सुश्रुत संहिता आयुर्वेद का एक प्राचीन ग्रंथ है, जो लगभग 2,300 से 2,600 साल पुराना माना जाता है। इसके छह स्थानों और 184 अध्यायों में 300 से अधिक शल्य प्रक्रियाएँ, 120 यंत्र और त्रिदोष सिद्धांत का मूल रूप दर्ज है। यह लेख उसी ग्रंथ का सरल हिंदी परिचय है — यह क्या है, कब लिखी गई और आज इसे किस नज़र से देखा जाता है।
पढ़ने का समय: 14 मिनट
Read this article in English: Sushruta Samhita: India's 2,500-Year-Old Surgical Text That Shaped Modern Medicine
- सुश्रुत संहिता क्या है — संक्षिप्त परिचय
- सुश्रुत संहिता कब लिखी गई और सुश्रुत कौन थे
- शरीर स्थान: शरीर-रचना का पहला विस्तृत विवरण
- 300 से अधिक शल्य प्रक्रियाएँ और 120 यंत्र
- त्रिदोष और चार ह्यूमर का अंतर
- आयुर्वेद यानी जीवन का विज्ञान
- आज का शोध इसे किस नज़र से देखता है
- सुश्रुत की दृष्टि को आज की दिनचर्या में कैसे अपनाएँ
- अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Adbhut Ghrit 10ml (Pack of 5) — ₹300.00
इस विषय से जुड़ा हमारा प्रोडक्ट — पूरी सामग्री और उपयोग का तरीक़ा प्रोडक्ट पेज पर।
प्रोडक्ट देखें →सुश्रुत संहिता क्या है — संक्षिप्त परिचय

सुश्रुत संहिता को आयुर्वेद के तीन आधार-ग्रंथों में गिना जाता है — चरक संहिता और अष्टांग हृदय के साथ। तीनों की अपनी-अपनी पहचान मानी जाती है: चरक को शरीर के भीतरी रोगों की चिकित्सा का प्रमुख नाम, वाग्भट को अलग-अलग परंपराओं को एक जगह समेटने वाला संग्रहकर्ता, और सुश्रुत को शल्य चिकित्सा, शरीर-रचना तथा चोट-प्रबंधन का प्रमुख नाम।
यह घरेलू नुस्ख़ों की किताब नहीं, बल्कि कई खंडों में फैला एक व्यवस्थित चिकित्सा-कोश है, जो पाठक से भौतिकी, दर्शन, नीति और संस्कृत व्याकरण की पहले से समझ की अपेक्षा रखता है। पूरा ग्रंथ छह स्थानों और 184 अध्यायों में बँटा है:
- सूत्र स्थान — मूल सिद्धांत, बुनियादी बातें और शल्य चिकित्सा का परिचय।
- निदान स्थान — प्रमुख रोगों की पहचान और उनके कारणों का विवेचन।
- शरीर स्थान — शरीर-रचना, शरीर-क्रिया, गर्भ-विज्ञान और प्रसव-विद्या।
- चिकित्सा स्थान — चिकित्सा से जुड़े सिद्धांत, विशेष रूप से शल्य-प्रबंधन।
- कल्प स्थान — विष और विष-विज्ञान।
- उत्तर तंत्र — विशेष शाखाएँ — नेत्र, नाक-कान-गला, बाल-चिकित्सा और मानसिक स्वास्थ्य।
आज भी सबसे ज़्यादा उद्धृत अंग्रेज़ी अनुवाद कविराज कुंजलाल भिषग्रत्न और उनके सहयोगियों का है। दूसरे खंड की भूमिका में वे लिखते हैं कि आयुर्वेद को केवल अनुभव-आधारित कहकर ख़ारिज करने वालों ने मूल संस्कृत पढ़ी ही नहीं। इस पद्धति की अपनी शरीर-रचना है, अपना शरीर-क्रिया विज्ञान है और अपना रोग-विज्ञान — और तीनों आपस में जुड़े हुए हैं।
आज इसका क्या अर्थ है: घर में घाव पर हल्दी, पाचन के लिए घी और जोड़ों के लिए तेल — ये सब जिस परंपरा से आते हैं, उसे क्रमबद्ध रूप सुश्रुत जैसे आचार्यों ने ही दिया था। भारतीय घरों की रोज़मर्रा की देखभाल की जड़ें इन्हीं ग्रंथों में मानी जाती हैं।
