माना गया है, जो इस योग की शीतल मंशा के उलट पड़ता है।

पाँचवां योग: धातु, विडंग और लवण वाले तीन संयोग (चि. 1.3#46–47)
आख़िरी हिस्सा श्लोक 46 और 47 में तीन उप-योगों के रूप में आता है। तीनों में त्रिफला के साथ एक मुख्य द्रव्य जुड़ता है, तीनों शहद और घी के साथ एक वर्ष तक लिए जाते हैं, और तीनों का उद्देश्य एक ही बताया गया है — मेधा, स्मृति, बल और आयु। फ़र्क़ इस बात का है कि कौन-सा योग किस तरह के व्यक्ति के लिए रखा गया है।
त्रिफला + छह धातुएँ (स्वर्ण सहित) और वचा — यह इस श्रृंखला का सबसे उन्नत योग है। इसमें छह धातु-भस्में आती हैं — स्वर्ण, रजत, ताम्र, लौह, नाग और वंग — जो शास्त्रीय विधि से ही बनाई जाती हैं, और साथ में वचा, जिसे मेध्य तथा वाक्-शुद्धि से जोड़ा जाता है। पारंपरिक मात्रा लगभग 100 से 250 मिलीग्राम बताई जाती है, दिन में एक बार, शहद और घी के साथ, एक वर्ष तक। यह योग केवल लाइसेंस प्राप्त शास्त्रीय फार्मेसी से और वैद्य की देखरेख में ही लिया जाता है।
त्रिफला + विडंग + पिप्पली — विडंग को शास्त्र में कृमि से जुड़े प्रसंगों का मुख्य द्रव्य माना गया है; चरक विमान स्थान में कृमि के सात प्रकारों के साथ इसका विस्तृत उल्लेख है। त्रिफला और पिप्पली के साथ यह योग वैद्य लंबे रसायन-क्रम से पहले शोधन यानी सफ़ाई के चरण के रूप में सुझाते हैं। पारंपरिक मात्रा लगभग 2 ग्राम त्रिफला चूर्ण, 1 ग्राम विडंग चूर्ण और 0.5 ग्राम पिप्पली चूर्ण है, शहद-घी के साथ, दिन में एक बार — और यह पूरे वर्ष नहीं, 30 से 60 दिन के क्रम के लिए।
त्रिफला + सैंधव लवण — तीनों में सबसे सरल। इसमें त्रिफला के साथ बहुत थोड़ा सैंधव लवण मिलाया जाता है — वही नमक जिसे आयुर्वेद तीनों दोषों के लिए संतुलित मानता है। सैंधव इस योग के दीपन पक्ष को तेज़ करता है, इसलिए इसे कम जठराग्नि, धीमे पाचन और भोजन के बाद कफ की भारी अनुभूति वाले बुज़ुर्गों के लिए उपयुक्त बताया गया है। पारंपरिक मात्रा लगभग 3 ग्राम त्रिफला चूर्ण के साथ एक छोटी चुटकी, यानी लगभग 0.25 ग्राम सैंधव है, गुनगुने पानी या शहद-घी के साथ, दिन में एक बार, एक वर्ष तक।
पाँच योग एक साथ देने के पीछे की सोच यही है कि आयुर्वेद व्यक्ति देखकर चलता है। परीक्षा की तैयारी करते पच्चीस साल के विद्यार्थी और कम अग्नि तथा भूलने की शिकायत वाले पैंसठ साल के व्यक्ति के लिए एक ही योग नहीं रखा जा सकता। सात श्लोकों में पाँच योग देकर चरक वैद्य को चुनने की जगह देते हैं:
- सामान्य घरेलू दिनचर्या के लिए — रोज़ का 1+2+4 वाला योग (चि. 1.3#41–42) या त्रिफला-खांड (चि. 1.3#45)।
- विद्यार्थी या स्मृति पर ध्यान देने वालों के लिए — मधुक, तुगाक्षीरी और पिप्पली वाला मेध्य योग (चि. 1.3#45)।
- लोहे के साथ गहरे रसायन के लिए — लौह-त्रिफला (चि. 1.3#43–44), वैद्य की देखरेख में।
- धातु-आधारित उन्नत क्रम के लिए — स्वर्ण सहित धातु वाला योग (चि. 1.3#46), शास्त्रीय फार्मेसी से।
- लंबे रसायन से पहले शोधन के लिए — त्रिफला + विडंग + पिप्पली (चि. 1.3#46), 30 से 60 दिन।
- कम अग्नि वाले बुज़ुर्गों के लिए — त्रिफला + सैंधव लवण (चि. 1.3#47)।
अनुपान और मात्रा: उत्तम, मध्यम और हीन बल के अनुसार
अनुपान — यानी वह माध्यम जिसके साथ औषधि ली जाती है — पर ध्यान अक्सर सबसे कम जाता है। चरक और सुश्रुत दोनों बार-बार कहते हैं कि एक ही द्रव्य अलग-अलग अनुपान के साथ अलग तरह से काम करता है। चि. 1.3 के त्रिफला रसायन इसी सोच पर बने हैं, और उनकी मात्रा व्यक्ति के बल के अनुसार तीन श्रेणियों में बँटती है।
उत्तम बल — पूरी पारंपरिक मात्रा; त्रिफला ताज़े कल्क यानी गाढ़े लेप के रूप में; अनुपान में शहद और घी दोनों।
मध्यम बल — मध्यम मात्रा; त्रिफला क्वाथ के रूप में; अनुपान में गुनगुना दूध या गुनगुना शहद-जल।
हीन बल — कम मात्रा; त्रिफला सूखे चूर्ण के रूप में; अनुपान में गुनगुना पानी या गुनगुना मसाला-दूध।
यही तीन-स्तरीय व्यवस्था चरक ने त्रिफला वाले खंड से ठीक पहले पिप्पली-वर्धमान रसायन (चि. 1.3#36–40) में भी रखी है, जहाँ उन्नीस दिन के बढ़ते-घटते क्रम में पिप्पली की संख्या उत्तम बल के लिए 1000 फलों से लेकर हीन बल के लिए 350 फलों तक जाती है। सिद्धांत वही है — अधिक बल वाला व्यक्ति अधिक सघन रूप पचा सकता है, और कम बल वाले को वही चीज़ अधिक पचने योग्य रूप में, यानी चूर्ण और पानी के साथ दी जाती है।
चरक के हर त्रिफला रसायन में शहद और घी, दोनों का अनुपान साथ दिया गया है — यही इस खंड की ख़ास बात है। टीकाकार इसके लिए मात्रा का अनुपात भी बताते हैं — दो भाग शहद और एक भाग घी — और यही असमानता उस विरुद्ध नियम को लागू नहीं होने देती।
कारण भी दिया गया है: शहद योगवाही है, यानी औषधि को गहरे तक पहुँचाने वाला वाहक, और कफ को संतुलित करने वाला तथा चक्षुष्य; घी स्नेह है, रसायन और मेध्य। परंपरा में माना जाता है कि दोनों मिलकर त्रिफला के पानी में घुलने वाले और वसा में घुलने वाले, दोनों तरह के अंशों तक पहुँच बनाते हैं।
शहद कभी गर्म करके न लें — शास्त्र में गर्म किया हुआ शहद उपयुक्त नहीं माना गया। रसायन के लिए कच्चा जंगली शहद और गाय का शुद्ध घी ही लिया जाता है।

रसायन की शर्त: चरक के पथ्य-अपथ्य (चि. 1.3#7–8)
योगों की सूची देने से पहले चरक एक शर्त रखते हैं, और यह शर्त आज की चर्चा में अक्सर छूट जाती है।
मूल श्लोक का भाव — चरक संहिता, चिकित्सा स्थान 1.3#7–8