सुश्रुत संहिता कब लिखी गई और सुश्रुत कौन थे

सुश्रुत प्राचीन वाराणसी में रहते थे, और अधिकतर विद्वान उनका समय ईसा पूर्व छठी से तीसरी शताब्दी के बीच मानते हैं। इस हिसाब से यह ग्रंथ लगभग 2,300 से 2,600 साल पुराना ठहरता है, यानी हिप्पोक्रेटिक कॉर्पस से कम से कम एक, संभवतः दो शताब्दी पहले का।
परंपरा कहती है कि सुश्रुत दिवोदास के शिष्य थे, और दिवोदास को भारतीय परंपरा में वैद्यों के देव धन्वंतरि का ही स्वरूप माना गया है। पर सुश्रुत केवल सुनी हुई बात के वाहक नहीं थे। उन्होंने उस ज्ञान को क्रम दिया, परखा, शव और लौकी जैसे नमूनों पर छात्रों को सिखाया, और अंत में उसे एक पूरे ग्रंथ की शक्ल दी।
आज मेलबर्न में Royal Australasian College of Surgeons के मुख्यालय में उनकी प्रतिमा लगी है, जिस पर लिखा है — The Father of Surgery। भारत के मेडिकल कॉलेजों में शैक्षणिक समारोह उनके नाम के स्मरण से शुरू होते हैं।
ग्रंथ संस्कृत में ताड़-पत्र पांडुलिपियों पर सुरक्षित रहा और गुरु-शिष्य परंपरा से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहा; छपे हुए संस्करण 19वीं सदी में सामने आए। फिर भी उनका लिखा हुआ आम पाठक तक कम ही पहुँचा है।
शरीर स्थान: शरीर-रचना का पहला विस्तृत विवरण
इस ग्रंथ की एक ख़ास बात यह है कि यह शरीर को सीधे देखकर समझने पर ज़ोर देता है। सुश्रुत छात्रों से कहते हैं कि ठीक से संरक्षित शव का सावधानी से विच्छेदन करके शरीर की बनावट सीखी जाए। मध्यकाल में दुनिया के बड़े हिस्से में यह अभ्यास धार्मिक कारणों से छोड़ दिया गया था, और यूरोप में यह हज़ार साल से भी ज़्यादा बाद लौटा।
शरीर स्थान में जिन बातों का वर्णन मिलता है:
- सप्तधातु — रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र, यानी शरीर के सात धातु।
- शरीर की गिनती — हड्डियों, संधियों, स्नायुओं, वाहिकाओं और नाड़ियों की संख्या।
- गर्भ का विकास — गर्भाधान से जन्म तक, महीने-दर-महीने।
- गर्भवती और प्रसूता की देखभाल — गर्भावस्था और प्रसव के बाद की चर्या।
- नवजात शिशु — शिशु का पालन और आहार।
- मर्म बिंदु — शरीर के वे संवेदनशील बिंदु, जिनसे शल्य-क्रिया के समय बचना ज़रूरी माना गया।
ध्यान देने वाली बात यह है कि प्रसव-विद्या और शिशु-देखभाल को शरीर-रचना वाले भाग में ही रखा गया। सुश्रुत की दृष्टि में जीवन पहली रुलाई से नहीं, गर्भाधान से शुरू होता है — इसलिए चिकित्सा-शिक्षा में शरीर की बनावट और उस शरीर के बनने की यात्रा, दोनों शामिल होनी चाहिए। आधुनिक प्रसूति-विज्ञान भी एक तरह से इसी दृष्टि की ओर लौटता हुआ दिखाई देता है।