“प्राचीन काल में ऋषियों ने तप, ब्रह्मचर्य, ध्यान और चित्त की शांति के कारण, समय पर तथा विधिपूर्वक रसायन का प्रयोग करके स्थिर आयु पाई — क्योंकि जो लोग असावधान हैं, दूसरे कामों में उलझे हैं और सामान्य ग्राम-जीवन में रहते हैं, उनमें रसायन सफल नहीं होता।”
यह सीधा कथन है। चरक कह रहे हैं कि रसायन का उद्देश्य सहायक दिनचर्या के बिना पूरा नहीं होता। देर रात जागना, डिब्बाबंद भोजन, शराब, दबी हुई भावनाएँ और आचरण की कोई व्यवस्था न होना — इनके बीच रखा हुआ त्रिफला का डिब्बा वह नहीं कर सकता, जिसकी बात श्लोक करते हैं।
शास्त्र दो तरह की व्यवस्था बताता है — कुटी-प्रावेशिक, जिसमें साधक पूरे क्रम के लिए एक अलग रसायन शाला में रहता है, और वाततापिक, जिसमें व्यक्ति सामान्य जीवन जारी रखता है पर पूरे समय कुछ तय पथ्य नियमों का पालन करता है।
पथ्य — क्या करें
- रोज़ अभ्यंग — स्नान से पहले गुनगुने तिल तेल की मालिश।
- ब्रह्म मुहूर्त में उठना — सूर्योदय से पहले, लगभग 4:30 से 5:00 बजे।
- सात्त्विक आहार — ताज़ा पका शाकाहारी भोजन, बासी और खमीर वाली चीज़ों से दूरी, सीमित मात्रा।
- रोज़ घी — पके भोजन के साथ एक से दो चम्मच गाय का शुद्ध घी।
- ध्यान और प्राणायाम — सुबह और शाम का संध्या-अभ्यास।
- रात 10 बजे से पहले नींद।
अपथ्य — किनसे दूरी
- शराब और तंबाकू।
- देर रात भोजन करना और देर रात तक स्क्रीन देखना।
- क्रोध, ईर्ष्या और चिंता — चरक इन्हें मानसिक दोष कहकर रसायन को निष्फल करने वाले बताते हैं।
- अति मैथुन — यहाँ ब्रह्मचर्य का शास्त्रीय अर्थ संयम है, जीवन-अवस्था के अनुसार।
- अत्यधिक यात्रा, अत्यधिक श्रम और प्राकृतिक वेगों को रोकना।
अगर आप कम से कम वाततापिक स्तर की दिनचर्या नहीं निभा सकते, तो शास्त्र की दृष्टि से बेहतर यही है कि त्रिफला को वर्ष भर के रसायन के रूप में नहीं, बल्कि रोज़ के पाचक चूर्ण के रूप में लिया जाए — उसके अनुलोमन और दीपन वाले काम के लिए। रसायन का उद्देश्य अपनी सहायक दिनचर्या से बँधा हुआ है; अकेले चूर्ण के डिब्बे से बड़े वादे करने वाली बातों को शास्त्र का समर्थन नहीं माना जाता।
यह लेख शास्त्रीय संदर्भ और परंपरागत जानकारी के लिए है। अगर आपकी कोई स्वास्थ्य स्थिति चल रही है, आप नियमित दवाइयाँ ले रहे हैं, गर्भवती हैं या स्तनपान करा रही हैं, या बात बच्चों की है, तो त्रिफला या कोई भी रसायन शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर या योग्य वैद्य से सलाह ज़रूर लें। लंबे समय तक चलने वाली दवाइयों — जैसे थायरॉइड की दवा — और त्रिफला के बीच कम से कम चार घंटे का अंतर रखने की बात कही जाती है।
आज की दिनचर्या में त्रिफला की परंपरा कैसे उतारें