शास्त्रीय आयुर्वेद गर्भवती स्त्रियों, नई माताओं और शिशुओं के लिए इतनी विस्तृत सलाह क्यों देता है — तेल मालिश से लेकर स्तनपान की मुद्रा और ऊपरी आहार तक — इसका कारण यही माना जाता है कि इस परंपरा ने शरीर-रचना और जीवन को कभी अलग-अलग नहीं देखा।
300 से अधिक शल्य प्रक्रियाएँ और 120 यंत्र

सुश्रुत की पहचान सबसे अधिक शल्य चिकित्सा से जुड़ी रही है। उनकी संहिता में 120 अलग-अलग यंत्रों की मदद से की जाने वाली 300 से अधिक शल्य प्रक्रियाओं का वर्णन है, और इनमें से कई का बुनियादी ढाँचा आज की शल्य चिकित्सा में भी पहचाना जा सकता है।
- नासा-संधान (राइनोप्लास्टी) — कटी हुई नाक को गाल या माथे की त्वचा से फिर से बनाना। यह तकनीक इतनी उपयोगी मानी गई कि 18वीं सदी में ब्रिटिश शल्य-चिकित्सक इसे सीखने भारत आए, जहाँ कुम्हार समुदाय के लोग इसे तब भी कर रहे थे। आज यह दुनिया भर की शल्य-पद्धति का हिस्सा है।
- मोतियाबिंद की शल्य-क्रिया — घुमावदार सुई से धुँधले लेंस को उसकी जगह से खिसकाने की विधि, जो भारत में आधुनिक काल तक चलती रही और जिसे बाद की मोतियाबिंद शल्य-क्रियाओं का दर्ज इतिहास में ज्ञात पूर्वज माना जाता है।
- कठिन प्रसव की विधियाँ — जटिल प्रसव में शल्य-प्रसव से जुड़ा क्रम।
- अश्मरी — मूत्राशय की पथरी को शल्य-क्रिया से निकालना।
- हड्डी टूटने का प्रबंधन — खिंचाव, खपच्ची और पट्टी।
- गुदा-क्षेत्र की शल्य-क्रिया — बवासीर, भगंदर और गुदा-विदर से जुड़ी प्रक्रियाएँ।
- घाव की सफ़ाई और सिलाई — कपास, सन और पशु-स्नायु के धागों से टाँके, और घाव पर घी, शहद तथा हल्दी का प्रयोग।
ग्रंथ में शल्य-क्रिया से पहले और बाद की तैयारी का भी उतना ही विस्तार है: रोगी को कैसे तैयार करें, शरीर को किस स्थिति में रखें, रक्तस्राव कैसे रोकें, पट्टी कैसे बाँधें, स्वस्थ होने की अवधि में आहार कैसा हो और दर्द का प्रबंधन कैसे करें।
सुश्रुत इस पर विशेष ज़ोर देते थे कि छात्र पहले तरबूज़, लौकी और मृत पशुओं पर चीरा लगाने का अभ्यास करें। जीवित रोगी के पास जाने की अनुमति उसके बाद ही मिलती थी।
त्रिदोष और चार ह्यूमर का अंतर

यह चिकित्सा-इतिहास का वह हिस्सा है जो भारत के स्कूलों में शायद ही पढ़ाया जाता है। हिप्पोक्रेट्स का चार ह्यूमर वाला सिद्धांत — रक्त, पित्त, कफ और जल — भारतीय त्रिदोष सिद्धांत का ही बाद का रूप माना जाता है।
सुश्रुत संहिता के अंग्रेज़ी अनुवादक अपनी भूमिका में साफ़ लिखते हैं कि ह्यूमर-आधारित रोग-विज्ञान भारतीय मूल का नहीं है, और न ही वह वही है जिसे ऋग्वेद के ऋषियों ने त्रिधातु के नाम से विकसित किया था। उनके अनुसार यह सुश्रुत की नक़ल भर है — सुश्रुत ने रोगों के कारणों में रक्त को चौथे कारक के रूप में जोड़ा था; नक़ल करने वाले ने रक्त तो रख लिया, पर तीनों में सबसे महत्वपूर्ण वात की जगह जल रख दिया।
वात शरीर की हर गति से जुड़ा है — साँस, रक्त-संचार, नाड़ी-संकेत, आँतों की गति, यहाँ तक कि विचार भी। इसलिए वात को हटा देने का अर्थ है चिकित्सा के ढाँचे से गति को ही निकाल देना — रूप तो बना रहा, पर उसे चलाने वाला सिद्धांत छूट गया।
आधुनिक शरीर-क्रिया विज्ञान में स्वायत्त तंत्रिका तंत्र, आँतों की गति, रक्त-प्रवाह और विद्युत-संकेतों पर जो ज़ोर है, उसे एक तरह से उसी क्षेत्र की दोबारा खोज माना जाता है जिसे आयुर्वेद वात कहता रहा। पित्त का संबंध पाचन एंज़ाइम और हार्मोन-संतुलन से जोड़कर देखा जाता है, और कफ का श्लेष्मा, लसिका तथा शरीर की संरचनात्मक बनावट से। शब्दावली अलग है; जिन बातों की चर्चा हो रही है, वे काफ़ी हद तक वही मानी जाती हैं।
आयुर्वेद यानी जीवन का विज्ञान

संस्कृत शब्द आयुर्वेद दो हिस्सों से बना है — आयु (जीवन) और वेद (ज्ञान या विज्ञान)। अनुवादकों का तर्क है कि यह नाम ही इस बात का संकेत है कि यह पद्धति जीवन के पूरे विज्ञान के रूप में रची गई थी — न कोई वैकल्पिक चिकित्सा, न केवल लोक-परंपरा।
ध्यान दीजिए कि सुश्रुत-शैली के शरीर-रचना वाले भाग में क्या-क्या आता है: सिर्फ़ मांसपेशियाँ और हड्डियाँ नहीं, बल्कि गर्भावस्था, प्रसव, शिशु का आहार, मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक आचरण और नीति भी। शास्त्रीय दृष्टि शरीर, मन और समाज के बीच कोई सख़्त रेखा नहीं खींचती। जो शरीर बीमार पड़ता है, वही शरीर परिवार में, शहर में, मौसम में, अपने विचारों और भोजन के साथ जीता है।
इसीलिए आयुर्वेद में इन विषयों पर अलग अध्याय मिलते हैं:
- दिनचर्या — दिन का क्रम और समय का शरीर पर असर।
- ऋतुचर्या — ऋतु के अनुसार रहन-सहन।
- आहार — भोजन के नियम, उसके गुण और पाचन।
- वेगधारण — प्राकृतिक वेग, जिन्हें रोकना उचित नहीं माना जाता।
- सद्वृत्त — आचरण और सामाजिक व्यवहार, जिसे मानसिक स्वास्थ्य से जोड़ा जाता है।
- आचार रसायन — सही आचरण का अपने आप में रसायन जैसा प्रभाव।
यह जुड़ा हुआ ढाँचा किसी और प्राचीन चिकित्सा-पद्धति में इस रूप में कम ही मिलता है। हिप्पोक्रेटिक चिकित्सा आहार की बात करती है, पर सामाजिक आचरण की नहीं। चीनी चिकित्सा ऋतुओं की बात करती है, पर उसका ढाँचा अलग है। इसी वजह से सुश्रुत और उनके समकालीनों की परंपरा को मनुष्य के एक समग्र सिद्धांत के रूप में देखा जाता है।
आज का शोध इसे किस नज़र से देखता है
पुरानी चिकित्सा-पद्धतियों को अंधविश्वास कहकर छोड़ देना आसान है, पर सुश्रुत संहिता के मामले में यह दृष्टिकोण टिकता नहीं दिखता। कई बार ऐसा हुआ कि जिस दिशा में आधुनिक शोध पहुँचा, यह ग्रंथ उसकी चर्चा हज़ारों साल पहले सहज भाव से कर चुका था।
- पुनर्निर्माण शल्य-क्रिया — नाक बनाने की भारतीय फ़्लैप तकनीक को आधुनिक पुनर्निर्माण शल्य चिकित्सा का आरंभिक रूप माना जाता है।
- घाव की देखभाल — शहद, घी और हल्दी, यानी सुश्रुत जिन तीन चीज़ों का घावों पर सबसे ज़्यादा उपयोग करते थे, आज भी अध्ययन का विषय बनी हुई हैं।