इस परंपरा में शामिल होने के लिए लोहे का पात्र या पूरे वर्ष का कठोर क्रम ही चाहिए, ऐसा नहीं है। शुरुआत रोज़ के छोटे हिस्सों से भी हो सकती है, और उन्हीं में यह परंपरा सहज तरीक़े से चलती रहती है।
सुबह की शुरुआत मुख-शुद्धि से होती है। किसी भी त्रिदोषहर दंतमंजन में त्रिफला एक पारंपरिक आधार-घटक माना जाता है — इसके कषाय गुण और सुश्रुत चिकित्सा स्थान में मुख-रोग के प्रसंग में बताई गई दंत्य प्रतिष्ठा के कारण। हमारे आयुर्वेदिक दंतमंजन में त्रिफला इसी परंपरा से आता है। ब्रश करने के बाद ठंडे पानी में चुटकी भर त्रिफला मिलाकर आँखों पर छींटे देने की बात सुश्रुत उत्तर तंत्र के नेत्र-प्रसंग में नेत्र-प्रक्षालन के रूप में मिलती है।
दिन के पहले हिस्से में रसायन का भार आँवले से आता है। च्यवनप्राश शास्त्र में सबसे अधिक उद्धृत रसायनों में गिना जाता है और उसका मुख्य आधार आँवला ही है — वही फल जो त्रिफला में चार गुना मात्रा में आता है। हमारा च्यवनप्राश धीमी आँच पर पके आँवले के आधार पर, गाय के घी और शहद के माध्यम में, सहायक जड़ी-बूटियों के क्वाथ के साथ बनता है। एक चम्मच गुनगुने दूध के साथ लेने पर ताज़े फल जुटाए बिना भी आँवले वाला हिस्सा दिनचर्या में शामिल रखा जा सकता है।
रात के लिए वही पारंपरिक मात्रा है, जो ऊपर बताई गई है। साथ में वाततापिक जैसी सहज दिनचर्या हो, तो चरक की त्रिफला रसायन परंपरा में यही सबसे सहज घरेलू भागीदारी मानी जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
त्रिफला रसायन क्या है और यह कहाँ लिखा है (kaha likha hai)? +
त्रिफला रसायन हरीतकी, बिभीतकी और आमलकी (आँवला) से बना पारंपरिक रसायन योग है। इसका सबसे प्रामाणिक संदर्भ चरक संहिता, चिकित्सा स्थान, अध्याय 1, पाद 3 के श्लोक 41 से 47 हैं — जहाँ आचार्य चरक सात श्लोकों में त्रिफला रसायन के पाँच अलग-अलग योग गिनाते हैं: रोज़ के 1+2+4 ताज़े फल शहद-घी के साथ, लोहे के पात्र वाला लौह-त्रिफला, मधुक-तुगाक्षीरी-पिप्पली वाला मेध्य योग, त्रिफला-खांड, और धातु, विडंग तथा लवण वाले तीन संयोग।
त्रिफला रसायन बनाने की विधि क्या है — घर में सबसे सरल रूप कौन-सा है? +
घर के लिए सबसे सरल रूप चरक का चौथा योग है (चि. 1.3#45): लगभग 3 से 5 ग्राम त्रिफला चूर्ण 1:2:4 अनुपात में लें, उसमें 5 से 10 ग्राम जैविक खांड मिलाएँ, और एक चम्मच शहद तथा एक चम्मच गाय के घी के साथ सुबह खाली पेट लें। पहले योग वाला रूप रात में लिया जाता है — 3 से 6 ग्राम चूर्ण गुनगुने पानी में। शास्त्र में यह क्रम पूरे एक वर्ष का बताया गया है। लौह-त्रिफला घर पर बनाने की चीज़ नहीं है।
त्रिफला का सही अनुपात क्या है (triphala ratio according to ayurveda)? +