- मन और शरीर — शरीर, मन और समाज को एक साथ देखने वाली जिस दृष्टि (जैव-मनो-सामाजिक मॉडल) की ओर आधुनिक चिकित्सा 1970 के दशक से बढ़ी है, आयुर्वेद उसे शुरू से मानकर चलता रहा।
- व्यक्ति-केंद्रित चिकित्सा — आज जीनोम और हर व्यक्ति के अनुसार योजना बनाने की जो दिशा है, वह प्रकृति (व्यक्तिगत गठन) वाले उसी ढाँचे की याद दिलाती है जिसके आधार पर सुश्रुत मात्रा तय करते थे।
- पाचन और माइक्रोबायोम — अग्नि और आम (अधूरा पचा अवशेष) पर शास्त्रीय ज़ोर को आज आँत के सूक्ष्मजीवों, आँत की पारगम्यता और मेटाबॉलिज़्म पर हो रहे शोध के साथ जोड़कर देखा जाता है।
एक ईमानदार बात: सुश्रुत संहिता की हर बात समय की कसौटी पर एक जैसी नहीं उतरी। ब्रह्मांड-विज्ञान से जुड़े कुछ विचार और शरीर-रचना के कुछ विवरण बाद के विज्ञान ने सुधारे हैं। सही रवैया वही माना जाता है जो सुश्रुत ख़ुद सुझाते हैं — जो प्रमाणित है उसे रखिए, जो अस्पष्ट है उसे साफ़ कीजिए, जो ग़लत है उसे छोड़िए, और हर बात को जीवित रोगी पर परखिए।
सुश्रुत की दृष्टि को आज की दिनचर्या में कैसे अपनाएँ

सुश्रुत से कुछ सीखने के लिए शल्य-क्रिया जानना ज़रूरी नहीं। उनके ग्रंथ की एक बड़ी देन शरीर को एक जुड़ी हुई, रोज़ चलने वाली व्यवस्था की तरह देखने की आदत है, और इसे रातोंरात जीवन बदले बिना भी अपनाया जा सकता है।
- दिन में एक आदत तय कीजिए — तेल मालिश (अभ्यंग), तेल से कुल्ला, सुबह उठकर गुनगुना पानी, या दिन का सबसे बड़ा भोजन दोपहर में — इनमें से कोई एक चुनिए और महीने भर रोज़ कीजिए। यह ढाँचा नियमितता के साथ ही अपना काम करता है।
- भोजन और त्वचा-देखभाल को अपनी प्रकृति से जोड़िए — वात, पित्त, कफ या इनका मिश्रण — अपनी प्रकृति पहचानकर भोजन, तेल और दिनचर्या उसी के अनुसार चुनिए।
- भोजन को सिर्फ़ कैलोरी मत मानिए — सुश्रुत की परंपरा भोजन को छह रसों, बीस गुणों और कई प्रभाव-श्रेणियों में बाँटती है। विरुद्ध आहार यानी ग़लत संयोजनों से बचने जैसा एक साधारण नियम भी कुछ हफ़्तों में फ़र्क़ महसूस करा सकता है।
- एक-एक जड़ी-बूटी का सहारा लीजिए — परंपरा में त्रिफला को पाचन से, अश्वगंधा को तनाव से और नीम को त्वचा की देखभाल से जोड़ा जाता है। शास्त्रीय ग्रंथ तीस-तीस चीज़ों के मिश्रण शायद ही इस्तेमाल करते थे; वे कुछ चुनी हुई जड़ी-बूटियाँ सही समय पर देते थे।
- ऋतु के साथ चलिए — ऋतुचर्या कहती है कि वर्षा में गति धीमी रखें और वसंत में खान-पान हल्का रखें। ग्रंथ इसी सामान्य अनुभव को क्रमबद्ध रूप में रखता है।
त्वचा-देखभाल में भी यही सादगी काम आती है। यदि आप रात की देखभाल को एक छोटी, नियमित आदत बनाना चाहते हैं, तो कुमकुमादि तैलम् जैसे पारंपरिक नाम वाले तैल-योग को उसी तरह अपनाया जा सकता है — थोड़ी मात्रा, रोज़, बिना जल्दबाज़ी के।
यह लेख जानकारी के लिए है। लंबे समय से चली आ रही किसी समस्या, गर्भावस्था, छोटे बच्चों, या पहले से चल रही किसी दवा की स्थिति में कुछ भी शुरू करने से पहले वैद्य या डॉक्टर से सलाह ज़रूर लीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सुश्रुत संहिता क्या है (sushruta samhita kya hai)? +
सुश्रुत संहिता आयुर्वेद के तीन आधार-ग्रंथों में से एक है — चरक संहिता और अष्टांग हृदय के साथ। इसे शल्य चिकित्सा, शरीर-रचना और चोट-प्रबंधन का सबसे विस्तृत प्राचीन ग्रंथ माना जाता है। छह स्थानों और 184 अध्यायों में इसमें 300 से अधिक शल्य प्रक्रियाएँ, 120 यंत्र और त्रिदोष सिद्धांत का मूल रूप दर्ज है।
सुश्रुत संहिता कब लिखी गई? +
अधिकतर विद्वान इसे ईसा पूर्व छठी से तीसरी शताब्दी के बीच रखते हैं, यानी यह लगभग 2,300 से 2,600 साल पुरानी है। इसे प्राचीन वाराणसी से जोड़ा जाता है। ग्रंथ संस्कृत में ताड़-पत्र पांडुलिपियों पर सुरक्षित रहा और गुरु-शिष्य परंपरा से चलता रहा; छपे हुए संस्करण 19वीं सदी में सामने आए।
सुश्रुत संहिता में कितने स्थान और कितने अध्याय हैं? +
ग्रंथ छह स्थानों और कुल 184 अध्यायों में बँटा है — सूत्र स्थान, निदान स्थान, शरीर स्थान, चिकित्सा स्थान, कल्प स्थान और उत्तर तंत्र। चिकित्सा से जुड़े सिद्धांत चिकित्सा स्थान में मिलते हैं, जिसमें विशेष रूप से शल्य-प्रबंधन का विवरण है।
शल्य-क्रिया के लिए सुश्रुत संहिता में कितने यंत्रों का वर्णन है? +
सुश्रुत संहिता में 120 यंत्रों और 300 से अधिक शल्य प्रक्रियाओं का वर्णन मिलता है। इनमें नाक का पुनर्निर्माण, मोतियाबिंद की शल्य-क्रिया, मूत्राशय की पथरी निकालना, हड्डी टूटने का प्रबंधन और घाव की सिलाई जैसी प्रक्रियाएँ शामिल हैं।
सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का जनक क्यों कहा जाता है? +
क्योंकि उन्होंने 300 से अधिक शल्य प्रक्रियाओं और 120 यंत्रों का ऐसा क्रमबद्ध विवरण लिखा, जो हिप्पोक्रेटिक कॉर्पस से भी पहले का है। मेलबर्न में Royal Australasian College of Surgeons के मुख्यालय में लगी उनकी प्रतिमा पर यही वाक्य अंकित है — The Father of Surgery।
क्या आयुर्वेद ग्रीक चिकित्सा से पुराना है, और त्रिदोष व चार ह्यूमर में क्या फ़र्क़ है? +
हाँ। त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) की बुनियादी अवधारणाएँ अथर्ववेद में मिलती हैं और चरक तथा सुश्रुत संहिता में व्यवस्थित रूप लेती हैं — ये सब हिप्पोक्रेटिक कॉर्पस से पहले की हैं। सुश्रुत ने रक्त को चौथे कारक के रूप में जोड़ा। ग्रीक चार ह्यूमर (रक्त, पित्त, कफ, जल) में वही चार-कारक ढाँचा तो रहा, पर वात की जगह जल रख दिया गया — जबकि वात ही गति का सिद्धांत है।
क्या सुश्रुत संहिता अंग्रेज़ी में पढ़ी जा सकती है? +
हाँ। सबसे ज़्यादा उद्धृत अंग्रेज़ी अनुवाद कविराज कुंजलाल भिषग्रत्न का है, जो 20वीं सदी के आरंभ में तीन खंडों में छपा था। इसके सार्वजनिक अधिकार वाले संस्करण अब ऑनलाइन उपलब्ध हैं, और कई आधुनिक समीक्षात्मक अनुवाद भी प्रचलन में हैं।