1 भाग हरीतकी, 2 भाग बिभीतकी और 4 भाग आँवला — वज़न के हिसाब से। यह अनुपात भावप्रकाश निघण्टु के हरीतक्यादि वर्ग में मिलता है और चरक तथा शार्ङ्गधर संहिता में भी यही झलकता है। चरक के पहले योग में यह गिनती साबुत फलों की है — 1 हरीतकी, 2 बिभीतकी और 4 आँवले। बाज़ार में मिलने वाले कई चूर्ण लागत के कारण 1:1:1 में बनते हैं, इसलिए लेबल देखकर लेना बेहतर है।
त्रिफला रसायन का श्लोक कहाँ मिलेगा (triphala shloka / rasayan shloka)? +
पाँचों योग चरक संहिता के चिकित्सा स्थान, अध्याय 1, पाद 3 में श्लोक 41 से 47 तक हैं। विद्वान इसे संक्षेप में चि. 1.3#41–47 लिखते हैं। श्लोक 41–42 में रोज़ का 1+2+4 योग है, 43–44 में लौह-त्रिफला, 45 में मेध्य योग और त्रिफला-खांड, तथा 46–47 में धातु, विडंग-पिप्पली और लवण वाले तीन संयोग। रसायन की शर्त बताने वाला श्लोक इसी पाद का 7–8 है।
त्रिफला रसायन और साधारण त्रिफला चूर्ण में क्या अंतर है? +
अंतर द्रव्य का नहीं, क्रम और उद्देश्य का है। साधारण त्रिफला चूर्ण कुछ दिनों या हफ़्तों के लिए पाचन के सहारे के रूप में लिया जाता है — इसके अनुलोमन और दीपन वाले काम के लिए। त्रिफला रसायन वही चूर्ण या उसके रूप हैं, पर पूरे एक वर्ष तक और उस वाततापिक जीवनशैली के साथ जिसे चरक चि. 1.3#7–8 में शर्त की तरह रखते हैं। शास्त्र के अनुसार रसायन वाला उद्देश्य इसी लंबे क्रम और सहायक दिनचर्या से जुड़ा है।
आमलकी, बिभीतकी और हरीतकी — तीनों फल क्या-क्या करते हैं (amalaki vibhitaki & haritaki benefits in hindi)? +
हरीतकी — कषाय प्रधान, उष्ण वीर्य; इसे दीपन, पाचन और अनुलोमन से जोड़ा जाता है, विशेषकर वात पर। बिभीतकी — कषाय, उष्ण वीर्य; मुख्यतः कफ और पित्त को संतुलित करने वाली मानी जाती है, और इसका पर्याय 'अक्ष' नेत्रों से जुड़ी इसकी शास्त्रीय प्रतिष्ठा दिखाता है। आँवला — पंच रस, अम्ल प्रधान, और तीनों में अकेला शीत वीर्य वाला फल; इसे रसायन, चक्षुष्य तथा केश्य कहा गया है और त्रिफला में यह चार गुना मात्रा में आता है।
त्रिफला रसायन किन्हें नहीं लेना चाहिए, और दवाइयों के साथ क्या ध्यान रखें? +
गर्भावस्था और स्तनपान में, पतले दस्त या पेचिश की स्थिति में, और पेट या आँत में सक्रिय ज़ख़्म से जुड़ी शिकायत में इसे वैद्य की सलाह के बिना नहीं लिया जाता — हरीतकी उष्ण वीर्य और अनुलोमन वाली मानी जाती है। शरीर में लोहे की अधिकता से जुड़ी स्थिति या थैलेसीमिया में लौह-त्रिफला वाला रूप नहीं लिया जाता। लोहे की गोलियाँ, ख़ून पतला करने वाली दवाइयाँ या थायरॉइड की दवा लेने वालों को अपने डॉक्टर और वैद्य दोनों से बात करनी चाहिए; थायरॉइड की दवा और त्रिफला के बीच कम से कम चार घंटे का अंतर रखने की सलाह दी जाती है।